गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० गरीबदास जी की बानी
निरगुन झड़१ का भेद, भँवर कोई जानसी ।
दास गरीब समाध, अमरपुर ठानसी ॥ ६ ॥
( २ )
दीन के दयाल, भक्ति बिर्द२ दीजिये ।
खानाजाद गुलाम, अपन कर लीजिये ॥ १ ॥
खानाजाद गुलाम, तुम्हारा है सही ।
मेहरवान महबूब, जुगन जुग पत रही ॥ २ ॥
बाँदी-जाम३ गुलाम, गुलाम गुलाम है।
खड़ा रहै दरबार, सु आठो जाम है ॥ ३ ॥
सेवक तलबदार४, दर तुम्हरे कूकहीं ।
औगुन अनँत अपार, परी मोहि चूक हीं ॥ ४ ॥
मैं घर का बन्दाजादा, अरज मोरि मानिये ।
कहता दास गरीब, अपन कर जानिये ॥ ५ ॥
( ३ )
धन सतगुरु बरियाम५, अटल बर हम बरी ।
दुलहिन के बड़ भाग, सुहागिन धन घरी ॥ टेक ॥
चलो सखी सतलोक, सेहरा गाइये ।
मोतियन थाल भराय, सु चौक पुराइये ॥ १ ॥
हलदवान६ हित कीन, बीन जहाँ बाजहीं ।
धन सतगुरु उपदेस, दिहाड़ा७ आजहीं ॥ २ ॥
दुलहिन धोये देह, सु मंगल गावहीं ।
सत्त पुरुष के धाम, सु चौर दुरावहीं ॥ ३ ॥
ढुरै सुहंगम चौर, सु चौरी८ गाइये ।
ब्रह्मा कथते बेद, लाड़ी परनाइये६ ॥ ४ ॥
(१) झाड़, फुलवारी । (२) साख । (३) लौंडी-बच्चा । (४) तनखाह पानेवाले । (५)
बरीयान-श्रेष्ठ । (६) हल्दीहाथ की रसम । (७) दिन । (८) मंडप की गीत । (६) दुलहिन
को ब्याहिये ।