श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
७२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
दीपक जिस प्रकार घर को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार जीवज्योति देह को प्रकाशित करती है। वही
मेरी साकार मूर्ति का हृदय में चिन्तन करती है। घृत जमने पर स्वयं रंगविहीन होने पर भी रंग, रूप, आकार
लेता है, उसी प्रकार मेरा चैतन्य ढल कर रूप में साकार हो गया है। ऐसी वह मेरी सगुण मूर्ति चिन्मात्र तेज
से हृदय को प्रकाशित करती है। वही सारे देह में समाकर मन में भक्ति उत्पन्न करती है। देह जड़, मूढ़ और
अचेतन है। उसमें चिन्मय मूर्ति प्रकट होकर अचेतन को सचेतन कर उल्हास से भजन करवाती है। हिरन का
स्वांग करने वाला जिस प्रकार हिरन के ही रूप में नाचता रहता है, उसी प्रकार भक्त के रूप में भजन पूजन
करने वाला स्वयं नारायण ही है। इस प्रकार चिन्मय-चिद्धन मूर्ति की पूजा करने से अभेद भक्ति उत्पन्न होती
है और पूज्य और पूजक यह स्मृति सहज ही धुँधली पड़ जाती है। यह भजनभेद समाप्त होते ही भक्ति का
अभेद बोध बढ़ता जाता है। यही अतिशुद्ध, प्रसिद्ध और मुझे प्रिय गुरुमार्ग है। जहाँ मेरी अभेद भक्ति रहती है,
वहाँ मैं स्वानंद प्रेम के उल्लास से पूर्णतया भक्तों के अधीन रहता हूँ। जिस प्रकार अपार वर्षा के जल को
बाँध बनाकर तालाब में एकत्र किया जाता है, उसी प्रकार अभेद भजन के योग से मुझ अनंत से ऐक्य किया
जाता है। जंगल में अतुल वर्षा होने से उत्तम फल नहीं आएगा, लेकिन वर्षा का जल तालाब में एकत्र करने
से उससे अच्छे चावल की खेती हो सकती है। उसी प्रकार मेरा अनंत अपार स्वरूप प्रेमपूर्वक अभेद भावना
के भक्तों में ही दिखाई देता है। तब ब्रह्मानन्द परमोत्कर्ष पर पहुँचता है और भक्ति अपने शिखर पर जा
पहुँचती है। अभेद भावना के भक्त के पास तीर्थ भी पवित्र होने के लिये आते हैं। देव और मानव उसके
चरणों पर गिरते हैं और मैं भगवान भी उसके पास रहता हूँ। अभेद भावना के भक्त के पास सारे तीर्थ आकर
निर्दोष हो जाते हैं। वह भक्ति का मायका है। मुझे भी उनके ही कारण सुख प्राप्त होता है। अभेद भक्ति का
ही नाम 'उत्तम भक्ति' है ऐसा श्रीकृष्ण ने अत्यन्त उल्लास से उद्धव से कहा। अभेद भक्ति के सम्बन्ध में प्रेम
से बताते समय कथा भाग एक ओर रह गया इसका उन्हें स्मरण ही नहीं रहा। भगवान निरूपण भूल गये
लेकिन उद्धव के मन पर भक्ति की पहचान अमिट हो गयी। वह भी अपने उद्धव को भूल गया और कृष्ण
भी अपने अस्तित्व को भूल गये। अभेद भजन के हर्ष से देव और भक्त एक हो गये। दोनों स्तब्ध होकर बैठ
गये और परम सुखी हो गये। उद्धव जब आत्मज्ञान से इतना अधिक पूर्ण था तो फिर उसे पूजाविधान पूजने
की क्या आवश्यकता थी? ऐसी शंका मन में होगी। तो उद्धव के मन में यह था कि यदि मैं चुपचाप बैठा
रहा तो यह निजधाम चला जायेगा। इसलिये वह प्रश्न पूछने लगा। उपासना कांड का गुप्त ज्ञान, आगमोक्त
पूजा विधान आदि वेद का अर्थ उद्धव के बहाने श्रीकृष्ण स्वयं ही बताने लगे। सचमुच, साधकों की जैसी
श्रद्धा हो, वैसी ही सिद्धि प्राप्त हो, इसलिये वेदार्थ का सारा शास्त्रविधि श्रीकृष्ण इस ग्रन्थ में प्रतिपादित कर
रहे हैं। अद्वैत भक्ति के बारे में सुनते-सुनते उद्धव मन में तृप्त हो गया। इससे श्रीकृष्ण को भी समाधान हुआ।
उसने आनन्दपूर्वक कहा, उद्धव! ध्यान से सुनो, आगे का यथोक्त पूजाविधान तुम्हें सुनाता हूँ। पूज्य और
पूजक की एकात्मता का ध्यान दृढ़ कर, उसका ही बाह्य पूजा के लिए प्रतिमा में आवाहन करें। स्वयं प्रतिमा
के सामने बैठ कर, आवाहन मुद्रा दिखाकर, मेरा सारी चित्कला उस प्रतिभा में आ गयी है ऐसी भावना करें।
उस समय मूर्ति की जड़ता का ख्याल न करें, मूर्ति चैतन्यरूप है, ऐसी ही कल्पना करें। इसी का नाम है
मुख्य 'आवाहन'। गुरु के मुख से मिला हुआ मंत्र निर्दोष होता है। इसलिये उस मंत्र से मूर्ति के सर्वांग पर,
आगमशास्त्र के अनुसार सभी न्यास धीरे-धीरे करें। इस प्रकार आवाहन, संस्थापन, संन्निधि, संनिरोधन,
