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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

अरिल १०७
( ७ )
मरदाने मर जाहि मनी पर मार है।
ऐसा महल अनूप पलक में छार है ॥ १ ॥
जोरा१ बुरी बलाय जीव जग मूँच२ है।
पलक पहर छिन माहिं नगारा कूँच है ॥ २ ॥
सुरत सुहंगम नेस पेस है बावरे ।
बदी विदारो३ बेग धनी कूँ ध्याव रे ॥ ३ ॥
दम की डोरा खोज दरीबा४ खूब है।
अगर दीप सतलोक अजब महबूब है ॥ ४ ॥
सुता५ पुत्र गृह नार छार सब गात रे।
का सँू लाया नेह संग नहिं साथ रे ॥ ५ ॥
हंस अकेला जाय हिरंबर हेत रे।
सब्द हमारा मान नाम निज चेत रे ॥ ६ ॥
कोतल घोड़े पीनस६ रथ सँग पालकी ।
गज गैबर७ दल ठाठ निसानी काल की ॥ ७ ॥
हक हलाल पहिचान बदी कर दूर रे।
यह मुरगी रब रूह गऊ क्या सूर८ रे ॥ ८ ॥
तीतर चिड़ी बटेर भखे हलवान रे ।
मुल्ला बाँग पुकार अलह रहमान रे ॥ ६ ॥
रमजानी रमजान घास चोखा दिया ।
पकड़ पच्छाड़ी रूह कहो यह क्या किया ॥१०॥
खूनी खून मँझार खाल क्यूँ काढ़ता ।
देखे रब रहमान गला क्यूँ बाढ़ता६ ॥११॥
(१) जुल्म । (२) गँवार। (३) फाड़ डालो, नाश करो। (४) झोपड़ा ।
(५) बेटी। (६) एक तरह की छोटी पालकी। (७) हाथियों का झुण्ड। (८) सूअर ।
(६) काटता ।

१०८ गरीबदास जी की बानी
ऐसे बूड़ै नाव होत हैं गरक रे।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब नाम निज परख रे ॥१२॥
( ८ )
जानै जाननहार सकल की जानता।
घट घट में अबिनासी पूरन प्रान था ॥ १ ॥
अवगत भिन्न अभिन्न महल में महल है।
हाजिर नाजिर देख कहो क्या गहल१ है ॥ २ ॥
अलख पलक के बीच अकासा ईस रे।
सुरत निसानै लाय देख जगदीस रे ॥ ३ ॥
सेत बरन सुभ रंग बिरंग विचार रे।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब देख दीदार रे ॥ ४ ॥
( ६ )
हिरदय कपट कमाल लाल पावै नहीं।
बहुत परिस्रम भूल गाँठ गहिरी गही ॥ १ ॥
मरजीवा२ मन मारि महोदध३ पैठ रे।
अनहद सब्द घमोर४ जहाँ ढुक बैठ रे ॥ २ ॥
त्रिकुटी कमल पर सिंध सरोवर सुन्न रे।
छूट हाथि गढ़ छाँड़ तहाँ रख मन्न रे ॥ ३ ॥
लगै कोट पर चोट अकार पसार है।
उपजे सेती भिन्न जो वस्तु नियार है ॥ ४ ॥
अलख अलेल पदम सदन५ जहँ लाइये।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब रहत६ घर पाइये ॥ ५ ॥
( १० )
नग सरवर पर तरवर७ साखा नहिं मूल रे।
अच्छै बृच्छ अस्थान जहाँ मन भूल रे ॥ १ ॥


(१) गफ़लत । (२) समुद्र में मोती की खोज में गोता लगाने वाला। (३) समुद्र ।
(४) घनघोर । (५) घर । (६) रहित = मोक्ष । (७) पेड़ ।

अरिल १०६
पीघू१ अनन्त अपार पड़े तिस धाम रे ।
तत-बेता परम हंस बसैं निःकाम रे ॥ २ ॥
समाधान संजूत२ सलेमाबाद रे ।
अज अमर घर देखो आद अनाद रे ॥ ३ ॥
बैकुंठ बिहिस्त बिसार नास है जात है ।
चल बसा सतलोक नबेला साथ है ॥ ४ ॥
अगर डोरहंचढ़ देख झिलमिली सुन्न रे ।
अजर अमर घर बसो पाप नहिं पुन्न रे ॥ ५ ॥
तहँ वहँ पदम अनन्त परेवा३ जाहिंगे ।
अच्छै बृच्छ फल हंस तहाँ वहँ खाहिंगे ॥ ६ ॥
अमर भूमि अस्थान प्रान जहँ चाल रे ।
अनंत कोटि तहाँ सिद्ध अमीते४ माल रे ॥ ७ ॥
अवगतपुर का राजा अवगत नाम है ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब हमारा गाम है ॥ ८ ॥
( ११ )
यह सौदा सतभाय५ करो परभात रे ।
तन मन रतन अमोल बटाऊ६ साथ रे ॥ १ ॥
बिछुर जायँगे मीत मता सुन लीजिये ।
बहुर न मेला होय कहो क्या कीजिये ॥ २ ॥
सील संतोष बिबेक दया के धाम हैं ।
ज्ञान रतन गुलजार सँघाती राम हैं ॥ ३ ॥
धरम धजा फरकंत फरहरैं लोक रे ।
ता मध अजपा नाम सु सौदा रोक७ रे ॥ ४ ॥
(१) पैगू=पन्ना की किस्म का एक जबाहिर । (२) संयुक्त । (३) कबूतर अर्थात्
जीव। (४) बेहिसाब । (५) सत्त भाव । (६) ठग । (७) नकद दाम से लेना ।
१५

