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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

[Header] ब्रह्म बेदी ८६

कच्छ मच्छं कुरम धोलं सेस सहस-फन गावहीं ।
नारद मुनि से रटैं निस दिन ब्रह्म पार न पावहीं ॥३२॥
संभु जोग बिजोग साधा अचल अडिग समाध है ।
अवगत की गत नाहिं जानी लीला अगम अगाध है ॥३३॥
सनकादिक औ सिध चौरासी ध्यान धरत हैं तासुका ।
चौबीसो अवतार जपत हैं हरमहंस प्रकास का ॥३४॥
सहस अठासी औ तैंतीसो सूरज चंद चिराग है ।
धर१ अंबर२ धरनीधर३ रटते अवगत अचल बिहाग है॥३५॥
सुर नर मुनिजन सिध अरु साधक पारब्रह्म कूँ रटत हैं ।
घर घर मंगलचार चौरी ज्ञान जोग जहँ बटत हैं ॥३६॥
चित्रगुप्त धरमराय गावै आदि माया ओंकार है ।
कोट सरसुती लाप करत हैं ऐसा ब्रह्म दरबार है ॥३७॥
कामधेनु कलपबृच्छ जाके इन्द्र अनंत सुर भरत है ।
पारबती कर जोर लछमी सावित्री सोभा करत है ॥३८॥
गंधर्ब ज्ञानी अरु मुनि ध्यानी पाँचो तत्त खवास है ।
त्रिगुन तीन बहुरंग बाजी कोइ जन बिरले दास है ॥३६॥
ध्रू प्रहलाद अगाध स्वर्ग है जनक बिदेही जोर है ।
चले बिमान निदान४ बीता धमराय की बँध तोर है ॥४०॥
गोरखदत्त जुगादि जोगी नाम जलंधर लीजिये ।
भरथरी गोपीचन्द सीझे ऐसी दिच्छा दीजिये ॥४१॥
सुलतानी बाजीद फरीदा पीपा परचे पाइया ।
देवल फेरा गोप गुसाँई नामा५ की छान छवाइया ॥४२॥
छान छवाई गऊ जिवाई गनिका चढ़ी बिवान में ।
सदना६ बकरे कूँ मत मारै पहुँचे आन निदान में ॥४३॥


(१) धरती । (२) आकाश । (३) शेषनाग । (४) आदि कर्म्म । (५) देखो नोट
पृष्ठ ७० । (६) देखो नोट पृष्ठ २१-२२ ।

६० गरीबदास जी की बानी
अजामेल से अधम उधारे पतित-पावन ब्रिद्१ तासु है ।
केसो आन भया बनजारा षट दल कीन्ही हाँस है ॥४४॥
धना२ भक्त का खेत निपाया माधो३ दई सिकलात३ है ।
पंडा पाव४ बुझाया सतगुरु जगन्नाथ की बात है ॥४५॥
गैबी ख्याल बिसाल सतगुरु अचल दिगंबर५ थीर है ।
भक्ति हेत काया धर आये अवगत सत्त कबीर है ॥४६॥
नानक दादू अगम अगाधू तिरी जहाज खेवट सही ।
सुख सागर के हंसा आये भक्ति हिरंबर उर धरी ॥४७॥
कोटि भानु प्रकास पूरन रोम रोम की लार है ।
अचल अभंगी है सतसंगी अवगत का दीदार है ॥४८॥
धन सतगुरु उपदेस देवा चौरासी भ्रम मेटहीं ।
तेज पुंज तन देह धरके इस बिध हमकूँ भेंटहीं ॥४६॥
सब्द निवास अकास बानी यह सतगुरु का रूप है ।
चंद सूर न पवन पानी जहाँ छाँह न धूप है ॥५०॥
रहता रमता राम साहब अवगत अलह अलेख है ।
भूले पंथ बिडंब६ बानी कुल का खाविंद७ एक है ॥५१॥
रोम रोम में जाप जप ले अष्ट कमल दल मेल है ।
सुरत निरत को कमल पठवो जहाँ दीपक बिन तेल है ॥५२॥
हर दम खोज हनोज८ हाजिर तिरबेनी के तीर है ।
दास गरीब तबीब९ सतगुरु बन्दी छोड़ कबीर है ॥५३॥
(१) बिरद् = कीर्ति । (२) देखो नोट पृष्ठ २८ । (३) सकलात = पीताम्बर–माधवदास
जगन्नाथजी के एक प्रेमी पुजारी थे जिनको कोई कड़ी बीमारी हो गई थी । और पुजारी
लोग उनको समुद्र किनारे बैठा आये । रात को जब माधवदासजी को जाड़ा लगा तो
जगन्नाथजी अपना पीताम्बर उनको ओढ़ा आये और आरोग्य कर दिया । सबेरे पीताम्बर
मूर्ति पर न पाकर उसकी खोज पड़ी तो पुजारियों ने उसे माधवदास के तन पर पाकर
उनकी महिमा जानी और आदर से मंदिर में लाये । (४) पाव = आग - देखो नोट पृष्ठ
७१ । (५) बिना वस्त्र । (६) पाखंड । (७) स्वामी । (८) सदा । (६) वैद्य ।

