गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 131, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंअब तो चढ़े नाम के छाजैं१। गगन मँडल में नौबत बाजै ॥
अगर अलेल सब्द सहदानी। दासगरीब बिहंगम बानी ॥
( ३ )
अदली आरत अदल बखाना। कोली बुन बिहंगम ताना ॥टेक
ज्ञान का राछ२ ध्यान की तुरिया। नाम का धागा निःचै जुरिया ॥
प्रेम की पान३ कमल की खाड़ी४। सुरत का सूत बुनें निज गाढ़ी ॥
नूर की नाल५ फिरैं दिन राती। जा कोली कूँ काल न खाती ॥
कल का खूँटा धरनी६ गाड़ा। गहिर गभीना७ ताना गाड़ा ॥
निरत की नली बुन जो कोई। सो तो कोली अविचल होई ॥
रेजा८ राजिक का बुन दीजै। ऐसे सतगुरु साहब रीझै ॥
दासगरीब सोई सत कोली। ताना बुनिहै अरस अमोली ॥
( ४ )
अदली आरत अदल अजूनी। नाम बिना है काया सूनी॥टेक
झूठी काया खाल लुहारा। इला पिंगला सुखमन द्वारा ॥
किरतघनी९ भूले नर लोई। जा घट निःचा नाम न होई ॥
सो नर कीट पतंग भुवंगा१०। चौरासी में धरिहैं अंगा ॥
उद्भिज११ खानी भुगतै प्रानी। समझै नहीं सब्द सहदानी ॥
हम हैं सब्द सब्द हम माहीं। हम से भिन्न और कछु नाहीं ॥
पाप पुन्न दो बीज बनाया। सब्द भेद कोउ बिरले पाया ॥
सब्दै सर्ब लोक में गाजै। सब्द वजीर सब्द है राजै ॥
सब्दै स्थावर जंगम जोगी। दास गरीब सब्द रस भोगी ॥
( ५ )
अदली आरत अदल जमाना। जम जोरा मेटौं तलब्राना ॥टेक
धरमराय पर हमरी धाई१२। नौबत नाम चढ़े ले भाई ॥
(१) छज्जा । (२) एक आला कपड़ा बुनने का जो कंघी की सूरत का होता है ।
(३) माड़ी । (४) गड़हा जिसमें पैर लटका कर बैठते हैं । (५) ढरकी । (६) जमीन ।
(७) गभिन । (८) कपड़ा । (९) नाशुकरा । (१०) साँप । (११) बनस्पति । (१२) धावा ।