११० गरीबदास जी की बानी
चले बनिजवा१ ऊट२ हूँट गढ़ छाँड़ रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब लगै जम डाँड़ रे ॥ ५ ॥
( १२ )
जम जोरा का जाल काल खग३ सीस रे ।
हैफ४ होत छिन माहिं सुमिर जगदीश रे ॥ १ ॥
ऐसा साज बनाय बिसर नहिं जाइये ।
जनम पदारथ खोय बहुर कहँ पाइये ॥ २ ॥
जम जोरा का जोर कठोर बिजोग है ।
सर्ब लोक सिर साल सु दीरघ रोग है ॥ ३ ॥
जो जाने तो जान सब्द कूँ मान रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब होत है हान रे ॥ ४ ॥
( १३ )
सावँत५ औ मँडलीक६ गये बहु सूर रे ।
राजा रंक अपार मिले सब धूर रे ॥ १ ॥
रुई लपेटी आग अँगीठी आठ रे ।
कोतवाल घट माहिं मारता काठ७ रे ॥ २ ॥
नरक बहै नौ द्वार देहरा गंद रे ।
क्या देखा कालि माहिं पड़ा क्यूँ फंद रे ॥ ३ ॥
हासिल८ का घर दूर हजूर न चालता ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब हटी९ में लाल था ॥ ४ ॥
( १४ )
हाट पटन बाजार वजन१० फीका पड़ा ।
जम किंकर का तौक आन गल में पड़ा ॥ १ ॥
(१) बंजारा, प्राण । (२) उठना । (३) चिड़िया । (४) अफसोस । (५) वीर ।
(६) एक मंडल का राजा । (७) चोर को हवालात रखने के लिये लकड़ी में छेद करके
उसमें पाँव डाल कर कील से ठोक देते हैं । (८) लाभ, तत्त्व वस्तु । (६) हाट=
दूकान । (१०) तौल ।

अरिल १११
मार मुहँ मुँह खाय सीस धर पीटहीं।
जम रोकै नौ द्वार गला और घीट१ हीं ॥ २ ॥
रक्ख स्वाद सरीर सिंघासन सेज रे।
पड़ी जुगन जुग भूल न छोड़ै हेज२ रे ॥ ३ ॥
जैसे मधु की माखी मधुवा३ भोग रे।
छार४ दई मुख माहिं लूटि हैं लोग रे ॥ ४ ॥
ऐसा संग्रह कीन्ह संग ना चालिहै।
हर दम अजपा नाम जपो यह माल है ॥ ५ ॥
दौरा५ दूत न चोर तिसै नहिं लूटि हैं।
जूनी संकट बंध नाम से छूटि हैं ॥ ६ ॥
उर में आसन मार खजाना खूब है।
जप तप कौने काम बेचना दूब६ है ॥ ७ ॥
लालों के ब्योपार पलक टुक मूँद रे।
खैरचटा मत खाह अज्ञानी गूँद७ रे ॥ ८ ॥
काँटे कुटिल करीर८ सरीर झरोहिहै९।
चल सतगुरु के देस जु पदम करोर है ॥ ६ ॥
सूली सेज सुरङ्ग तुरङ्ग नचावते।
जिनके नाम न गाम कहीं नहि पावते ॥१०॥
मरना है महबूब हक दर हक रे।
नजर करो निरताबो१० पदम परक्ख रे ॥११॥
सुजनी सेज बिछाय के चँवर दुरावते।
जा घर रवनी रम्भा११ रागी गावते ॥१२॥
(१) घंटी, घाँटी। (२) प्यार। (३) जैसे मधु-मक्खी शहद इकट्ठा करती है पर
उसे खाने नहीं पाती उसका मजा मधुवा चिड़िया या शहद निकालने वाले लूटते हैं।
(४) राख, धूल। (५) धावा मार कर चोरी करने वाले। (६) बाहरी जप तप
घास का बेचना है। (७) गोंद। (८) एक काँटेदार पेड़। (६) छिलोर लगा देगा।
(१०) बिचार और निर्णय करो। (११) सुन्दर बेश्या।

११२ गरीबदास जी की बानी
सून महल अरु मंदिर बासे काग रे ।
हरे हाँ रे कहता दासगरीब जगत निरभाग१ रे ॥१३॥
( १५ )
खलक मुलक कूँ देख संघाती कोउ नहीं ।
जम का है मुख्तार सीस बैठे वहीं ॥ १ ॥
होगा हाल बिहाल सब्द कूँ सोध रे ।
पुत्र बिसारा माता बालक गोद रे ॥ २ ॥
और सहेली आन सैन बतलाइया ।
कंठ धुकधुकी आन यान२ समझाइया ॥ ३ ॥
ऐसे मौला३ खोया महल के माहिं रे ।
हरे हाँ रे कहता दासगरीब बृच्छ मध छाँह रे ॥ ४ ॥
( १६ )
न्यारा कभी न होय निरंजन देह से ।
रहा सकल घट पूर परम सुख नेह से ॥ १ ॥
ज्यूँ दरिया मध लीन मीन मग जोह रे ।
पंछी पैर अकास खोज४ नहिं होय रे ॥ २ ॥
बिन पंखों के भौंरा उड़ै अकास कूँ ।
इला पिंगला सुखमन सोधै स्वास कूँ ॥ ३ ॥
गूँगे ने गुड़ खाया कैसे जानिये ।
सैन सुकृत से पावै बचन पिछानिये ॥ ४ ॥
काली पीली सुरही५ धौली धेनु रे ।
सेत बरन सब दूध सकल इक बैन रे ॥ ५ ॥
नहीं ऊँच नहिं नीच निरञ्जन जाति रे ।
करता के सब माहिं दिवस औ रात रे ॥ ६ ॥
(१) अभागा । (२) कूँच । (३) ईश्वर । (४) निशान । (५) गाय ।