संमुखीकरण, स्वायतन ये मुद्रायें करके दिखायें।
सत्ताईसवाँ अध्याय ७२५
पाद्योपस्पर्शार्हणादीनुपचारान् प्रकल्पयेत्।
धर्मादिभिश्च नवभिः कल्पयित्वाऽऽसनं मम॥ २५॥
पद्ममष्टदलं तत्र कर्णिकाकेसरोज्ज्वलम्।
उभाभ्यां वेदतन्त्राभ्यां मह्यं तूभयसिद्धये॥ २६॥
स्नान मण्डप की कल्पना कर वहाँ चित्स्वरूप देवता को लायें और पाद्य, अर्घ्य, आचमन, मधुपर्क आदि
विधियाँ करें। अभ्यंग से अंगमर्दन कर पुरुष सूक्त से स्नान करायें और स्नान के मण्डप में ही देवता को पीताम्बर
धारण करायें। अन्य यथोक्त पूजन सिंहासन पर ही करायें। उस आसन और पीठावरण के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण
स्वयं बता रहे हैं। सिंहासन पर के आवरण क्रम में आधारशक्ति, मूलप्रकृति, क्षीराब्धि, श्वेतदीप तथा वहाँ के
मनोरम कल्पवृक्ष इत्यादि की वहाँ भावना करें। उसके नीचे सुन्दर रत्न मण्डप, उसमें सुवर्ण के पलंग की कल्पना
करें। उस पलंग के बारे में श्रीकृष्ण बताते हैं धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य ये उस मंचक के चार पैर हैं। अधर्म,
अज्ञान, अनैश्वर्य तथा अवैराग्य ये उस मंचक के चौखट की चार आड़ी लकड़ियाँ हैं। ईश्वर तत्त्व सूत है,
गुणागुण से उसे बुनकर यह मंचक योगयुक्त महामुद्रा से मजबूती से बुना हुआ है ऐसी कल्पना करें। उस मंचक
पर अत्यन्त सुन्दर और सुशोभित शेष कुण्डली मार कर बैठा है तथा उसके पीछे उसके सहस्र फन रत्नों की
दिव्यता से दमक रहे हैं। शेष के वर्तुल में डंठल के साथ निर्मल लाल कमल खिला हुआ है, उसकी आठ
पंखुड़ियाँ हैं जो अपनी मनोहर शोभा बिखेर रही हैं। सत शक्ति यह उस कमलकंद का मूल है तथा ज्ञान उसकी
सरल नाल है और अष्टधा प्रकृति उस कमल की आठ पंखुड़ियाँ हैं। ऐसा वह सुन्दर कमल है तथा षड्विकार
उसके केसर हैं और वैराग्य उसका सुगन्धित मकरंद है। पूर्वादि अष्टदिशा के कमलदलों में उन-उन देवताओं का
न्यास करें। विमला, उत्कर्षिणी ज्ञाना और चौथी क्रियाशक्ति। उसी प्रकार योगा, प्रह्वी, सत्या और ईशाना इन
अष्टशक्तियों की स्थापना करें। उसी प्रकार अनुपम कल्पना से सजे हुए कमल के मध्यभाग में नौवें अनुग्रह की
स्थापना करें। आत्मा, अंतरात्मा और परमात्मा यह देवोत्तम का अगला भाग है। सत्त्व, रज, मोह, तम, यह उस
पुरुषोत्तम का पृष्ठभाग है। इस प्रकार धीरे-धीरे आगमोक्त पीठ न्यास कर देवाधिदेव को सिंहासन पर ले आयें।
छत्र और दो चँवर के साथ अनेक प्रकार के वाद्यों के जयघोष में उचित ढंग से मुद्रा दिखाकर श्रीहरि को आसन
पर बिठायें। मैं सर्वव्यापी होते हुए मेरा आवाहन करते हैं, मुझ निर्विकार को विकार मुद्रा दिखाते हैं। मुझ
ज्ञानस्वरूप को आँखें, निःशब्द को कान तथा मुझ विश्वतोमुख को सुन्दर मुख है ऐसी कल्पना करते हैं। मैं
विश्वपाद होते हुए दो पैरों से चलता हूँ; मुझ विश्वबाहु को चार हाथ हैं; और सर्वगत को एकदेशी स्थान की
कल्पना करते हैं। मुझ निरूपचार को उपचार; मुझ निदेह को अलंकार और सदा सम रहने वाले को शत्रु-मित्र;
ऐसी विचित्र कल्पना करते हैं। मुझ अकर्त्ता को कर्मबन्धन; अजन्मा को जन्म-निधन; नित्य-तृप्त को भोजन; और
निर्गुण को सगुण ऐसी कल्पना करते हैं। इन सबका यही तात्पर्य है कि उपासना काण्ड का निर्वाह हो। उपासकों
की जैसी भावना रहती है, उसके अनुसार मैं उनका देव बनता हूँ। मैं पूर्णकाम होते हुए भी भक्त के प्रेम के लिये
सकाम बनता हूँ। भक्तों का जैसा भाव होता है उसके अनुसार मैं पुरुषोत्तम उन्हें दिखायी देता हूँ। भक्त मेरे प्रति
जैसी भावना रखता है, वैसा ही मैं उसके लिये हो जाता हूँ। वह भावार्थ से मुझे जो भी अर्पण करता है, वह
सहज ही मेरे पास पहुँचता है। मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ, भक्त मुझे अर्पण करने के लिये जहाँ भी कहीं बैठा हो लेकिन
वह मुझे अनायास सहज ही अर्पण होता है। मैं देवाधिदेव सर्वत्र उपस्थित हूँ ऐसी प्राणियों में भावना नहीं होती,
७२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इसलिये जहाँ भक्तों की भावना रहती है, वहाँ सहज ही मैं देव प्रकट हो जाता हूँ। सारांश, भक्तों को भावार्थ मुझे
