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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 119

अरिल १०६
पीघू१ अनन्त अपार पड़े तिस धाम रे ।
तत-बेता परम हंस बसैं निःकाम रे ॥ २ ॥
समाधान संजूत२ सलेमाबाद रे ।
अज अमर घर देखो आद अनाद रे ॥ ३ ॥
बैकुंठ बिहिस्त बिसार नास है जात है ।
चल बसा सतलोक नबेला साथ है ॥ ४ ॥
अगर डोरहंचढ़ देख झिलमिली सुन्न रे ।
अजर अमर घर बसो पाप नहिं पुन्न रे ॥ ५ ॥
तहँ वहँ पदम अनन्त परेवा३ जाहिंगे ।
अच्छै बृच्छ फल हंस तहाँ वहँ खाहिंगे ॥ ६ ॥
अमर भूमि अस्थान प्रान जहँ चाल रे ।
अनंत कोटि तहाँ सिद्ध अमीते४ माल रे ॥ ७ ॥
अवगतपुर का राजा अवगत नाम है ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब हमारा गाम है ॥ ८ ॥
( ११ )
यह सौदा सतभाय५ करो परभात रे ।
तन मन रतन अमोल बटाऊ६ साथ रे ॥ १ ॥
बिछुर जायँगे मीत मता सुन लीजिये ।
बहुर न मेला होय कहो क्या कीजिये ॥ २ ॥
सील संतोष बिबेक दया के धाम हैं ।
ज्ञान रतन गुलजार सँघाती राम हैं ॥ ३ ॥
धरम धजा फरकंत फरहरैं लोक रे ।
ता मध अजपा नाम सु सौदा रोक७ रे ॥ ४ ॥
(१) पैगू=पन्ना की किस्म का एक जबाहिर । (२) संयुक्त । (३) कबूतर अर्थात्
जीव। (४) बेहिसाब । (५) सत्त भाव । (६) ठग । (७) नकद दाम से लेना ।
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