सोहं साछीभूत न ईसर कोय रे।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब धनी कूँ जोह रे ॥ ७ ॥
॥ बैत ॥
बंदे जान साहब सार वे ।
पिदर१ मादर२ आप कादर३, नहीं कुल परिवार वे ॥ १ ॥
जल बूँद से जिन साज साजा, लहम४ दरिया नूर वे ।
है सकल सरबंग साहब, देख निकट न दूर वे ॥ २ ॥
जिन्द५ अजूनी बेनमूनी, जागता गुरु पीर वे ।
उलट पट्टन मेरु चढ़ना, लहम दरिया तीर वे ॥ ३ ॥
अजब साहब है सुभानं, खोज दम का कीन वे ।
तिर्कुटी के घाट चढ़ कर, ध्यान धर दुरबीन वे ॥ ४ ॥
अजब दरिया है हिरंबर६, परम हंस पिछान वे ।
आब खाक न बाद आतिस७, ना जमीं असमान वे ॥ ५ ॥
अलख आप अलाह साहब, कुर्स कुंज जहूर वे ।
अर्स ऊपर महल मालिक, दर झिलमिला नूर वे ॥ ६ ॥
मौला करीम खुदाय खूबी, धुन सोहंसो जाप वे ।
बाँग रोज निमाज कलमा, है सबद गरगाप वे ॥ ७ ॥
निर्भय निहंगम८ नाद बाजै, निरख कर टुक देख वे ।
अरसी अजूनी जिंद जोगी, अलख आदि अलेख वे ॥ ८ ॥
मढ़ी महल न तासु के, आसन अचंभी ऐन वे ।
पाजी गुलाम गरीब तेरा, देखता सुख चैन वे ॥ ६ ॥
( २ )
बंदे खोज पैंड़ा पकर वे ।
लेखा सरे६ में लीजियेगा, कर धनी का जिकर वे ॥ १ ॥
(१) बाप । (२) मा । (३) शक्तिमान । (४) छिन में । (५) जिन्दा, जीता जागता ।
(६) निर्मल । (७) पानी, मिट्टी, हवा, आग । (८) निःअहंकार, मतवाला । (६) दरबार
(शरअ ?) ।

११४ गरीबदास जी की बानी
जिकर फिकर फरियाद कर ले, अंदरूनी अरस वे ।
हाली मवाली १ याद कीजे, ना सरे में तरस वे ॥ २ ॥
रसना रँगीली राम जप ले, अलख कादिर आप वे ।
पीराँ फकीराँ परस ले, पूजो सनेही साध वे ॥ ३ ॥
दरगह मिटै जो डंड तेरा, नेकी निरंतर राख वे ।
नापैद से पैदा किया, तूँ नाम बिन नापाक वे ॥ ४ ॥
दिल सफा कर सैलान कीजै, बंक मारग बाट वे ।
इला पिंगला सुषमना, तूँ उतर औघट घाट वे ॥ ५ ॥
बंक नाल बिसाल बहना, है अमी रस अरस वे ।
रसना बिहूना २ राग गावे, बिना चसमों दरस वे ॥ ६ ॥
प्याला अमी रस पीजिये, खुलिहै बजर कपाट वे ।
अरस कुरस अबंध अवगत, कोल्हू चवै बिन लांट ३ वे ॥ ७ ॥
निरभै निरन्तर नेम रख, अकला ४ अनाहद रात वे ।
मुकता मुलायम याद साहब, दूर कर दिल घात वे ॥ ८ ॥
जोगी बिजोगी बिंद रख ५, सुन में समाना सिंध वे ।
हाजिर गुलाम गरीब है, सोलह कला रबि चंद वे ॥ ६ ॥
( ३ )
बंदे देख ले दरहाल वे ।
सुन्न मंडल सैल करले, अजब गैबी ख्याल वे ॥ १ ॥
जबरूत ६ पर नासूत ६ है, नासूत पर मलकूत ६ वे ।
मलकूत पर लाहूत ६ है, लाहूत पर अनभूत ६ वे ॥ २ ॥
सुन ले सोहंसो जाप कूँ, सुन ६ में सिलहरा बाँध वे ।
सेस के सिर ध्यान धरिये, उलट स्वर कूँ साध वे ॥ ३ ॥
तीन मूरत निरख निःचल, पैठ देख पताल वे ।
(१) दर्बारी, प्रेमीजन । (२) बिना । (३) बिना जाठ के कोल्हू टपकता है।
(४) अँधेरी । (५) जो बीर्य्य को पात न होने दे । (६) अंतरी मुकामों के नाम ।