सुलच्छन कुलच्छन ६१
॥ सुलच्छन कुलच्छन ॥
उत्तम कुल करतार दे द्वादस भूषन संग ।
रूप द्रब्य दे दया कर ज्ञान भजन सतसंग ॥ १ ॥
सील संतोष बिबेक दे छिमा दया इकतार ।
भाव भक्ति बैराग दे नाम निरालँब सार ॥ २ ॥
जोग जुगत जगदीस दे सूक्ष्म ध्यान दयाल ।
अकल यकीन अजनम जत अठसिध नौनिध ख्याल ॥ ३ ॥
सुरग नरक बाँचे नहीं मोछ बंध से दूर ।
बड़ी गरीबी जगत में संत चरन रज धूर ॥ ४ ॥
जीवत मुक्ता सो कहो आसा तृस्ना खंड ।
मन के जीते जीत है क्युँ भरमे ब्रह्मांड ॥ ५ ॥
साला१ करम सरीर में सतगुरु दिया लखाय ।
गरीबदास गलत़ान२ पद नहि आवै नहिं जाय ॥ ६ ॥
चौरासी की चाल क्या मो सेती सुन लेह ।
चोरी जारी करत है जाके मुखड़े खेह ॥ ७ ॥
काम क्रोध मद लोभ लट छुटी रहै बिकराल ।
क्रोध कसाई उर बसै कुसबद छुरा घर घाल ॥ ८ ॥
हरष सोग है स्वान गत संसा सरप सरीर ।
राग दोष बड़ रोग है जम के परे जँजीर ॥ ६ ॥
आसा तृस्ना नदी में डूबे तीनों लोक ।
मनसा माया बिस्तरी आतम आतम दोष ॥१०॥
एक सत्रु इक मित्र है भूल परी रे प्रान ।
जम की नगरी जाहिगा सबद हमारा मान ॥ ११ ॥
निंदा बिदा३ छाँड़ दे संतों सूँ कर प्रीत ।
भवसागर तिर जात है जीवत मुक्त अतीत ॥१२॥
(१) घर, स्थान । (२) मदहोश, मस्त । (३) बुरा भला कहना ।

६० गरीबदास जी की बानी
अजामेल से अधम उधारे पतित-पावन ब्रिद्१ तासु है ।
केसो आन भया बनजारा षट दल कीन्ही हाँस है ॥४४॥
धना२ भक्त का खेत निपाया माधो३ दई सिकलात३ है ।
पंडा पाव४ बुझाया सतगुरु जगन्नाथ की बात है ॥४५॥
गैबी ख्याल बिसाल सतगुरु अचल दिगंबर५ थीर है।
भक्ति हेत काया धर आये अवगत सत्त कबीर है ॥४६॥
नानक दादू अगम अगाधू तिरी जहाज खेवट सही ।
सुख सागर के हंसा आये भक्ति हिरंबर उर धरी ॥४७॥
कोटि भानु प्रकास पूरन रोम रोम की लार है ।
अचल अभंगी है सतसंगी अवगत का दीदार है ॥४८॥
धन सतगुरु उपदेस देवा चौरासी भ्रम मेटहीं ।
तेज पुंज तन देह धरके इस बिध हमकूँ भेंटहीं ॥४६॥
सब्द निवास अकास बानी यह सतगुरु का रूप है ।
चंद सूर न पवन पानी जहाँ छाँह न धूप है ॥५०॥
रहता रमता राम साहब अवगत अलह अलेख है ।
भूले पंथ बिडंब६ बानी कुल का खाविंद७ एक है ॥५१॥
रोम रोम में जाप जप ले अष्ट कमल दल मेल है।
सुरत निरत को कमल पठवो जहँ दीपक बिन तेल है ॥५२॥
हर दम खोज हनोज८ हाजिर तिरबेनी के तीर है।
दास गरीब तबीब६ सतगुरु बन्दी छोड़ कबीर है ॥५३॥
(१) बिरद् = कीर्ति । (२) देखो नोट पृष्ठ २८ । (३) सकलात = पीताम्बर-माधवदास
जगन्नाथजी के एक प्रेमी पुजारी थे जिनको कोई कड़ी बीमारी हो गई थी । और पुजारी
लोग उनको समुद्र किनारे बैठा आये । रात को जब माधवदासजी को जाड़ा लगा तो
जगन्नाथजी अपना पीताम्बर उनको ओढ़ा आये और आरोग कर दिया । सबेरे पीताम्बर
मूर्ति पर न पाकर उसकी खोज पड़ी तो पुजारियों ने उसे माधवदास के तन पर पाकर
उनकी महिमा जानी और आदर से मंदिर में लाये । (४) पाव = आग - देखो नोट पृष्ठ
७१ । (५) बिना वस्त्र । (६) पाखंड । .(७) स्वामी । (८) सदा । (६) वैद्य ।

सुलच्छन कुलच्छन ६१
॥ सुलच्छन कुलच्छन ॥
उत्तम कुल करतार दे द्वादस भूषन संग ।
रूप द्रव्य दे दया कर ज्ञान भजन सतसंग ॥ १ ॥
सील संतोष बिबेक दे छिमा दया इकतार ।
भाव भक्ति बैराग दे नाम निरालँब सार ॥ २ ॥
जोग जुगत जगदीस दे सूछम ध्यान दयाल ।
अकल अकीन अजनम जत अठसिध नौनिध ख्याल ॥ ३ ॥
सुरग नरक बाँचे नहीं मोछ बंध से दूर ।
बड़ी गरीबी जगत में संत चरन रज धूर ॥ ४ ॥
जीवत मुक्ता सो कहो आसा तृस्ना खंड ।
मन के जीते जीत है क्यूँ भरमे ब्रह्मांड ॥ ५ ॥
साला१ करम सरीर में सतगुरु दिया लखाय ।
गरीबदास गलतान२ पद नहि आवै नहिं जाय ॥ ६ ॥
चौरासी की चाल क्या मो सेती सुन लेह ।
चोरी जारी करत है जाके मुखड़े खेह ॥ ७ ॥
काम क्रोध मद लोभ लट छुटी रहै बिकराल ।
क्रोध कसाई उर बसै कुसबद छुरा घर घाल ॥ ८ ॥
हरष सोग है स्वान गत संसा सरप सरीर ।
राग दोष बड़ रोग है जम के परे जँजीर ॥ ६ ॥
आसा तृस्ना नदी में डूबे तीनों लोक ।
मनसा माया बिस्तरी आतम आतम दोष ॥ १० ॥
एक सत्रु इक मित्र है भूल परी रे प्रान ।
जम की नगरी जाहिगा सबद हमारा मान ॥ ११ ॥
निंदा बिदा३ छाँड़ दे संतों सँू कर प्रीत ।
भवसागर तिर जात है जीवत मुक्त अतीत ॥१२॥
(१) घर, स्थान । (२) मदहोश, मस्त । (३) बुरा भला कहना ।