अत्यन्त प्रिय लगता है, उसके आगे मुझे वैकुण्ठ अथवा क्षीराब्धी भी अच्छा नहीं लगता। भक्तों के भावार्थ का
अलंकार धारण करने के लिये मुझ निर्गुण श्रीकृष्ण को सगुण रूप लेना पड़ता है। यह सब भक्तों के भावार्थ के
लिये। इसीलिये मैं अजन्मा होते हुए जन्म लेता हूँ, अकर्मा होते हुए भी कर्म करता हूँ, अनामा होते हुए भी भक्तों
को मनोधर्म से प्रसन्न करने के लिये नाम धारण करता हूँ। निर्गुण के प्रति मन रमने पर वह चैतन्यरूप हो जाता है
और सगुण स्वरूप में मन लीन हो जाने पर साधक स्वयं ही श्रीकृष्णरूप हो जाते हैं। निर्गुण का ज्ञान होना
अत्यन्त कठिन है, इसीलिये यह उपासना की योजना की गयी है। सगुण मूर्ति की भावना मन में रखकर साधना
करने से साधक अनायास तर जाते हैं। यह उपासना विधि का आगमोक्त विधान था। इससे साधकों को भोग और
मोक्ष दोनों साध्य होते हैं और मैं कृपानिधि सन्तुष्ट होता हूँ। अब आवरण पूजा का विधि बताता हूँ।
सुदर्शनं पाञ्चजन्यं गदासीषुधनुर्हलान्।
मुसलं कौस्तुभं मालां श्रीवत्सं चानुपूजयेत् ॥ २७॥
अण्वी-जीवकला को देहावरण, सिंहासन पर शक्ति का आवरण और सुदर्शनादि अस्त्रों के बारे में श्रीकृष्ण
स्वयं ही बता रहे हैं। लपलपाता हुआ तेज धार का 'सुदर्शन'; शोभायमान 'पांचजन्य', शंख, 'नंदक' नाम का
खड्ग और 'कौमोदकी' नामक प्रचण्ड गदा अत्यन्त मजबूत 'शार्ङ्ग' नामक धनुष्य; सुवर्णमय पंख के सरल बाण;
'हल' और 'मूसल' इन प्रबल अस्त्रों की पूजा करें। सशस्त्र सरल आठ हाथ, गले में कौस्तुभ मणि और
वनमाला; कटि के नीचे परिधान किया पीला पीताम्बर, ऐसी मेघ जैसी श्यामवर्ण सुन्दर मूर्ति की कल्पना करें।
साक्षात् लक्ष्मी का पति लेकिन ब्राह्मण ने मारी हुई लात अलंकार के रूप में हृदय पर अंकित करने वाला ब्राह्मण
भक्त देव उस श्रीवत्स चिह्न से विलक्षण शोभा प्रदान करता है। उस वत्स की पूजा करें। चिद्रत्नों के अलंकार में
से गुण बाहर निकाल कर अत्यन्त कुशलतासे पिरोयी हुई वैजयन्ती माला भी हृदय पर लहरा रही है। इस प्रकार
सालंकार और सायुध; शंख, चक्र, पद्मादि के साथ अद्भुत दीखने वाला स्वयंबोध (स्वयंप्रकाश) भगवान जिसके
पास नारदादि सदा उपस्थित रहते हैं। इस प्रकार अलंकारों के साथ पूज्य जो श्रीहरि हैं उसकी पूजा कर फिर
उसके परिवार की पूजा करें। वह पार्षद भी तुम्हें विस्तार से बताता हूँ।
नन्दं सुनन्दं गरुडं प्रचण्डं चण्डमेव च।
महाबलं बलं चैव कुमुदं कुमुदेक्षणम् ॥ २८ ॥
नंद और सुनंद ये सदा देव के पास रहते हैं। गरुड़ तो सदा आँख के सामने खड़ा ही रहता है। चण्ड और
प्रचण्ड ये दोनों ओर रात-दिन खड़े रहते हैं। बल और महाबल ये नेत्र संकेत से ही किसी भी आशा का पालन
करने के लिये तत्पर रहते हैं. और कुमुद और कुमुदाक्ष ये दोनों महाबलि पीछे खड़े रहते हैं। गरुड़ आँखों के
सामने ही खड़ा रहता है; और शेष नंदादिक आठ असामी आठ दिशाओं की ओर रहते हैं। इस प्रकार श्रीहरि के
सान्निध्य में रहने वाला पार्षदावरण है।
दुर्गां विनायकं व्यासं विष्वक्सेनं गुरून् सुरान्।
स्वे स्वे स्थाने त्वभिमुखान् पूजयेत् प्रोक्षणादिभिः ॥ २९ ॥
इसके अतिरिक्त दुर्गा, विनायक, व्यास और विष्वक्सेन को चार कोनों में स्थापित कर, देवताओं के साथ ही
उनका भी पूजन करें। मूल मूर्ति से एकरूप रहने वाले गुरु और परम गुरु का परमेष्ठी गुरु से ऐक्य स्थापित कर
सत्ताईसवाँ अध्याय ७२७
उनका पूजन करें। गुरु-दुर्गादिक तथा अष्ट लोकपालों की, प्रोक्षण पाद्य आदि उपचारों से निश्चल मन से यथासांग
पूजा करें। उस पूजा के क्या उपचार हैं आदि के बारे में श्रीकृष्ण अगले छह श्लोकों में संक्षेप में बता रहे हैं।
चन्दनोशीरकर्पूरकुंकुमागुरुवासितैः ।
सलिलैः स्नापयेन्मन्त्रैर्नित्यदा विभवे सति ॥ ३० ॥
स्वर्णधर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया।
पौरुषेणापि सूक्तेन सामभी राजनादिभिः ॥ ३१ ॥
इलायची, खस, कर्पूर, चन्दन, रोरी, केशर तथा उसमें अगर मिलाकर उससे सुगन्धित किया हुआ जल