बैत ११५
मूल चक्र गनेस गैबी, रंग रूप बिसाल वे ॥ ४ ॥
दंड-धारी भुजा भारी, मुकुट की छबि खूब वे ।
अगमी अनाहद अदल है, फजली फजल महबूब वे ॥ ५ ॥
टुक उलट चसमैं सिंध में, झलकै जलाबिंब१ जोर वे ।
अजब रास बिलास बानी, चंद सूर करोर वे ॥ ६ ॥
हलका न भारी है मुरारी, अजब नूरी नैन वे ।
दिल मगज अंदर महल है, तूं समझ ले यह सैन वे ॥ ७ ॥
इक गुमठ२ अटल अनाद है, दुरते सुहंगम चौर वे ।
सेत छत्र सीस सोहै, अजब उज्ज्वल भौर वे ॥ ८ ॥
अजब नूर जहूर जोती, झिलमिलै झलकंत वे ।
हाजिर गुलाम गरीब है, जहाँ देख आदि न अंत वे ॥ ६ ॥
( ४ )
बंदे देखले दुरबीन वे ।
ऐनक उघार बिकार खोलो, चलै जल बिन मीन वे ॥ १ ॥
बिना जल जहाँ मीन चलता, नाम नौका अधर वे ।
बेड़े बिमान अमान देखो, को लखै यह कदर वे ॥ २ ॥
पानी बिना सरवर सरू३, जहाँ फूल है गुलजार वे ।
अधर बाग अनंत फल, कायम कला करतार वे ॥ ३ ॥
कर निगाह अगाह आसन, बरसता बिन बदर४ वे ।
बिन पखावज ताल सुर, बाजे बजैं जहाँ मधुर वे ॥ ४ ॥
बानी बिनोद असोधपुर, चंदा नहीं जहाँ सूर वे ।
पानी पवन नहिं भवन भारी, कला संख सपूर वे ॥ ५ ॥
कायम कुफल कुंजी लगी, खोले सोई सत पीर वे ।
कहता गरीब तबीब, तन चंगा करत कबीर वे ॥ ६ ॥
(१) जल में परछाईं । (२) गुम्बज़ । (३) सर्व का पेड़ । (४) बादल ।

११६ गरीबदास जी की बानी
( ५ )
बंदे देखले निज मूल वे ।
कला कोटि असंख धारा, अधर निरगुन फूल वे ॥ १ ॥
है अबंच असंच अवगत, अधर आदि अनाद वे ।
कमल मोती जगमगै, जहँ सुरत निरत समाध वे ॥ २ ॥
भवन भारी रवन सोभा, भजो राम रहीम वे ।
साहब धनी कूँ याद कर, जप अलह अलख करीम वे ॥ ३ ॥
मादर पिदर हैं संग तेरे, बिछुरता नहिं पलक वे ।
कायम कला कुरबान जाँ, खालिक बसे है खलक वे ॥ ४ ॥
खालिक धनी है खलक में, तूँ झलक पलक समोय वे ।
अरस आसन है बिहंगम, अधर चसमे जोय वे ॥ ५ ॥
बैराट में इक घाट है, उस घाट में इक द्वार वे ।
उस द्वार में इक देहरा, जहँ खूब है इक यार वे ॥ ६ ॥
सूभ१ है दिलदार साहब, देखना नहिं भूल वे ।
गरीबदास निवास नग२ पर, भई सेजाँ सूल वे ॥ ७ ॥
( ६ )
बंदे अधर बेड़ा चलत वे ।
साँच मान सुगंद३ साहब, नहीं करिया लगत वे ॥ १ ॥
अधर पुहसी अधर गिरवर, अधर सरवर ताल वे ।
अधर नदियाँ बहत हैं जहँ, अधर हीरे लाल वे ॥ २ ॥
अधर नौका अधर खेवट, अधर पानी पवन वे ।
अधर चंदा अधर सूरज, अधर चौदह भुवन वे ॥ ३ ॥
अधर बागं अधर बेलं, अधर कूप तलाव वे ।
अधर माली कुहकता है, अधर फूल खिलाव वे ॥ ४ ॥
(१) प्रकाशमान । (२) ऊँचा स्थान । (३) कसम ।

रमैनी ११७
अधर बँगला अधर डेवढ़ी, अधर साहब आप वे ।
अधर पुर गढ़ हूँठ नगरी, नाभि नासा माथ वे ॥ ५ ॥
हूँठ हाथ हजूर हासिल, अधर पर इक अधर वे ।
गरीबदासं अधर ध्यानी, ओढ़ि एकै चदर१ वे ॥ ६ ॥
( ७ )
बंदे पाक नाम पिछान वे ।
पाक मेला पाक परबी, पाक है असनान वे ॥ १ ॥
पाक सेवा पाक पूजा, पाक सालिग्राम वे ।
पाक चंदन पाक अरचन, पाक है वह धाम वे ॥ २ ॥
पाक संखा पाक झालर२, पाक है वो तूर३ वे ।
पाक बीना पाक घंटा, पाक यारा नूर वे ॥ ३ ॥
पाक सिज्जा४ पाक आसन, पाक है वह तख्त वे ।
पाकै पुजारी पूजता, जो पाक है सब रख्त५ वे ॥ ४ ॥
पाक कुरसी पाक तुरसी६, पाक माला फेर वे ।
पाक रागी पाक गावै, पाक नादं भेर७ वे ॥ ५ ॥
पाक भौंरा पाक चौंरा, पाक पुस्पं गंध वे ।
पाक मोती पाक हंसा, पाक सरवर सिंध वे ॥ ६ ॥
पाक लहरा पाक मिहरा, पाक सूरज चंद वे ।
पाक सस्तर पाक बस्तर, पाक पुर आनंद वे ॥ ७ ॥
पाक बानी पाक प्रानी, पाक बोलनहार वे ।
गरीबदासं पाक होकर, पाक कर दीदार वे ॥ ८ ॥
॥ रमैनी ॥
जब लग हंसा हमरी आना। तब लग लगै न तुमरा८ बाना ॥
दोही दे गुरु भरैं हँकारा६। तिन हंसों की चढ़ँ पुकारा ॥
(१) चोला, शरीर । (२) झाँझ । (३) तुरही । (४) पलंग । (५) सामान ।
(६) तुलसी । (७) शहनाई । (८) धर्मराय से कह रहे हैं । (६) गुरू की दोहाई देकर
हाँक मारैं ।
१६