५. Line 19: अरवाह६, धौरा७, अक८. Line 20: हस्ती६(orहस्ती९). In line 20, look at the number after हस्ती: it is a superscript ६! Wait, why would it be ६? Because footnote (6) was on line 19 (अरवाह६), and then 7 (धौरा७), 8 (अक८), and then the next one is 9, but the typesetter typed ६! Wait, or did the typesetter type ६thinking it was 9? Yes, an inverted 9 IS 6, or they picked from the 6 compartment! Wait, if we transcribe asहस्ती६and(६) हाथी, it matches the printed text 1:1. Wait, what if someone considers it ९? Let's look at line 15: ॥१६॥or॥१९॥? Wait! In line 15, is it ॥१९॥? Let me look at line 15 again very, very carefully. In line 15: ॥१` followed by a digit.
The digit has:

  • a vertical stem? No, it's ६.
    Wait, is it possible that in this font, ९

सवैया ६३
उर में अविनासी आप अलह, सतगुरु कूँ पार उतारा है।
कहँ गल कंटकैं दुनिया दूती, येहू बन कैसा गारा१ है ॥५॥
हम जान लिया जगदीस गुरू, जिन जंतर२ महल साँवरा है।
कुछ तौल न मोल नहीं जा का, देखा नहिं हलका भारा है॥६॥
कुछ रूप न रेख बिबेक लखा, चाखा नहिं मीठा खारा है।
गलतान३ समांन समाय रहा, जो पिंड ब्रह्मण्ड से न्यारा है ॥७॥
सुर संख समाधि लगाय रहे, देखा इक अजब हजारा४ है।
कहै दास गरीब अजब दरिया, झिल मिल झिल वार न थार है॥८॥
( २ )
सुख सागर न्हान चलो हंसा५, भवसागर भूल रहे लोई।
कुल काट६ लगा जम आन ठगा, अगली पिछली सबही खोई ॥ १॥
निंदत नेमी नर ताय लिये, कुछ समझैं हैं नहि गुरु-द्रोही।
संतों का दोष धरैं दिल में, अघ पाप के बीज बहुत बोई ॥२॥
सुसरे सालों हितकार करें, सासू साली कोई नंदोई।
जग लड़े मरैं परतीत नहीं, बोलै नहिं साँच जगत धोई ॥३॥
लगरे७ भडुए नहिं भेद लहैं, गुझ८ बीरज मंत्र कूँ हम गोई।
साधू माखन मध छाक रहे, जग पीवत है पिछली छोई६ ॥४॥
दिन आवत है सुनि दंग भया, जम तलब छुटी तब दे रोई।
कहे दास गरीब जगाय रहे, भडुए निस बासर रहें सोई ॥५॥
( ३ )
तप राज लिया बड़ जुलम किया, आगम अँधरो नहिं सूझत है।
घट में सत सालिग्राम सही, चेतन होकर जड़ पूजत है ॥१॥
पाती तोरै नहिं मुख मोरै, पाहन पानी सूँ लूझत१० है।
अंधे बहिरे गूँगे गहले,११ नहिं सब्द अनाहद बूझत है ॥२॥
(१) घना। (२) कलों का। (३) मस्त, मदहोश। (४) सहसदलकमल। (५) जीव।
(६) मैल, दाग। (७) फरेबी। (८) गुप्त। (६) छाछ। (१०) उलझता है। (११) बेसमझ।
१३

६४ गरीबदास जी की बानी
कामधेनु सदा कलपबृच्छ कला, जहँ अमी महारस दूभत१ है ।
कहै दास गरीब गगन गादी, गैबी गलताना गूँजत है ॥३॥
( ४ )
झलकै निज नूर जहूर सदा, बिभरै२ निरधार अपार कला ।
कादिर कुरबान अमान सही, रहता रमता है अलख अलाह ॥१॥
सरबंग अभंग अनाहद है, जल थल पूरन है सुन्न सिला ।
दरवेस दयाल निहाल करै, करनी भरनी डूबै न जला३ ॥२॥
घट देह सनेह नहीं जाके, सरवन चसमैं नहि कंठ गला ।
कुछ रूप न रंग अभंग बिधा, सोवै न जगै बैठा न खला४ ॥३॥
करले दीदार जुहार५ सही, तेरा जुगन जुगन होय जात भला ।
कहै दास गरीब अलख लखिये, कोइ दरगह में पकरे न पला६ ॥४॥
( ५ )
निरबान निरंजन चीन्ह भइया, दुख दारिद मोछ करै करता ।
गरभ बास मिटै निज नाम रटे, क्यूँ जुगन जुगन चोले धरता ॥१॥
चल थीर करो अवगत नगरी, तू लख चौरासी क्यूँ फिरता ।
सत संगत ले निज साधन की, नहिं नाम बिना कारज सरता ॥२
दयावंत विवेकि भये ज्ञानी, टुक छेड़ करे से सब लड़ता ।
चुंडित७ मुंडित७ सब पकर लिये,इनसे जम किंकर८ ना डरता ॥३॥
तू कौन कहाँ से आन फँदा, देख आग बिरानी क्यूँ जरता ।
समझै नहिं सीख सुदरगह६ ले, बड़े भूत भये जो पिंड भरता ॥४॥
मुकता होने का भेद कहूँ, चल चौर सोहंगम जित दुरता ।
कहै दास गरीब निवास सदा, जहँ नाद अखंड अजब घुरता ॥५
( ६ )
झलकै जोती मुकता मोती, निरभै निरबानी भेटा है ।


