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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 136

१२६ गरीबदास जी की बानी
( २ )
सुनिये संत सुजान, गरब नहिं करना रे ॥ टेक ॥
चार दिनाँ की चिहर¹ बनी है, आखिर तोकूँ मरना रे ॥ १ ॥
तूँ जाने मेरि ऐसी निभेगी, हर दम लेखा भरना रे ॥ २ ॥
खाय ले पी ले बिलस ले हंसा, जोड़ जोड़ नहि धरना रे ॥ ३ ॥
दास गरीब सकल में साहब, नहीं किसी सूं अड़ना रे ॥ ४ ॥
॥ राग परज ॥
राम न जाना रे, मूढ़ नर राम न जाना रे ॥टेक॥
जल की बुंद महल रचा, यह सकल जहाना रे।
जठर अगिन सूं राखिया, तेरा पिंड अरु प्राना रे ॥ १ ॥
जहँ तो कूँ भोजन दिया, अमृत रस खाना रे।
गरभ बास तें काढ़ि कै, नर बाहर आना रे ॥ २ ॥
लीला अगम अगाध है, सूरत बिध नाना रे।
मात पिता सुत बंधवा, क्या देख भुलाना रे ॥ ३ ॥
इनमें तेरा को नहीं, क्यों भया दिवाना रे।
जा तन चंदन लेपते, ले धरे मसाना रे ॥ ४ ॥
सूवे सेंभल सेइया, तर देख लुभाना रे।
चंच² मार ब्याकुल भया, बहुतै पछताना रे ॥ ५ ॥
मानसरोवर कमल दल, घर दूर पयाना रे।
गये रसातल राह को, पढ़ पोथी पाना³ रे ॥ ६ ॥
सतगुरु संत सेये नहीं, पूजे पाषाना रे।
मरकव भये कुम्हार के⁴, फिर सूकर स्वाना रे ॥ ७ ॥
पंथ पुरातम⁵ बूझि है, कोई संत सुजाना रे।
स्वासा पारस नाम है, नाभी अस्थाना रे ॥ ८ ॥
(१) जिन्दगी । (२) चोंच । (३) पन्ना । (४) कुम्हार के चढ़ने का जानवर यानी गधा ।
(५) प्राचीन ।