स्नान करने के लिये दें। सुगन्धित किया हुआ यह पवित्र गंगा जल शंख में शंखमुद्रा दिखाकर भरें। ऐसा शुद्ध
जल लेकर आपस्तंभ शाखा का 'सुवर्णधर्म' अनुवाक पढ़कर उससे अभिषेक करें अथवा केवल पुरुषसूक्त,
रुद्राभिषेक या विष्णुसूक्त मंत्रों से देवता को स्नान करायें अथवा सामवेद का गायन कर अर्थात् उसमें के राजनादि
साम गाकर उससे देवता को स्नान करायें। द्रव्य की अनुकूलता के अनुसार इस ठाठ से प्रतिदिन महाभिषेक करें।
अन्यथा किसी विशेष पर्व पर अथवा जयन्ती उत्सवों के समय इस प्रकार का स्नान करायें। आगमशास्त्र में वर्णित
सुलक्षण महापुरुष विद्या आदि के साथ देवता को स्नान करायें। देवता का सम्पूर्ण स्नान होने के बाद मंगलारती
करें और फिर देवता को वस्त्र, आभूषण आदि से अलंकृत करें।
वस्त्रोपवीताभरणपत्रस्रग्गन्धलेपनैः ।
अलंकुर्वीत सप्रेम मद्भक्तो मां यथोचितम् ॥ ३२ ॥
देव मेघ की तरह श्यामवर्ण का है। उसकी कटि में जरी का पीताम्बर पहनायें, गले में सुवर्ण यज्ञोपवीत
डालकर कटि में रत्नजड़ित करधनी पहनायें। कंकण चूड़ियों का सुमधुर घोष, पैरों में घुँघरू की झंकार, मस्तक
पर मनोरम मुकुट, कान में कुण्डल तथा हृदय पर सुन्दर महापदक ! कपाल पर जड़ित मोतियों की बेल, उसके
नीचे पीले चंदन का टीका, कंठ में शोभे कौस्तुभ, बाहुओं पर कंकण, उँगलियों में रत्नों से जड़ी अँगूठियाँ और
पीताम्बर की आभा तो ऐसी कि उसके तेज के आगे सूर्य का तेज भी फीका पड़ जाये। भगवान के साँवले अंग
पर शुभ्र चन्दन का लेप शोभा दे रहा है मस्तक पर केशों पर लपेटी पुष्पों की माला है जिस पर भ्रमर अपने
घोंसले बनाने की ताक में हैं। 'वैजयंती' और वनमाला पैरों तक झूल रही हैं और आँखों को भव्य दिखायी दे रही
हैं। इस प्रकार वह मेघ श्याम देव सुशोभित दिखायी दे रहा है। इस प्रकार वस्त्रालंकार भूषणों से श्रीहरि की पूजा
करें। लेकिन पूजा से भी अधिक श्रद्धा मन में होनी चाहिये। भक्त अत्यन्त सम्पन्न हो अथवा दरिद्र हो, जहाँ
परिपूर्ण श्रद्धा होती है वहीं नारायण सन्तुष्ट होता है। सकल पूजा में श्रद्धा ही प्रमाण है। जो अत्यन्त श्रद्धालु होता
है वही देव का अत्यन्त लाडला होता है।
पाद्यमाचमनीयं च गन्धं सुमनसोऽक्षतान्।
धूपदीपोपहार्याणि दद्यान्मे श्रद्धयार्चकः॥ ३३ ॥
इस प्रकार मूर्ति का पूरी तरह शृंगार करने के बाद पाद्य, अर्घ्य और आचमन करें और मधुपर्क विधान कर
श्रद्धायुक्त पूजा करें। गन्ध, अक्षत, अच्छे सुगन्धित फूल, दशांग धूप, दीपदान, नीरांजन आदि साहित्य के साथ
साधकों को पूर्ण श्रद्धा से मेरी पूजा करनी चाहिये।
७२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
गुडपायससर्पींषि शष्कुल्यापूपमोदकान्।
संयावदधिसूपांश्च नैवेद्यं सति कल्पयेत् ॥ ३४ ॥
धूप, दीप, नीरांजन आदि दिखाने के बाद देवता को भोजन अर्पण करें। उनमें नाना प्रकार के पकवान तथा
षड्रसयुक्त भोजन हो। सादे और शर्करायुक्त पराठे, गुजिया, अमृत फल, रबड़ी, दूध औटा कर उसमें बनायी हुई
खीर, विभिन्न प्रकार के बड़े, तिल्ली के तथा बेसन के लड्डू, खट्टे पकौड़े आदि पदार्थ भगवान को परोसें। दूसरी
पंक्ति में सब्जियाँ हों, बीच में पतले और मुलायम चावल का भात हो, उस पर मूँग की दाल तथा घर में तैयार
किया हुआ सुगन्धित घृत हो। गुड और केसर मिलाकर तैयार किया हुआ हलुआ हो, उसी प्रकार छाछ की कढ़ी
हो, आमरस से भरी हुई कटोरी हो जिसे देखकर इन्द्र की भी लार टपकने लगे। नैवेद्य में दही, दूध, मलाई,
शक्कर आदि पदार्थ रखें। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि देवता उपचारों की ओर ध्यान नहीं देते। वे श्रद्धा से
ही तृप्त हो जाते हैं। यदि सामर्थ्य हो तो इतने पदार्थ रोज तैयार कर देवता को नैवेद्य अर्पण करें। अन्यथा किसी
विशेष पर्व पर अर्पण करें। सचमुच, जो अपनी उपास्य मूर्ति हो उसके जयन्ती अथवा विशेष पर्व पर अर्पण करने
का पूजोपचार श्रीहरि बता रहे हैं।
अभ्यङ्गोन्मर्दनादर्शदन्तधावाभिषेचनम्।
अन्नाद्यं गीतनृत्यादि पर्वणि स्युरुतान्वहम्॥ ३५ ॥
