गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअरिल १११
मार मुहँ मुँह खाय सीस धर पीटहीं।
जम रोकै नौ द्वार गला और घीट१ हीं ॥ २ ॥
रक्ख स्वाद सरीर सिंघासन सेज रे।
पड़ी जुगन जुग भूल न छोड़ै हेज२ रे ॥ ३ ॥
जैसे मधु की माखी मधुवा३ भोग रे।
छार४ दई मुख माहिं लूटि हैं लोग रे ॥ ४ ॥
ऐसा संग्रह कीन्ह संग ना चालिहै।
हर दम अजपा नाम जपो यह माल है ॥ ५ ॥
दौरा५ दूत न चोर तिसै नहिं लूटि हैं।
जूनी संकट बंध नाम से छूटि हैं ॥ ६ ॥
उर में आसन मार खजाना खूब है।
जप तप कौने काम बेचना दूब६ है ॥ ७ ॥
लालों के ब्योपार पलक टुक मूँद रे।
खैरचटा मत खाह अज्ञानी गूँद७ रे ॥ ८ ॥
काँटे कुटिल करीर८ सरीर झरोहिहै९।
चल सतगुरु के देस जु पदम करोर है ॥ ६ ॥
सूली सेज सुरङ्ग तुरङ्ग नचावते।
जिनके नाम न गाम कहीं नहि पावते ॥१०॥
मरना है महबूब हक दर हक रे।
नजर करो निरताबो१० पदम परक्ख रे ॥११॥
सुजनी सेज बिछाय के चँवर दुरावते।
जा घर रवनी रम्भा११ रागी गावते ॥१२॥
(१) घंटी, घाँटी। (२) प्यार। (३) जैसे मधु-मक्खी शहद इकट्ठा करती है पर
उसे खाने नहीं पाती उसका मजा मधुवा चिड़िया या शहद निकालने वाले लूटते हैं।
(४) राख, धूल। (५) धावा मार कर चोरी करने वाले। (६) बाहरी जप तप
घास का बेचना है। (७) गोंद। (८) एक काँटेदार पेड़। (६) छिलोर लगा देगा।
(१०) बिचार और निर्णय करो। (११) सुन्दर बेश्या।