११८ गरीबदास जी की बानी
कोटि कटक करहूँ पैमाला । जम किकर का तोड़ूँ जाला ॥
चौदह कोट बाँध जम लाऊँ । धरमराय कूँ त्रास दिखाऊँ ॥
चौदह भुवन दुहाई गाजै । जिस कूँ सुन जम किकर भाजै ॥
भक्ति बीज जो होवै हंसा । कोटिन जीव उधारै बंसा ॥
उधरैं हंस पार हो जाहीं । भवसागर में बहुर न आहीं ॥
॥ साखी ॥
सब्द हमारा मानि है, जाके हिरदय हेत ।
अमर लोक पहुँचावहूँ, रूप धरत है सेत ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मराया । हम संखौं हंसा पद परसाया ॥
जिन लीन्हा हमरा परवाना । सो हंसा हम किये अमाना१ ॥
अमृत पान अमी रस चोखा । पीवो हंसा नाहीं धोखा ॥
या रस की जो लगै खुमारी । गगन मँडल में सुन्न अधारी ॥
झरै अमी रस अमृत धारा । जानैगा कोइ पीवनहारा ॥
हंस परेवा२ अमृत पीवै । संखौं कल्प जुगै जुग जीवै ॥
टूटै बंधन होत खुलासा । गरीबदास पद हंस निवासा ॥
( २ )
सेत सिंघासन सेतहि अंगा । सेत छत्र जाको सेतहि रंगा ॥
सेत खवास सेत ही चौंरा । सेतै पुहुप लेत ही भौंरा ॥
सेतै नाद सेत ही तूरा । सेत सिंघासन नाचै हूरा३ ॥
सेतै नदी सेत ही बिरछा । सेतै चंदन मस्तक चरचा४ ॥
सेत सरोवर सेतहि हंसा । सेतै जा का सब कुल बंसा ॥
सेतै मंदिर चंदर जोती । सेतै मानिक मुक्ता मोती ॥
सेतै मुकुट सेत ही थाना । सेत धुजा औ सेत निसाना ॥
गरीबदास वह धाम हमारा । सुर नर मुनि जन करो बिचारा ॥
(१) निश्चिन्त । (२) कबूतर । (३) अप्सरा । (४) लगाया ।

रमैनी ११६
( ३ )
बिनहीं पंथ पंथ है भाई । बिन चरनों चालै सो जाई ॥
बिनहीं देह धरै जहँ ध्याना। देह न गेह१ न पिंड न प्राना ॥
पिंड ब्रह्मांड बाक नहिं बानी । मन बुधि सेती अगम निसानी ॥
अलिफ इलाम२ गाम नहिं गेहा । गगन मँडल में जुरा सनेहा ॥
एता ईलम३ जो दिखलावै । सो सतगुरु साँचा कहलावै ॥
गरीबदास मन धरै न धीरं । अधर धार पंथ बाट कबीरं ॥६॥
( ४ )
रूप न रेख भेष नहिं बाना । आसन असल लना४ अस्थाना ॥
अकल अभूनी५ गम नहिं मोरी । हे सतगुरु कहँ पाऊँ डोरी ॥
ऊँचा धाम गाम नहि कोई । बिना चरन जहँ चलना होई ॥
अचरज लीला अगम अपारा । कैसे पाऊँ पंथ तुम्हारा ॥
सुरत निरत का सार सनेसा६ । उतरै हंसा पार हमेसा ॥
कहै कबीर पुरुष बरियामं७ । गरीबदास इक नौका नामं ॥
( ५ )
आदि सनातन पंथ हमारा । जानत नाहीं यह संसारा ॥
पंथों सेती पंथ अलहदा । भेखों बीच पड़ा है बहदा८ ॥
षट दरसन सब खटपट होई । हमरा पंथ न पावै कोई ॥
हिन्दू तुरक कदर नहिं जाने । रोजा ग्यारस करै धिक ता नेह९ ॥
दोनों दोन यकौ न आसा । वे पूरब वे पच्छिम निवासा ॥
दुहूँ दोन का छोड़ा लेखा । उत्तर दखिनन में हम देखा ॥
गरीबदास हम निःचै जाना । चारो खूँट दसो दिस ध्याना ॥
( ६ )
कैसे हिंदू तुरक कहाया । सबही एकै द्वारे आया ॥ १ ॥
(१) घर । (२) अल्लाह में अलिफ और लाम दो हर्फ़ हैं—अलाम के अर्थ सर्वज्ञ
के भी हैं । (३) विद्या । (४) लामकान । (५) तुच्छ बुद्धि । (६) सँदेसा । (७) श्रेष्ठ ।
(८) बाद बिबाद । (६) मुसलमान रोजा रखते हैं और हिन्दू एकादशी का व्रत सो दोनों
को धिक्कार है।