आगमशास्त्र में बताये गये पर्व अथवा अन्य वार्षिक पर्व आते हैं, अथवा अपनी उपास्य मूर्ति की जयन्ती
आती है उस दिन की पूजा श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं। दंतधावन, उद्वर्तन, अभ्यंजन मूर्ति को देकर पंचामृत से स्नान
करायें और नाना प्रकार के आभूषणों के साथ उसकी पूजा करें। इसके उपरान्त उसे षड्रस अन्न का नैवेद्य अर्पण
करें। फिर हाथ धोने के लिये सुगन्धित उदक देकर मुखशुद्धि के लिये ताम्बूल अर्पण करें। देव को अपने देवत्व
का विस्मरण हो गया था। वह देवत्व अब उसे प्राप्त हो गया, इस भावना से देवता को दर्पण दिखायें। इससे
भगवान को सन्तोष प्राप्त होता है। विशेष पर्व के दिन अथवा जयंती के दिवस पर संत वैष्णवों को एकत्र कर,
प्रेमपूर्वक रात-दिन गीत, नृत्य और कीर्तन का आयोजन करें। उसी प्रकार शास्त्रों के अनुसार दीक्षा लेकर हवन
करने से भी देवता तत्काल प्रसन्न होता है। उद्धव ! उस होम का विधिविधान भी अच्छी तरह ध्यान देकर सुनो।
विधिना विहिते कुण्डे मेखलागर्तवेदिभिः।
अग्निमाधाय परितः समूहेत् पाणिनोदितम् ॥ ३६ ॥
परिस्तीर्याथ पर्युक्षेदन्वाधाय यथाविधि।
प्रोक्षण्याऽऽसाद्य द्रव्याणि प्रोक्ष्याग्नौ भावयेत माम्॥ ३७॥
कुण्ड का विधान अर्थात् आगमशास्त्र में वर्णित उसकी लम्बाई, चौड़ाई, गहराई तथा कोनों का प्रमाण
लेकर ऊँचाई भी ठीक तरह से नाप लें तथा कुण्ड तैयार करें। अपनी शाखा के वेद में वर्णित मेखला के साथ गर्त
को साधकर योनि के साथ यथोक्त लक्षण की वेदी तैयार करें। उस पर अग्न्याधान कर जो अग्नि तैयार किया गया
हो, उसका करस्पर्श कर परिसमूहन करें। दर्भ से परिस्तरण करें और तदुपरान्त परिसमूहन करें। दर्भ से परिस्तरण
करें और तदुपरान्त पर्युक्षण करें। इध्माबर्ह का विसर्जन कर उस पर त्रिसंधान रखें। बर्ही का आस्तरण कर उस पर
घृत का बर्तन रखें। व्याहर्तीं से समिधाओं का होम करने की क्रिया को 'अन्वाधान' कहते हैं। प्रोक्षणीपात्र का जो
सत्ताईसवाँ अध्याय ७२९
विधान हो उसे पूरा कर उसे जल से पूरा भर लें। फिर दर्भ (कुश) के शीर्ष से उसमें का उदक लेकर सारे
होमद्रव्यों पर प्रोक्षण करें। फिर कुण्ड के प्रदीप्त अग्नि में मेरा ध्यान करें। उस ध्यान की मूर्ति का लक्षण स्वयं
श्रीकृष्ण ही बताते हैं।
तप्तजाम्बूनदप्रख्यं शङ्खचक्रगदाम्बुजैः।
लसच्चतुर्भुजं शान्तं पद्मकिञ्जल्कवाससम् ॥ ३८ ॥
स्फुरत्किरीटकटककटिसूत्रवराङ्गदम्।
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम् ॥ ३९ ॥
तप्तसुवर्ण की कांति के समान उस मूर्ति की अंग कांति है तथा अत्यन्त सुशोभित और चिन्मात्र गाभा वाली
ऐसी साकार है। हाथ में शंख, चक्र, पद्म ये अस्त्र कटि पर पीताम्बर, आभा ऐसी कि उसके आगे अग्नि की आभा
भी फीकी पड़ जाय। मुकुट, कुण्डल, मेखला अर्थात् कमरपट्टा, वक्षःस्थल पर शोभा देने वाला श्रीवत्सलांछन, पैरों
तक लटकने वाली वनमाला और गले में झलकने वाला कौस्तुभमणि, ऐसी मूर्ति का ध्यान करें।
ध्यायन्नभ्यर्च्य दारूणिहधिषाभिघृतानि च।
प्रास्याज्यभागावाधारौ दत्त्वा चोज्यप्लुतं हविः ॥ ४० ॥
इस प्रकार अग्नि में यथासांग मेरे ध्यान की कल्पना कर, उसका आवाहन और पूजन कर विधियुक्त होम
की शुरुआत करें। अग्नि का विधियुक्त आवाहन कर समिधायें घृत में भिंगो कर पहले होम में दो आज्य भाग की
आहुति दें। उसमें तिल्ली, घृत आदि होमद्रव्य लेकर घृत में भिंगोकर आगमोक्त विधि से होम करें। वह विधान
श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
जुहुयान्मूलमन्त्रेण षोडशार्चावदानतः।
धर्मादिभ्यो यथान्यायं मन्त्रैः स्विष्टकृतं बुधः ॥ ४१ ॥
देवता के मुख की ओर ध्यान देकर साधकों को अष्टाक्षरी मूलमंत्र से होम करना चाहिये अथवा पुरुषसूक्त
की सोलह ऋचायें पढ़ कर होम करने की भी विधि है। पहले बताये गये पीठार्चन में से धर्मादिक देवताओं को,
तथा अन्य देवताओं की यदि पूजा की हो तो उन्हें भी नाममंत्र से एक-एक अवदान दें। फिर साधक को
'स्विष्टकृता' का भी विधियुक्त अवदान करना चाहिये। मेरा ऐसा भजन सज्ञान भक्त जानते हैं। होम आदि की