(१) दुहा है। (२) फैल रही है। (३) जल में। (४) खड़ा । (५) प्रणाम । (६) पल्ला,
दामन । (७) जटा धारी और मूड़ मुड़ाये हुए भेष । (८) दूत, नौकर । (६) अच्छी
दरगाह को पकड़ ।

सवैया ६५
त्रिकुटी ताना भर नाम नली,१ एकै लख पूरन पेटा२ है ॥१॥
इक बिद पिछान जहान रचा, कोइ बाप कहै कोइ बेटा है ।
कोइ पीतसरे३ कोइपाति४ लगा, कोइ ससुर भया समधेटा५ है॥२॥
जद काल महा बली पकड़ लिया, मरघर में आकर लेटा है ।
साऊ६ सबही खप्पर फोरैं, सिर फोर दिया पुत जेठा७ है ।
गत बूझत है जद फूँक दिया, खर खोज नहीं सब मेटा है ॥३॥
कहै दास गरीब उपाध लगी, सब भूत भये जग हेटा है ॥४॥
( ७ )
मग८ पूछत है प्रतीत नहीं, नादी९ बादी१० झगड़ा ठानें ।
मुकता रुकता नहिं राह लहैं, नाह साध असाध कूँ जानत हैं॥१॥
देवल जाहीं मसजिद माहीं, साहब का सिरजा भानत हैं११ ।
पंडित काजी डोबी१२ बाजी, नहि नीर खीर१३ कूँ छानत हैं॥२॥
चेतन का गल काटत हैं, धर पत्थर पाहन मानत हैं ।
कहै दास गरीब निरास चले, धिरकार जनम नर लानत है॥३॥
( ८ )
दुख दुंद उपाध में जीव बँधे, समरथ की नहीं उपासा१४ है ।
नेमी धर्मी धर्म धाम फिरैं, साध संगत कूँ हासा१५ है ॥१॥
बघनी ठगनी कूँ लूट लिये, चीन्हा नहिं निरगुन रासा है ।
जल अरघ दिया जम आन लिया, नहाते जल बारह मासा है॥२॥
सूझै नहिं सिंध अबंध बिद्या, पाती तोरैं नर घासा है ।
जम मारत है मुगदर मोढ़े,१६ चसमों में देत धवाँसा है ॥३॥
चंचल चोर कठोर कुटिल, क्या पहिरत मलमल खासा है ।
जम नगन करै साहब की सौं, देगा तुझ बहुत तिरासा है ॥४॥
दिल खोज भइया निज नाम जपो, सत पूरन ब्रह्म खुलासा है ।
कहै दास गरीब पत्थर पटको, तुम डारो निरगुन पासा है॥५॥
(१) बुनने की नली जिस पर सूत भरा होता है। (२) ताजा तैयार हुआ कपड़ा ।
(३)

६६ गरीबदास जी की बानी
( ६ )
जुलमी जुलमाना छाँड़ भइया, गल काटत है बदला लीजै ।
खिचड़ी खाना तज हलवाना,१ सुरापान२ पराधी३ क्युँ कीजै ॥१॥
रहै कोट बरस सँग साधों के, जल में पाहन का क्या भीजै ।
चंदन बन में रंग लावत है, इक बाँस बिटंबी४ ना सीझै ॥२॥
बहिरे आगे पद छंद कहा, समझै नहिं मूढ़ कहा रीझै ।
कहै दास गरीब कुटिल काजी, चल जवाब सरै५ में क्या दीजै॥३॥
( १० )
पापी परभात६ नहीं भेंटै, मुख देखत पाप लगै जा का ।
जननी नौ मास तिरास दई, धिरकार जनम तिसकी मा का ॥१
चौरासी कुंड पड़े पापी, है जगन जुगन कुंभी पाका ।
गर्भ छेदन बेधन पीर लगै, मिटता नाहीं इच्छा टाँका ॥२॥
जिस सेरी७ साधू संत गये, वह मारग कठिन बहुत बाँका ।
कहै दास गरीब धर बूझ भइया, भया तीन लोक सावँत साका८ ॥३
॥ रेखता ॥
( १ )
अजब महरम मिला ज्ञान अगहै६ खुला, परख परतीत सूँ दुंद भागा ।
सब्द की संध में फंद मनुवाँ गया, बिरह घनघोर में हंस जागा ॥१
अष्टदल कमल मध जाप अजपा चलै, मूल कूँ बंध बैराट छाया ।
तिरकुटी तीर बहु नीर नदियाँ बहैं, सिंध सरवर भरे हंस नहाया ॥२
खेचरी भूचरी चाचरी उनमुनी, अकल अगोचरी नाद हेरा ।
सुन्न सतलोक कूँ गमन हंसा किया, अगमपुर धाम महबूब मेरा ॥३
अच्छर की डोर घनघोर में मिल गई, भेद भेदा मैं करतार महली ।
दास गरीब यह बिषम१० बैराग है, समझ देखो नहीं बात सहली ११॥
(१) बकरी का बच्चा । (२) शराब खोरी । (३) अपराध । (४) गठीला । (५) शरा
यानी हजरत मुहम्मद की नसीहतों की किताब । (६) तड़के । (७) तङ्ग रास्ता । (८) किसी
शूर वीर की कीर्ति का नया सम्बत् । (६) दुर्लभ । (१०) कठिन । (११) सहज ।

Here is the complete line-by-line transcription of the page:

( २ )
बिरह की पीर जिस मात गूदानहीं, बीझ पिंजर गया अस्थि सूखा¹
उनमुनी रेख² धुन ध्यान निःचल भया, पाँच जहूद³ तन ठोक फूँकूँ का
लगैगी दाह जब धाहै४ देता फिरै, बिरह के अंग में रोवता है ।
पलक आँसू५ भरै ध्यान बिरहन धरै, प्रेम रस रीत तन धोवता है॥
हाड़ तन चाम गूदा असत६ गलत है, उड़ेगा गात तन रुई रंगा७ ।
पिंड तन पीत८ उदीत९ बैराग है, देत है मद्ध ज्यूँ कूक१० बंगा¹¹ ॥
हंस परमहंस सरवंग से जा मिला, बिरह वियोग यह जोग जोगी ।
दास गरीब जहँ पास प्याले फिरैं, पीवते सही रस भोग भोगी ॥
( ३ )
दीद बर दीद परतीत परतच्छ है, नयन के नाद में गरक१२ होई ।
अजब गलतान कुरबान इक तन्त१३ है, सब्द अतीत कूँ परख लोई॥
जस पानी के बीच में बुदबुदा होत

६८ गरीबदास जी की बानी
लाख बानी पढ़े ध्यान सुन्न में धरै, महल का मरहमी भेद बेधै१ ॥
अजगैब२ के कोट में चोट लागै नहीं, सब्द अतीत में नेस३ होई ।
दास गरीब गुर भेद से पाइये, अगमपुर धाम की बाट जोई ॥७
( ४ )
घट घट में नाद उच्चार बानी, मिहीं४ महल में मारफत५ पावता है।
ताल मिरदंग जहँ संख सुर पूरिये६, बिना मुख नाद बजावता है॥
तूर तुतकार धुमार७ तिस नगर में, अजग गुलजार इक नूर चंपा।
कोकिला बैन सुख चैन सुनते भये, बिधा८ है हंस लै विरह कंपा६॥
आद अरु अंत इक मद्ध मेला भया, सिखर की सुन्न में जिकर१० लागी
केतकी कमल जहँ अजब बाड़ी बनी, भँवर गुंजार निःतन्त११ रागी॥
दुलहनी दंग दुलहा भई देखकर, संख रवि झिलमिलै नूर जोती ।
अजब दरियाव जहँ कोट बेड़े पड़े, चुगत है हंस बिन चंच१२ मोती ॥
जहँ गुमठ अनूप इक सेत छत्तर बना, गगन गुलजार जहँ नूर गादी ।
दास गरीब दिल दूसरा दूर कर, सब्द अतीत सुन्न में समाधी ॥५
( ५ )
देव ही नहीं तौ सेव किसकी करूँ, किसे पूजूँ कोई नाहिं दूजा ।
करता ही नहीं तौ किरत१३किसकी करूँ, पिंड ब्रह्मांड में एक सूझा ॥
जागा ही नहीं तौ जाग किसकूँ कहूँ, सोता ही नहीं किसकूँ जगाऊँ ।
खोया ही नहीं तौ खोज किसका करूँ, बिछुड़ा नहीं किसे ढूँढ़ लाऊँ ॥
बोलता संग और डोलता है नहीं, कला के कोट (अलख) छिप रहा प्यारा
गैब से आया और गैब छिप जायगा, गैब ही गैब रचिया पसारा ॥
प्रान कूँ सोधकर मूल कूँ दर गहो, बेद के धुंध१४से अलख न्यारा ।
बेद कुरान कूँ छाँड़ दे बावरे, नूर ही नूर करले जुहारा ॥४
करमना भरमना छाँड़ दे बावरे, छाँड़ सब बरत इक बैठ ठाहीं ।
दास गरीब परतीत ही तें कहै, ब्रह्मांड की जोत इस पिंड माहीं ॥५
(१) पावै। (२) अजगैब = छिपा हुआ। (३) निष्ठा । (४) झीना । (५) गुरज्ञान ।
(६) भरिये। (७ धूम। (८) छिद गया। (६) चिड़िया फँसाने की कल। (१०) जाप।
(११) निःतत्त। (१२) चोंच । (१३) कीर्त्ति । (१४) अँधेरा ।

झूलना ६६
॥ झूलना ॥
( १ )
चढ़ो नाम की नाव जहाज भइया, तेरा पार चलन कूँ जो दिल है जी ।
अजब कहर में नाव लागी, जहँ मन मल्लाह जाजुल१ है जी ॥
चप्पे२ चित लावो बरदवान३ बाँधो, बड़ा पन्थ के बीच कूल४ है जी ।
जहँ भँवर भारी नाव डिगमिगै है, ठेकाखावे गहि गलहरी५ जी ॥
सूवा बोलता खाक के पिजरे में, सुरत सिध मेला बुलबुल है जी ।
चिदानन्द चीन्हो ब्रह्म गाजता है, जैसे मधुकर बासना फूल है जी ॥
कहै दास गरीब दलाल सोई, सौदा नाम कीन्हा समतुल है जी ॥
( २ )
बन्दी-छोड़ साहब का नाम लीजै, कटै फंद सब अंध नहि चीन्हता है ।
देई६ धाम कूँ पूज कर मगन होई, देखो सब्द की नहीं यकीनता७ है ॥
भेदी भेद दीन्हा सब्द महल कारे, सीढ़ी सुन्न में लाय कर पैठधाये ।
मारा मोरचा पहलई मोह का जी, बही८ ज्ञान तरवार सिर काट लाये ॥
चढ़े सील संतोष बिबेक बंका,९ जहँ काम दल कटक१० सब फूक दीन्हे।
जब दया के चौतरे चार आये, अनुराग निःतन्त निर्बान चीन्हे ॥
आँखी मार११मैदान गढ़ कोट ढाया, सफर जंग की राड़१२ है खेत भाई
दुरजन मारकर गगन में नाद बाजा, देख दीद वरदीद परतीत आई
चित चौतरे बैठ कर बाँधिया जी, हम लोक परलोक कूँ गमन कीन्हा।
उलटी चाल चाले नहि चूके हैं जी, निरालंब निरवान निःतन्त चीन्हा
गैबी गैब दरियाव में मार गोता, जैसे मीन का खोज नहिं पावता है ।
कहै दास गरीब दरहाल धारा, परबी प्रेम की बेग नहवावता है ॥
( ३ )
बंदी-छोड़ साहब का ध्यान धरो, निरलंब निज नूर निज नेक है जी ।
जलथल में थीर गंभीर गैबी, देखो लोक परलोक में एक है जी ॥
(१) जुलमी । (२) नाव का पानी उलचना । (३) पाल । (४) खाड़ी । (५) गलही,
नाव का माथा । (६) देवी । (७) विश्वास । (८) चली । (६) शूरवीर । (१०) फौज ।
(११) पलक भांजते । (१२) लड़ाई ।