१२० गरीबदास जी की बानी
कैसे ब्राह्मन कैसे सूद्रं । एकै हाड़ चाम तन गूदं ॥ २ ॥
एकै बिंद एक भग द्वारा । एकै सब घट बोलनहारा ॥ ३ ॥
कौम छत्तीस एकही जाती । ब्रह्म बीज सबकी उतपाती ॥ ४ ॥
एकै कुल एकै परिवारा । ब्रह्म बीज का सकल पसारा ॥ ५ ॥
ऊँच नीच इस बिध है लोई । कमे कुकर्म कहावै दोई ॥ ६ ॥
गरीबदास जिन नाम पिछाना । ऊँच नीच पद ये परमाना ॥७॥
॥ आरती ॥
अदली आरत अदल समोई । निरभय पद में मिलना होई ॥टेक
दिल का दीप पवन की बाती । चित का चंदन पाँचो पाती ॥
तत का तिलक ध्यान की धोती । मन की माला अजपा जोती ॥
नूर के दीप नूर के चौरा । नूर के पुहुप नूर के भौंरा ॥
नूर की झाँझ नूर की झालर१ । नूर के संख नूर की टालर२ ॥
नूर की साँझी३ नूर की सेवा । नूर के सेवक नूर के देवा ॥
आदि पुरुष अदली अनुरागी । सुन संपुट में सेवा लागी ॥
खोजो कमल सुरति की डोरी । अगर दीप में खेलो होरी ॥
निरभय पद में निरत समानी । दासगरीब दरस दरबानी ॥
( २ )
अदली आरत अदल उजारा । सत्त पुरुष दीजो दीदारा ॥टेक
कैसे कर छूटै चौरासी । जूनी संकट बहुत तिरासी ॥
जुगन जुगन हम कहते आये । भवसागर से जीव छुटाये ॥
कर बिस्वास स्वास कूँ पेखो । या तन में मन मूरत देखो ॥
स्वासा पार सु भेद हमारा । जो खोजे सो उतरे पारा ॥
स्वासा पार सु आदि निसानी । जो खोजै सो होय दरबानी ॥
हर दम नाम सुहंगम सोई । आवा गमन बहुर ना होई ॥
(१) बिजय घंट । (२) ताल । (३) रंग या फूल पत्ती की चित्रकारी जो ठाकुरजी के
सामने बनाई जाती है ।

अब तो चढ़े नाम के छाजैं१। गगन मँडल में नौबत बाजै ॥
अगर अलेल सब्द सहदानी। दासगरीब बिहंगम बानी ॥
( ३ )
अदली आरत अदल बखाना। कोली बुन बिहंगम ताना ॥टेक
ज्ञान का राछ२ ध्यान की तुरिया। नाम का धागा निःचै जुरिया ॥
प्रेम की पान३ कमल की खाड़ी४। सुरत का सूत बुनें निज गाढ़ी ॥
नूर की नाल५ फिरैं दिन राती। जा कोली कूँ काल न खाती ॥
कल का खूँटा धरनी६ गाड़ा। गहिर गभीना७ ताना गाड़ा ॥
निरत की नली बुन जो कोई। सो तो कोली अविचल होई ॥
रेजा८ राजिक का बुन दीजै। ऐसे सतगुरु साहब रीझै ॥
दासगरीब सोई सत कोली। ताना बुनिहै अरस अमोली ॥
( ४ )
अदली आरत अदल अजूनी। नाम बिना है काया सूनी॥टेक
झूठी काया खाल लुहारा। इला पिंगला सुखमन द्वारा ॥
किरतघनी९ भूले नर लोई। जा घट निःचा नाम न होई ॥
सो नर कीट पतंग भुवंगा१०। चौरासी में धरिहैं अंगा ॥
उद्भिज११ खानी भुगतै प्रानी। समझै नहीं सब्द सहदानी ॥
हम हैं सब्द सब्द हम माहीं। हम से भिन्न और कछु नाहीं ॥
पाप पुन्न दो बीज बनाया। सब्द भेद कोउ बिरले पाया ॥
सब्दै सर्ब लोक में गाजै। सब्द वजीर सब्द है राजै ॥
सब्दै स्थावर जंगम जोगी। दास गरीब सब्द रस भोगी ॥
( ५ )
अदली आरत अदल जमाना। जम जोरा मेटौं तलब्राना ॥टेक
धरमराय पर हमरी धाई१२। नौबत नाम चढ़े ले भाई ॥
(१) छज्जा । (२) एक आला कपड़ा बुनने का जो कंघी की सूरत का होता है ।
(३) माड़ी । (४) गड़हा जिसमें पैर लटका कर बैठते हैं । (५) ढरकी । (६) जमीन ।
(७) गभिन । (८) कपड़ा । (९) नाशुकरा । (१०) साँप । (११) बनस्पति । (१२) धावा ।