सहायता से मूर्तिभजन की विधि से साधकों को तत्काल सिद्धि प्राप्त होती है और हे उद्धव! ऐसे भक्त ब्रह्मपद
प्राप्त करते हैं यह निश्चित रूप से जान लो।
अभ्यर्च्यथ नमस्कृत्य पार्षदेभ्यो बलिं हरेत्।
मूलमन्त्रं जपेद् ब्रह्म स्मरन् नारायणात्मकम् ॥ ४२ ॥
इस प्रकार विधियुक्त होम और पूजन कर देव को साष्टांग नमस्कार करें और फिर देव के सेवकों को बलि
अर्पण करें। इसके उपरान्त जहाँ बाह्य प्रतिमा का पूजास्थान हो वहाँ जाकर ध्यानपूर्वक मूलमंत्र का स्मरण करें।
पूज्य और पूजक से जो भिन्न नहीं है उस परात्पर नारायण को उस परब्रह्म के प्रति मन में ध्यान कर अंतःकरण से
आसन लगायें। ध्यान में जब तक मन स्थिर रहे तब तक आसन स्थिर रखें। जब वहाँ मन को शान्ति मिले तो
अगली पूजा विधि कैसी हो इसके बारे में श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
७३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
दत्त्वाऽऽचमनमुच्छेषंविष्वक्सेनाय कल्पयेत्।
मुखवासं सुरभिमत् ताम्बूलाद्यमथार्हयेत्॥ ४३॥
इस प्रकार ध्यान का विसर्जन होने पर देवता का भोजन हो गया ऐसी कल्पना कर, उसे शुद्ध आचमन
अर्पण करें। अग्नि का मूर्तिध्यान एवं स्वयं पूजी हुई प्रतिमा इन दोनों स्थानों में यथोक्त रीति से शुद्ध आचमन
समर्पित करें। देवता के नैवेद्य का अवशिष्ट भाग विष्वक्सेना को दें और फिर जूठन साफ करवाये। देवता के हाथ
धुलवायें। कर्पूर मिलायी हुई सुपारी के कतरे, पके पान का ताम्बूल, कत्था आदि मिलाकर रुचि के लिये दें।
इलायची, लौंग, कंकोल, थोड़ा जायफल, इन पदार्थों से युक्त ताम्बूल से देव का मुख रंग जाता है और अत्यन्त
सुन्दर लगता है। चोवा, (चंदन से तैयार किया एक सुगन्धित पदार्थ) कस्तूरी, बुक्का तथा पुष्पांजलि अर्पण करें।
अब जिससे श्रीकृष्ण शीघ्र प्राप्त होंगे उस प्रेम के बारे में श्रीहरि बता रहे हैं।
उपगायन् गृणन् नृत्यन् कर्माण्यभिनयन् मम।
मत्कथाःश्रावयञ्छृण्वन् मुहूर्त क्षणिको भवेत्॥ ४४॥
ज्ञान, ध्यान, उपासना ये सब गौण बातें हैं; देव भाव का भोक्ता। सचमुच देव भाव से ही प्राप्त होता है।
मन ध्यान से फिसल जाय तो मेरा नामस्मरण करें; अथवा आदरपूर्वक मेरे गुणों का श्रवण करें। हरि के गुणों का
अथवा हरि के यश का श्रवण करने से अंतःकरण को सुख प्राप्त होता है। उस सुख से उत्स्फूर्त हो स्वयं
हरिकीर्तन करें। बहुरुपिया की तरह स्वच्छंद होकर हरि के सभामण्डप में नाचें गायें। गोवर्धन पर्वत किस तरह
उठाया होगा इसका अभिनय स्वयं करके दिखायें और फिर आसन जमा कर राम ने शिव का धनुष किस प्रकार
तोड़ा इसका प्रदर्शन करें। पूतना का प्राणहरण, कुवलय हाथी का संहार अथवा मल्लमर्दन का प्रदर्शन कर फिर
हरिकीर्तन करें। प्रेम का आविर्भाव अद्भुत होता है। उसमें गद्य, पद्य, नामप्रबन्ध, भुजंग प्रयातादि छंद में भक्त
आनन्दपूर्वक स्तुतिगोत्र गाते हैं।
स्तवैरुच्चावचैः स्तोत्रैः पौराणैः प्राकृतैरपि।
स्तुत्वा प्रसीद भगवन्निति वन्देत दण्डवत्॥ ४५॥
मेरे स्तुतिस्तोत्र और पुराण आदरपूर्वक श्रवण करें। कोई सुनने वाला हो तो स्वयं ही कथा का निरूपण
करें। स्तोत्रपठन यदि शुद्ध पढ़ने में या ठीक तरह से गाने में कठिनाई हो तो भी प्रेम से कहने वाले को दोष नहीं
लगता। बल्कि उससे महादोष का निर्मूलन ही होता है। वेदों के उपनिषदों का पठन, अथवा ऋचामंत्रों से हरि का
स्तवन, इनमें लौकिक दृष्टि से ऊँच-नीच का भाव है किन्तु देवता को भक्तिभाव के कारण दोनों ही प्रिय हैं।
पुराणों के बड़े-बड़े स्तोत्र पढ़े या केवल नाम ले लें, अर्थ और भाव की दृष्टि से मैं उन्हें एकसमान मानता हूँ।
कोई भोला भाला व्यक्ति जिसे वेद, शास्त्र, पुराण आदि कुछ भी समझ में न आता हो, और वह प्राकृत में ही
स्तवन करे तो भी मैं श्रीकृष्ण सन्तुष्ट होता हूँ। वेद पठन करने में यदि कोई स्वर-वर्ण चूक जाता है तो पठन
करने वाले को दोष लगता है; किन्तु प्राकृत में ही श्रीहरि का स्तवन करें तो उससे दोषों का निर्दलन होता है।
शास्त्रश्रवण के लिये अथवा पुराण प्रवचन के लिये पंचमी-सप्तमी आदि विभक्तियों का ज्ञान आवश्यक होता है
