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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

१०८ गरीबदास जी की बानी
ऐसे बूड़ै नाव होत हैं गरक रे।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब नाम निज परख रे ॥१२॥
( ८ )
जानै जाननहार सकल की जानता।
घट घट में अबिनासी पूरन प्रान था ॥ १ ॥
अवगत भिन्न अभिन्न महल में महल है।
हाजिर नाजिर देख कहो क्या गहल१ है ॥ २ ॥
अलख पलक के बीच अकासा ईस रे।
सुरत निसानै लाय देख जगदीस रे ॥ ३ ॥
सेत बरन सुभ रंग बिरंग विचार रे।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब देख दीदार रे ॥ ४ ॥
( ६ )
हिरदय कपट कमाल लाल पावै नहीं।
बहुत परिस्रम भूल गाँठ गहिरी गही ॥ १ ॥
मरजीवा२ मन मारि महोदध३ पैठ रे।
अनहद सब्द घमोर४ जहाँ ढुक बैठ रे ॥ २ ॥
त्रिकुटी कमल पर सिंध सरोवर सुन्न रे।
छूट हाथि गढ़ छाँड़ तहाँ रख मन्न रे ॥ ३ ॥
लगै कोट पर चोट अकार पसार है।
उपजे सेती भिन्न जो वस्तु नियार है ॥ ४ ॥
अलख अलेल पदम सदन५ जहँ लाइये।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब रहत६ घर पाइये ॥ ५ ॥
( १० )
नग सरवर पर तरवर७ साखा नहिं मूल रे।
अच्छै बृच्छ अस्थान जहाँ मन भूल रे ॥ १ ॥


(१) गफ़लत । (२) समुद्र में मोती की खोज में गोता लगाने वाला। (३) समुद्र ।
(४) घनघोर । (५) घर । (६) रहित = मोक्ष । (७) पेड़ ।