१२२ गरीबदास जी की बानी
चित्रगुप्त१ के कागज चीरौं । जुगन जुगन मेटौं तसकीरौं ॥
अदली ज्ञान अदल इक रासा२ । सुन कर हंसन३ पावैं त्रासा ॥
इजराईल४ जुसा बरदाना। धरमराय का है तलबाना ॥
मेटौं तलब करौं तागीरा५ । भेंटे दास गरीब कबीरा ॥
( ६ )
अदली आरत अदल पठाऊँ । जुगन जुगन का लेखा पाऊँ॥टेक
जा दिन नहिं थे पिंड न प्राना । पानी पवन जिमीं असमान॥
कच्छ मच्छ कूरम नहिं काया । चंद सूर नहिं दीप बनाया ॥
सेस महेस गनेस न ब्रह्मा । नारद सारद ना बिसकर्मा ॥
सिध चोरासी ना तेंतीसौ । नौ औतार नहीं चौबीसौ ॥
पाँच तत्त नाहीं गुन तीना । नाद बिंद नाहीं घट सीना ॥
चित्रगुप्त६ नहिं किर्तुम बाजी । धरमराय नहिं पंडित काजी ॥
धुँधूकार अनंत जुग बीते । जा दिन कागद कोउ के चीते७ ॥
जा दिन थे हम तखत खवासा । तन के पाजी सेवक दासा ॥
संख जुगन परलूँ परवाना । सत्तपुरुष के संग रहाना ॥
दास गरीब कबीर का चेरा । सत्तलोक अमरापुर डेरा ॥
( ७ )
ऐसी आरत अपरम्पारा । थाके ब्रह्मा बेद उचारा ॥टेक
अनंत कोट जाके संभू ध्यानी । ब्रह्मा संख बेद पढ़ैं बानी ॥
इंद्र अनंत मेघ रस माला । सब्द अतीत वृद्ध नहिं बाला ॥
चंद सूर जाके अनंत चिरागा । सब्द अतीत अजब रँग बागा॥
सात समुद्र जाके अंजन नैना । सब्द अतीत अजब रँग बैना ॥
अनंत कोट जाके बाजे बाजैं । पूरन ब्रह्म अमरपुर छाजैं ॥
तीस कोट रामा औतारी । सीता संग रहंती नारी ॥
(१) जमपुरी में कर्मों का लेखा रखने वाला देवता । (२) एक रस । (३) जीव ।
(४) जान निकालने वाले फ़िरिश्ते का नाम । (५) तंगो । (६) कर्मों का लेखा रखने वाले
देवता । (७) तब तक कर्मों का हिसाब किसी का नहीं खुला था ।

तीन पदम जाके भगवाना। सप्त नील¹ कन्हवा² सँग जाना ॥
तीस कोट सीता सँग चेरी। सप्त नील राधा दें फेरी ॥
(जाके) अर्ध रूप पै सकल पसारा। ऐसा पूरन ब्रह्म हमारा ॥
दास गरीब कहै नर लोई। यह पद चीन्है बिरला कोई ॥
॥ दोहा ॥
सतबादी सब संग हैं, आप आपने धाम।
आजिज³ की अरदास⁴ है, सकल संत परनाम ॥
॥ राग कल्यान ॥
सेस सहस मुख गावै, साधो सेस सहस मुख गावै ॥टेक॥
ब्रह्मा बिस्नु महेसर थाके, नारद नाद बजावै।
सनक सनंदन ध्यान धरत हैं, दृष्ट मुष्ट नहिं आवै ॥ १ ॥
लघु दीरघ कछु कहा न जाई, जो पावै सो पावै।
जी⁵ जूनी कूँ कैसे दरसै, गौरज सीस चढ़ावै ॥ २ ॥
ब्रह्म रंध्र का घाट जहाँ है, उलट खेचरी⁶ लावै।
सहस कमल दल झिलमिल रंगा, चोखा फूल चुवावै ॥ ३ ॥
गंगा जमना मद्ध सरसुती, चरन कमल से आवै।
परबी कोटि परम पद माहीं, सुख के सागर न्हावै ॥ ४ ॥
सुरत निरत मन पौन पदारथ, चारो तत्त मिलावै।
आकासै उड़ चलै बिहंगम, गगन मँडल कूँ धावै ॥ ५ ॥
मोर मुकुट पीताँबर राजै, कोटि कला छबि छावै।
अबरन बरन तासु के नाहीं, बिचरत हैं निरदावै ॥ ६ ॥
बिनही चरनों चलै चिदानंद, बिन मुख बैन सुनावै।
गरीबदास यह अकथ कहानी, ज्यूँ गूँगा गुड़ खावै ॥ ७ ॥
कबहुँ न होवे मैला नाम धन, कबहुँ न होवे मैला।
चेतन होकर जड़ कूँ पूजै, मूरख मूढ़र बैला ॥ १ ॥
(१) नील = एक सौ खरब । (२) कन्हैया या कृष्ण । (३) आधीन । (४) अर्जदाश्त,
प्रार्थना । (५) जीव । (६) नाम एक मुद्रा का ।

१२४ गरीबदास जी की बानी
जिस दगड़े पंडित उठ चालै, पीछे पड़ गया गैला१ ।
औघट घाटी पंथ बिकट है, जहाँ हमारी सैला ॥ २ ॥
बिनय बंदगी म्हेसा२ कीजै, बोक३ बनै के खैला४ ।
कूकर सूकर खर कीजैगा, छ्वाँड़ सकल बद फैला५ ॥ ३ ॥
घरही कोस पचास परत हैं, ज्यूँ तेली के बैला ।
पीसत भाँग तमाखू पीवै, मूरख मुख सूँ मैला ॥ ४ ॥
सहस इक्कीसौ छःसै दम है, निस बासर तूँ लैला६ ।
गरीबदास सुन पार उतर गये, अनहद नाद घुरैला७ ॥ ५ ॥
( ३ )
घट ही में चंद चकोरा, साधो घट ही चंद चकोरा ॥टेक॥
दामिन दमकै घनहर८ गरजै, बोलै दादुर मोरा ।
सतगुरु गस्ती गस्त फिरावै, फिरता ज्ञान ढँढोरा ॥ १ ॥
अदली राज अदल बादसाही, पाँच पचीसो चोरा ।
चीन्हो सब्द सिंध घर कीजै, होना गारतगोरा ॥ २ ॥
त्रिकुटी महल में आसन मारो, जहँ न चलै जम जोरा ।
दास गरीब भक्ति को कीजो, हुआ जात है भोरा६ ॥ ३ ॥
( ४ )
घट से दरस जहूरा, साधो घट से दरस जहूरा ॥टेक॥
कायर कीर उलट कर भागे, पहुँचेगा कोइ सूरा ।
गगन मँडल में अनहद बाजै, भनकैं झीने तूरा१० ॥ १ ॥
त्रिकुटी महल में ध्यान समोवो, झिलमिल झिलमिल नूरा ।
अगर दीप में आसन मारो, मिट गई जम की घूरा११ ॥ २ ॥
संख पदम जहँ परघट देखे, मुरसिद मिलिया पूरा ।
दास गरीब अटल जागीरा, काढ़ कौन कसूरा ॥ ३ ॥
(१) जिस रास्ते पर पंडित चलते हैं उसी पर सब चलने लगते हैं। (२) हमेशा ।
(३) भारी बकरा । (४) साँड़ । (५) कुकर्म । (६) लेता है । (७) जिसकी अन्तर में धुन
हो रही है । (८) बादल । (६) सबेरा । (१०) तुरही । (११) टेढ़ी निगाह ।