किन्तु प्राकृत में नामकीर्ति यदि अशुद्ध भी गायी जाय तो भी वह भगवत्प्राप्ति करा देती है। संस्कृत भाषा यदि
भगवान ने बनायी तो क्या प्राकृत चोरों ने बनायी? इसमें केवल पक्षाभिमान की बात है। ईश्वर के काम में
अभिमान की बात नहीं होती है। चाहे वेदशास्त्र हो या पुराण हो, या प्राकृत भाषा में स्तवन हो, उसमें भक्तिभाव
सत्ताईसवाँ अध्याय ७३१
ही मुख्य है। उसी से नारायण सन्तुष्ट होता है। देव को भक्ति-प्रेम की ही चाह है। वह भाषा का आडम्बर नहीं
देखता। भाविक का भावार्थ ही उसे प्रिय लगता है। इसलिये देव के लिये भक्तों की बात टालना कठिन हो जाता
है। सारांश, भक्तिभाव से स्तवन करने से देव भक्तों के वश में हो जाता है। इसलिये भक्तिभाव से ही नमस्कार
कर हरि चरणों में मत्था नवाना चाहिये। मुहूर्त, निमेष अथवा क्षणभर के लिये भी यदि मन हरिचरणों में सुखी
हुआ तो उस सुख से अन्य कार्य सहज ही सम्पन्न हो जाते हैं। जिससे मेरा अनुसंधान टूट रहा हो, ऐसा कर्म छोड़
दें और जिससे मन स्वरूपनिष्ठ हो कर रहे, ऐसा ही समाधान रखें। जिससे भगवान को सप्रेम नमन करने से
नित्य नया समाधान प्राप्त होता हो, उस नमन का क्या लक्षण है? तो साष्टांग दण्डवत् यही लक्षण है। हाथ से
डण्डा छूट रहा हो फिर भी जो आगे-पीछे मुड़ कर नहीं देखता उसी प्रकार देहाभिमान त्याग कर अहेतुक होकर
साष्टांग दण्डवत् करें। देह की ओर ध्यान देते हुए भी जो परमार्थ सिद्धि के लिये नमन करता है उसका लक्षण
श्रीकृष्ण बताते हैं।
शिरोमत्पादयोः कृत्वा बाहुभ्यां च परस्परम्।
प्रपन्नं पाहि मामीश भीतं मृत्युग्रहार्णवात्॥ ४६॥
भक्त मेरे चरणों पर शीश रखकर दोनों पैर भक्तिभाव से पकड़ता है और कहता है कि संसारसागर के गर्भ में
मृत्युरूपी मगर ने मुझे पकड़ रखा है; इसलिये हे जगज्जेती, मुझे इस मगर की पकड़ से बचाइये। संसार भय से
आक्रांत होने के कारण मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ। मुझे जन्म-मरण की बाधा से मुक्त कीजिये। मैंने भक्तिभाव से
तुम्हारे पूज्य चरण कस कर पकड़ रखे हैं। तुम्हारे जैसा स्वामी मेरी रक्षा में हो तो बेचारा मृत्यु मुझे कैसे मार सकता
है ? इसलिये भक्तिभाव से आपके चरणों पर दण्डवत कर रहा हूँ। हे कृपालु! कृपा करके मेरा उद्धार करें। वह
साष्टांग नमस्कार और भयभीत होकर किया हुआ स्तवन सुनकर नारायण प्रसन्न हुआ ऐसी मन में भावना करें।
इति शेषां मया दत्तां शिरस्याधाय सादरम्।
उद्वासयेच्चेदूद्वास्यंज्योतिर्ज्योतिषि तत् पुनः॥ ४७॥
तदुपरान्त मैंने दिया हुआ शेष प्रसाद प्रसन्नतापूर्वक धारण करें। जहाँ प्रसिद्ध अचल (स्थावर) मूर्ति हो, वहाँ
विसर्जन विधि नहीं करनी चाहिये। किन्तु जहाँ चल (जंगम) प्रतिमामूर्ति हो, उसमें जिस आत्मज्योति से
आवाहन किया हो, उस ज्योति को पुनः अपने हृदय में स्थापित करें। पुनः उसका अपनी आत्मज्योति से मिलन
करायें। इस प्रकार विसर्जन तक की पूजा-विधि सुनकर उद्धव के मन में आया कि साधकों की पूज्य मूर्ति कौन-
सी है? उद्धव का यह मनोगत जानकर उसके सम्बन्ध में ही देव बताते हैं।
अर्चादिषु यदा यत्र श्रद्धा मां तत्र चार्चयेत्।
सर्वभूतेष्वात्मनि च सर्वात्माहमवस्थितः॥ ४८॥
उद्धव! जिसे जो मूर्ति अच्छी लगी हो, वह उसके लिये पूज्य है, इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। विष्णु,
ब्रह्मदेव, सूर्य, शिव, शक्ति अथवा गणपति इनमें से किसी भी मूर्ति में मैं सर्वात्मा समान हूँ। किसी भी प्रतिमा का
पूजन करो लेकिन वह पूजा मेरे लिये समान है। भक्तों का प्रेम जिसमें अधिक रहता है, उसके अधीन मैं परमात्मा
रहता हूँ। बच्चे के साथ खेलते समय जिस प्रकार माँ उसी की इच्छा के अनुसार खेलती है। उसी प्रकार भक्त प्रेम
की लीला के अनुसार मैं भी क्रीड़ा करता हूँ। मैं इन सभी प्राणियों में तथा अवतारों में लिये गये देह में एक
समान हूँ, इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। उद्धव! मैं जहाँ न रहूँ ऐसा कोई स्थान ही नहीं लेकिन प्राणियों का भाग्य
