गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० गरीबदास जी की बानी
चले बनिजवा१ ऊट२ हूँट गढ़ छाँड़ रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब लगै जम डाँड़ रे ॥ ५ ॥
( १२ )
जम जोरा का जाल काल खग३ सीस रे ।
हैफ४ होत छिन माहिं सुमिर जगदीश रे ॥ १ ॥
ऐसा साज बनाय बिसर नहिं जाइये ।
जनम पदारथ खोय बहुर कहँ पाइये ॥ २ ॥
जम जोरा का जोर कठोर बिजोग है ।
सर्ब लोक सिर साल सु दीरघ रोग है ॥ ३ ॥
जो जाने तो जान सब्द कूँ मान रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब होत है हान रे ॥ ४ ॥
( १३ )
सावँत५ औ मँडलीक६ गये बहु सूर रे ।
राजा रंक अपार मिले सब धूर रे ॥ १ ॥
रुई लपेटी आग अँगीठी आठ रे ।
कोतवाल घट माहिं मारता काठ७ रे ॥ २ ॥
नरक बहै नौ द्वार देहरा गंद रे ।
क्या देखा कालि माहिं पड़ा क्यूँ फंद रे ॥ ३ ॥
हासिल८ का घर दूर हजूर न चालता ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब हटी९ में लाल था ॥ ४ ॥
( १४ )
हाट पटन बाजार वजन१० फीका पड़ा ।
जम किंकर का तौक आन गल में पड़ा ॥ १ ॥
(१) बंजारा, प्राण । (२) उठना । (३) चिड़िया । (४) अफसोस । (५) वीर ।
(६) एक मंडल का राजा । (७) चोर को हवालात रखने के लिये लकड़ी में छेद करके
उसमें पाँव डाल कर कील से ठोक देते हैं । (८) लाभ, तत्त्व वस्तु । (६) हाट=
दूकान । (१०) तौल ।