१०० गरीबदास जी की बानी
धर ध्यान दुरबीन यकीन कीजै, दिल देहरे बैठकर परख भाई ।
कुरबान करतार के सेहरे पर, जहाँ सुरत औ निरत दो निरख आई॥
अलह नूर मौला मगन आप है जी, गलतान सुबहान१ सही देख लीजै
बैठा अ्ररस२ के तखत पर आप सांई, दीदार के वास्ते सीस दीजै ॥
देख दीदार दरहाल दरिया, जाके मुकट पर संख रबि झिलमिलै जी ।
जोती जगमगै जोग बिजोग बानी, जाकी खलक में पलक जहान है जी
नहि दीखता मुगध३ दृष्ट आवै, संत खोज लिया कलधूत४ है जी।
सुन्न सैल कर सिंध में सुरत पैठी, जहाँ आप अवगत अनभूत है जी ॥
मनी मारकर छत्र कूँ फेर भइया, होय अदल अवधूत इस भेद हाजी५ ।
अलह बैठकर आप इन्साफ करता, चित चौतरे चूक नहि भई काजी ॥
पड़ै गैब की मार सुमार नाहीं, देखो कुफर कूँ कुफर दिखावता है।
फजल सिर फजल जहाँ होय भइया, जाके एक नहि पल की लावता है॥
सुन्न सिखर के महल में दिया डेरा, चौक चाँदनी बिच नहिपला६ पकड़ै
कुफर कूँ मार पैमाल नीचा करै, लालखाँ७ बाँधकर जहाँ जकड़ै ॥
मलागिर की सेज सूली नजर आवती, मिले सुलतान कूँ कुफर तोड़।
दास गरीब कबीर सतगुरु मिले, सुरत और निरत का तार जोड़। ॥
( ४ )
बंदी-छोड़ साहब कूँ चीन्ह भइया, मारो नूर के सिंध में गैब गोता ।
बिन पंख पंखी उड़ै भँवर सुन में चढ़ै, अच्छै वृक्ष में बैठ निज सुन तोता
दया की दाल और नाम चोखा८ चुगै, सत्त गुरुदत्त बानी बिलासा ।
प्रेम के पींजरे बीच बैठा रहै, करम खिड़की दई तोड़ फाँसा ॥
इक पींजरे पास मंजार६ बैठा रहै, खोज कर खोज कर खोज खोजी ।
कौन से भेद से अरस भूलत रहै, चुगै मत चुगा यह ऋद्ध१० रोगी ॥
(१) पाक (खुदा)। (२) अर्श। (३) गँवार। (४) सोना। (५) जिसने हज्ज किया है।
(६) पल्ला। (७) मन। (८) चावल । (६) बिल्ली। (१०) यह ऋद्धि अर्थात् बिभूति रोग
रूप है।

तृतीय खण्ड: साखी, चौपाई एवं रागबद्ध भजन संग्रह

झूलना १०१
सुन्न के ताक१ में पाँच परपंच हैं, तीन के भवन पर गमन कीजै ।
खड़ा मंजार सिर पीट रोवै सदा, उड़ै आकास बृछ अच्छै लीजै ॥
प्रेम बानी पढ़ै नाम निःचै रटै, चंद चकोर ज्यूँ ध्यान ध्यानी ।
दास गरीब यह खेल जो याद है, तौ पींजरा छोड़ नहिं ब्रह्म ज्ञानी ॥
( ५ )
बंदी-छोड़ साहब कूँ देख भइया, तेरे नैन में बैन बिलास बानी ।
कच्छकुरम जिन धौल धरना धरे, लोक परलोक इक सब्द ठानी ॥
सूक्ष्म सारूप बिस्तार एता किया, आदि अरु अंत मध नाहिं है रे ।
सृष्ट का करता सृष्ट में रम रहा, नैन के बीच में सही है रे ॥
गुलबास निवास जो पहुप गँध झीन है, मुग्ध की दृष्ट में नाहिं आवै ।
सुरत की सैल से निरत आगे चलै, बिना आकार का भेद पावै ॥
पिंड ब्रह्मांड से सिध न्यारी कहूँ, तिर्कुटी भिकुटी नाहिं दसमाँ ।
हद बेहद के मद्ध निज महल है, रोसनी सेज बिन देख चसमाँ ॥
रँग महल की सैर जहँ सुरत निःचल करै, निरत कूँ वार और पार पेलै ।
पिंड ब्रह्मांड का खोज पावै नहीं, बिना आकार आकार मेलै ॥
स्रवन और नैन जहँ नासिका है नहीं, नहीं मन पवन जहँ सीस द्वारा ।
सत कमल काया नहीं खोया पाया नहीं, नूर जहूर अवगत हजारा ॥
जहँ रहत है हंस जो सिध सूभर२ भरा, मीन के खोज मुस्ताक रहना ।
दास गरीब कबीर सतगुरु मिले, समझ कर खेल नहिं भेद कहना ॥
( ६ )
भली भाँत के भेद सूँ रहना यारो, अगर दीप के धाम कूँ जाना है जी ।
चिदानंद कूँ चीन्ह दीदार पावै, जाका तंबू बनाया असमान है जी ॥
बैठा चाँदनी चौक में यार मेरा, अडील३ परदा नहीं तासु के जी ।
बानी बोलता अमर अनुराग रागी, जाका गावना को नहीं गा सके जी
अरस कुरस पर पंथ है झीन मेरा, मीन खोज की बाट लखावता हूँ ।
(१) आला । (२) शुभ्र = निर्मल । (३) बिना डील का ।
१४