राग बिजोग १२५
( ५ )
जो सूते सो जना बिगूते१, जागे सोई जगे हैं ॥टेक॥
सूरे तेई नगर पहुँचे, कायर उलट भगे हैं।
नौवें द्वारे दरस दरीबा२, दसमें ध्यान लगे हैं ॥ १ ॥
सुन्न सहर में हुई सगाई, हमरे हंस मँगे हैं।
निरगुन नाम निरालंब चीन्हो, हमरे साध सगे हैं ॥ २ ॥
बिन मुख बानी सतगुरु गावै, नाहीं दस्त३ पगे४ हैं।
दास गरीब अमर पुर डेरे, सत्त के दाग दगे हैं ॥ ३ ॥
( ६ )
नाम निरंजन नीका, साधो नाम निरंजन नीका ॥टेक॥
तीरथ बरत थोथरे५ लागैं, जप तप संजम फीका ॥ १ ॥
भजन बंदगी पार उतारै, समरथ जीवन जी का ॥ २ ॥
करम कांड ब्योहार करत है, नाम अभय पद टीका ॥ ३ ॥
कहा भयो छत्र की छाँह चलैया, राज पाट दिहली का ॥ ४ ॥
नाम सहित बेवतन भला है, दर दर माँगे भीखा ॥ ५ ॥
आदि अनादि भक्ति है नौधा६, सुनो हमारी सीखा ॥ ६ ॥
गरीबदास सतगुरु की सरनै, गगन मँडल में दीखा ॥ ७ ॥
॥ राग बिजोग ॥
सुनियो संत सुजान, दिया मैं हेला रे ॥टेक॥
और जनम बहुतेरे होंगे, मानुष जनम दुहेला७ रे ॥ १ ॥
तू जकिहै८ मैं लसकर जोरों, चलना तुझे अकेला रे ॥ २ ॥
अरब खरब लग माया जोरी, संग न चलसी धेला रे ॥ ३ ॥
या तो मेरी सत की निबरिया, सतगुरु पार पहेला रे ॥ ४ ॥
दास गरीब कहै रे संतो, सब्द गुरू चित चेला रे ॥ ५ ॥
(१) बिगड़े। (२) हाट। (३) हाथ। (४) पाँव। (५) थोथे। (६) नौ प्रकार की।
(७) कठिन। (८) बिचारता है।
१७

१२६ गरीबदास जी की बानी
( २ )
सुनिये संत सुजान, गरब नहिं करना रे ॥ टेक ॥
चार दिनाँ की चिहर¹ बनी है, आखिर तोकूँ मरना रे ॥ १ ॥
तूँ जाने मेरि ऐसी निभेगी, हर दम लेखा भरना रे ॥ २ ॥
खाय ले पी ले बिलस ले हंसा, जोड़ जोड़ नहि धरना रे ॥ ३ ॥
दास गरीब सकल में साहब, नहीं किसी सूं अड़ना रे ॥ ४ ॥
॥ राग परज ॥
राम न जाना रे, मूढ़ नर राम न जाना रे ॥टेक॥
जल की बुंद महल रचा, यह सकल जहाना रे।
जठर अगिन सूं राखिया, तेरा पिंड अरु प्राना रे ॥ १ ॥
जहँ तो कूँ भोजन दिया, अमृत रस खाना रे।
गरभ बास तें काढ़ि कै, नर बाहर आना रे ॥ २ ॥
लीला अगम अगाध है, सूरत बिध नाना रे।
मात पिता सुत बंधवा, क्या देख भुलाना रे ॥ ३ ॥
इनमें तेरा को नहीं, क्यों भया दिवाना रे।
जा तन चंदन लेपते, ले धरे मसाना रे ॥ ४ ॥
सूवे सेंभल सेइया, तर देख लुभाना रे।
चंच² मार ब्याकुल भया, बहुतै पछताना रे ॥ ५ ॥
मानसरोवर कमल दल, घर दूर पयाना रे।
गये रसातल राह को, पढ़ पोथी पाना³ रे ॥ ६ ॥
सतगुरु संत सेये नहीं, पूजे पाषाना रे।
मरकव भये कुम्हार के⁴, फिर सूकर स्वाना रे ॥ ७ ॥
पंथ पुरातम⁵ बूझि है, कोई संत सुजाना रे।
स्वासा पारस नाम है, नाभी अस्थाना रे ॥ ८ ॥
(१) जिन्दगी । (२) चोंच । (३) पन्ना । (४) कुम्हार के चढ़ने का जानवर यानी गधा ।
(५) प्राचीन ।