गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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सून महल अरु मंदिर बासे काग रे ।
हरे हाँ रे कहता दासगरीब जगत निरभाग१ रे ॥१३॥
( १५ )
खलक मुलक कूँ देख संघाती कोउ नहीं ।
जम का है मुख्तार सीस बैठे वहीं ॥ १ ॥
होगा हाल बिहाल सब्द कूँ सोध रे ।
पुत्र बिसारा माता बालक गोद रे ॥ २ ॥
और सहेली आन सैन बतलाइया ।
कंठ धुकधुकी आन यान२ समझाइया ॥ ३ ॥
ऐसे मौला३ खोया महल के माहिं रे ।
हरे हाँ रे कहता दासगरीब बृच्छ मध छाँह रे ॥ ४ ॥
( १६ )
न्यारा कभी न होय निरंजन देह से ।
रहा सकल घट पूर परम सुख नेह से ॥ १ ॥
ज्यूँ दरिया मध लीन मीन मग जोह रे ।
पंछी पैर अकास खोज४ नहिं होय रे ॥ २ ॥
बिन पंखों के भौंरा उड़ै अकास कूँ ।
इला पिंगला सुखमन सोधै स्वास कूँ ॥ ३ ॥
गूँगे ने गुड़ खाया कैसे जानिये ।
सैन सुकृत से पावै बचन पिछानिये ॥ ४ ॥
काली पीली सुरही५ धौली धेनु रे ।
सेत बरन सब दूध सकल इक बैन रे ॥ ५ ॥
नहीं ऊँच नहिं नीच निरञ्जन जाति रे ।
करता के सब माहिं दिवस औ रात रे ॥ ६ ॥
(१) अभागा । (२) कूँच । (३) ईश्वर । (४) निशान । (५) गाय ।