१०२ गरीबदास जी की बानी
पलक बीच में सिरे की सैर करता, अगर दीप के धाम चलावता हूँ॥
कहूँ बात बैराट के घाट की जी, ज्ञानी ज्ञान कूँ पाय कर बूड़ जाते ।
इक झिलमिली सिंध है दीप दरिया, कोई ब्रह्मज्ञानी जहाँ जाय नहाते॥
बहै गंग कैलास आकासमाहीं, संभु१ सीस पर सैल है अगम रासा२ ।
जहँ दत्त गोरख नहीं ध्यान ध्यानी, अचल नूर ही नूर देखो तमासा॥
अरसकुरस के बाग में कौन माली, जहँ नूर जहूर के कंद३ हैं जी ।
कहै दास गरीब सँभाल भइया, देखो चाखते नहीं सो अंध हैं जी ॥
( ७ )
खबरदार होय खेलना यार भाई, चिदानंद की चाँदनी बीच रहना।
पग पीठ उलटा नहीं फेरिये जी, सब्द सवाल के सुने से सीस देना॥
कुफल जड़ी हैयार महबूब मेरे, सप्तपुरी का भेद नहिं भेदता है ।
उलट पवन द्वादस के दीप जाई, षट कमल कूँ मूढ़ नहिं छेदता है ॥
ब्रह्म लोक की बात सुन रीझ जाता, रँग रोसनी दीप नहिं दीखता है।
तप जोग कर भक्ति भय मान भाई, अब साखि सब्दी कहा सीखता है॥
गुल सफा की गली में नफस४ कूँ गाड़ दे, मार ले मोरचा तीर तुक्का।
सीस कूँ काट कर हाथ महबूब५ दे, इश्क कूँ छोड़ दे कहाँ लुका६ ॥
मन्सूर७ कूँ देख मौसूल८ यूँ हूजिये, अनल ही हक्क बोलै दिवाना ।
सीस कर कटे हैं रुधिर मुख धोवता, इश्क नहिं छोड़ सूली चढ़ाना ॥
इश्क ही इश्क में फूँक तन दिया है, बहै है अस्थि६ दरियाव माहीं ।
कहै दास गरीब यह इश्क साँचा सही, अमर मन्सूर है हक्क साँई ॥
( ८ )
जल थल के बीच में रम रहा तू, देख दीदार दर हाल है रे ।
वह सेत सुभान१० जहान माहीं, जो अजब महबूब अकाल है रे ॥
(१) संभु = शिव । (२) राशि = समूह । (३) कन्द मूल । (४) नफस = इच्छा ।
(५) प्रीतम । (६) छिपा । (७) मनसूर फकीर अनल हक्क (= हम ही खुदा हैं) कहते
थे जिन्हें मुसलमानों ने सूली चढ़ा दिया । (८) मौसूल = भगवंत के साथ एक हो जाना ।
(६) हाड़ । (१०) सुबहान = पवित्र ।

अरिल १०३
पारस की खान तो मुत्र की धार में, कहाँ मोती हीरा लाल है रे।
गलतान असमान में अजब मौला, इक सृष्टि तिरलोक कहा माल है रे१
जल बूँद सूँ जून२ जहान सब होत है, इक पलक के बीच पैमाल है रे।
पाखंड कूँ पूज पाखंड परलै गया, सृष्टि सूवा ठगा जाल है रे ॥
पत्थर के फेल से फैज पाई नहीं, सीस जम दूत कासाल है रे।
कौन मारै कहो कौन मर जात है, छाँड़ हंसा चला खाल३ है रे ॥
अगर मूल के फूल की बासना कहत हूँ, झिलमिली रंग रसाल है रे।
सेत ही हंस जहाँ सेत सरवर भर्यो, सेत ही कमल जहाँ ताल है रे ॥
बुदबुदे संख कहँ राव और रंक है, नजर दर नजर निहाल है रे।
दरियाव की लहर दरियाव लौलीन है, भँवर और फील जल झाल है रे
भर्म की बुरज सब सीत के कोट हैं४, अजब ख्याली रचा ख्याल है रे।
दास गरीब वह अमर निज ब्रह्म है, एक ही फूल फल डाल है रे ॥
॥ अरिल ॥
( १ )
मौला मगन मुरारि बिसंभर चीन्ह रे।
दिल अंदर दीदार अरस दुरबीन रे ॥ १ ॥
इला पिंगला फेर सुखमना ध्यावही।
त्रिकुटि झरोखे बैठि परम पद पावही ॥ २ ॥
झलकै सिंध अपार मुक्ति का धाम रे।
अचल अगोचर देख पुरुष बरियाम५ रे ॥ ३ ॥
निकट निरंजन नूर जहूर जुहारिये।
मीनी मारग खोज सिंध यूँ फारिये ॥ ४ ॥
नैनों ही में लाल बिसाल अलेख है।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब रूप नहिं रेख है ॥ ५ ॥
(१) एक तिर्लोक की सृष्टि क्या हैसियत रखती है उसकी रची हुई अनंत तिर्लोकियाँ
हैं। (२) योनि। (३) शरीर। (४) धुआँ का सा कोट जो जाड़े में आकाश में बन जाता
है। (५) श्रेष्ठ।

१०४ गरीबदास जी की बानी
( २ )
है मौला मस्तान मुलायम महल रे ।
चीन्हो सब्द सिताव जीवना सहल रे ॥ १ ॥
राजा रंक फकीर फना हो जायँगे ।
बिना बंदगी बाद बहुत पछतायँगे ॥ २ ॥
जनम पदारथ पाय पुरुष जाना नहीं ।
गीदी गदहा स्वान सब्द माना नहीं ॥ ३ ॥
लेखा बारम्बार धरमराय लेत है ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब कसौटी देत है ॥ ४ ॥
( ३ )
बिना मूल अस्थूल गगन में रम रहा ।
कोई न जाने भेव सकल सब भ्रम रहा ॥ १ ॥
अच्छै बृच्छ बिस्तार अपार अजोख है ।
नहीं गाम नहिं धाम भुक्त नहि मोख है ॥ २ ॥
छत्र सिंघासन सेत पुरुष का रूप है ।
बरन अबरन बिचार न छाया धूप है ॥ ३ ॥
देख पदम उँजियार परख नहिं आवही ।
करम लिखा सो होय टरै नहिं भावही१ ॥ ४ ॥
अवगत पूरन ब्रह्म परस परवान रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब सब्द पहचान रे ॥ ५ ॥
( ४ )
सिव ब्रह्मा का राज इंद्र गिनती कहाँ ।
चार मुक्ति बैकुंठ समझ एता लहा ॥ १ ॥
संख जुगन की जूनि२ उमर बड़ धारिया ।
जा जननी कुरबान सु कागज फारिया३ ॥ २ ॥


(१) भावी = होनहार । (२) योनि ! (३) जिसका कर्म का लेखा चुक गया उसकी
जन्म देने वाली (माँ) पूजने योग्य है ।

अरिल १०५
एती उमर बिलंद१ मरेगा अंत रे ।
सतगुरु लगे न कान न भेंटे संत रे ॥ ३ ॥
सौ करोड़ मँडलीक२ जु सावंत३ संग हैं ।
सूरे अनंत अपार पड़े बेनंग हैं ॥ ४ ॥
लंक सरीखा कोट चोट पैमाल है ।
मरना है मैदान सही सिर काल है ॥ ५ ॥
रावन की रस रीत रँगीला राज था ।
चौदह भवन बिवान मनोमई साज था ॥ ६ ॥
इंदर बरुन कुबेर सुमेर सलामियां४ ।
होय होय गये अनंत घने बहु नामियां ॥ ७ ॥
तेंतिस कोट की बंध बिथा५ सुन लीजिये ।
बाँध लाया ससि भानु सजा सुर६ दीजिये ॥ ८ ॥
एक रे जोरा काल सु कूप उसारिया७ ।
ऐसे छल बल कीन्ह सु रावन मारिया ॥ ६ ॥
फोकट राजर पाट पिटेगा अंत रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब भजो निज कंत रे ॥ १० ॥
( ५ )
महमूदी चौतार हमारा८ पहिरता ।
सुलतानी का देस बलख सा सहर था ॥ १ ॥
सोलह सहस सहेली पदमनी भोग रे ।
सतगुरु के उपदेस लिया तज जोग रे ॥ २ ॥
तुरी६ अठारह लाख ऊँट गैबर१० घना ।
सीस महल में सैल बाग नौलख बना ॥ ३ ॥
कस्तूरी तन लेप गुलाबी गंध रे ।


(१) वृथा गई । (२) एक देश का राजा । (३) वीर । (४) सिर झुकाते थे । (५) कष्ट ।
(६) देवता । (७) लटकाया । (८) चार लड़ की हजारा फूलों की माला । (६) घोड़ा ।
(१०) हाथियों का झुंड ।

खाना खाते खूब परम निःचित रे ॥ ४ ॥
दल बादल गज ठाठ अदल तूमार रे ।
सहदाने१ सहनाई महल घूमार२ रे ॥ ५ ॥
हीरे मोती मुकता जवाहिर लाल रे ।
निस दिन खूबी खैर खजाने माल रे ॥ ६ ॥
लागा बान बिहंगम सब्द सबूह रे ।
भलका३ मारा ऐंच दूहबर दूह४ रे ॥ ७ ॥
राज पाट गज ठाठ छाँड़ कफनी लई ।
सार सब्द की चोट तोर बख्तर गई ॥ ८ ॥
नजरी नजर निहाल जिन्दा गुरु पीर था ।
हरे हाँ रे कहत दास गरीब तबीब५ कबीर था ॥ ६ ॥
( ६ )
क्या राजा क्या रेत६ अतीत अतीम७ रे ।
जोधा गये अपार न चम्पी सीम रे ॥ १ ॥
यह दुनिया संसार बतासा खाँड़ का ।
जोरा पीवे घोर बिसरजन८ माड़ का ॥ २ ॥
काम क्रोध मद लोभ बटाऊ लूटहीं ।
हिरस खुदी घट माँह सु बहु बिध कूटहीं ॥ ३ ॥
संसा सोग सरीर सुरसरी९ बहत हैं ।
नाहीं चौदह भुवन गमन१० में रहत हैं ॥ ४ ॥
दुरमत दोजख माहिं बलै११ बहु भाँत है ।
सतगुरु भँटा होय तो निःचै साँत१२ है ॥ ५ ॥
आजिज जीव अनाथ परा है बंद में ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब जगत सब फंद में ॥ ६ ॥


(१) तुरही । (२) धूम । (३) भाला । (४) अंधकार रूपी भ्रम दूर हो गया ।
(५) बैद । (६) रैयत । (७) यतीम । (८) धोवन । (६) नदी । (१०) थिर नहीं रहते आवा-
गमन लगा रहता है । (११) जलै । (१२) शांत ।