७३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जरा देखो। वे ऐसे विश्वास से मेरा भजन नहीं करते। जो जहाँ भी मेरा भजन करने बैठता है, वहाँ मैं उसे वैसा
ही दिखायी देता हूँ, यह रहस्य उपासना मार्ग प्रकट करने के बहाने सहज ही प्रकट किया। उपासनाकाण्ड का
मर्म यही है कि समस्त प्राणियों में मैं देवाधिदेव हूँ। यह बात जिनकी समझ में नहीं आती उनके लिये यह मूर्ति
प्रकार बताया। मेरी प्रतिमामूर्ति ही क्यों न हो, लेकिन वह भी चिदात्मरूप मैं ही हूँ। उद्धव! उसकी भावपूर्ण भक्ति
करने से भी भक्तों का उद्धार होता है।
एवं क्रियायोगपथैः पुमान् वैदिकतान्त्रिकैः।
अर्चन्नुभयतः सिद्धिं मत्तो विन्दत्यभीप्सिताम्॥ ४९॥
सारांश, क्रियायोग का लक्षण वैदिक और तांत्रिक अर्थात् मिश्र है। उसका वेदशास्त्र में अत्यधिक विस्तार
है। उसका थोड़ा सार-तत्त्व तुम्हें बताया। इस क्रियायोग के भजनमार्ग से भक्त यदि भोग और मोक्ष माँगे तो इन
दोनों की सिद्धि श्रीहरि उन्हें तत्काल देता है। भक्त यदि निष्काम बुद्धि से अनन्य भक्ति करने लगे तो भोग मोक्षादि
सम्पत्ति लेकर मैं श्रीपति उसके द्वार पर उसकी सदा प्रतीक्षा करता रहता हूँ।
मदर्चां सम्प्रतिष्ठाप्य मन्दिरं कारयेद् दृढम्।
पुष्पोद्यानानि रम्याणि पूजायात्रोत्सवाश्रितान्॥ ५० ॥
मेरे भक्त अत्यन्त प्रेम से मेरी निर्व्यंग प्रतिमा तैयार कराकर सद्भाव से स्थापित करते हैं और मजबूत
देवालय बनवाते हैं। वन, उपवन, उद्यान, पुष्पवाटिका आदि का आयोजन करते हैं और विधियुक्त नित्य पूजा कर
उत्साहपूर्वक महापूजा करते हैं। उस देवता की यात्रा का आयोजन हो, बहुजन समाज एकत्र हो, वार्षिक पर्व में
महापूजा आयोजित हो और वह अखण्ड चलती रहे, इसके लिये श्रीकृष्ण सहज उपाय बताते हैं।
पूजादीनां प्रवाहार्थं महापर्वस्वथान्वहम्।
क्षेत्रापणपुरग्रामान् दत्वा मत्सार्ष्टितामियात् ॥ ५१ ॥
नित्यपूजा, महापूजा अथवा वार्षिक पर्व नियमित रूप से चलें इसके लिये राजा ग्रामवासियों को कुछ वार्षिक
सहायता देकर निर्वाह की व्यवस्था करता है। 'क्षेत्र' अर्थात् बड़ा खेत, 'बाजार' उस बाजार में होने वाली आमदनी
देता है, जो बिना बाजार के होता है, वह है 'ग्राम'। अब 'पुर' का अर्थ सुनो। 'बाजार' जहाँ लगता है वह है 'पुर'
अर्थात् शहर। इस प्रकार जो लोग देवालय को अर्पण करते हैं, वे सर्वत्र मेरा ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं। देवालय में मूर्ति
की प्रतिष्ठा करने से अथवा पूजा करने से कर्त्ता को क्या फल मिलता है, इसके सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्मना भुवनत्रयम्।
पूजादिना ब्रह्मलोकं त्रिभिर्मत्साम्यतामियात् ॥ ५२ ॥
जो मूर्ति की प्रतिष्ठा करके रखता है, उसे सार्वभौम राज्य प्राप्त होता है, जो स्वयं देवालय बनवाता है, वह
त्रिभुवन का स्वामी बनता है। जो पूजाविधान करता है वह सत्यलोक में जाता है। जो ये तीनों बातें करता है उसे
मेरे जैसा ऐश्वर्य प्राप्त होता है। ये तीनों प्रकार के साधक सकाम होते हुए भी अपने इच्छित लोक में जाते हैं।
लेकिन जो निष्काम भक्त होते हैं, उन्हें क्या प्राप्त होता है, उनका लक्षण श्रीकृष्ण अत्यन्त आदर से बता रहे हैं।
मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन विन्दति।
भक्तियोगं स लभते एवं यः पूजयेत् माम् ॥ ५३ ॥
मुख्यरूप से मुझे अंतःकरण में रखकर जो मेरा निष्काम भजन करते हैं, जो निष्कामता में अनन्य होते हैं, वे
पुरुष मैं बन जाते हैं। विद्यमान स्वरूप में रहते हुए भी वास्तव में मेरा ही स्वरूप रहते हैं। हम दोनों में कोई अन्तर
नहीं होता। निष्काम भजन करने के कारण वह भक्त मुझ जैसा हो जाता है। 'समान' भी क्यों कहा जाय, उसमें
और मुझमें कोई भेद नहीं रहता। इस प्रकार वह भक्त मुझमें और मैं भक्त के अन्दर-बाहर मिलकर विचरते रहते
हैं। गुड़ जिस प्रकार माधुरी से अभिन्न रहता है या जिस प्रकार लहरें समुद्र से अभिन्न रहती हैं, उसी प्रकार वह
और मैं अभिन्न रूप में रहते हैं। इस प्रकार जो निष्काम भक्ति करता है वह चराचर में धन्य है। अब जो देवता को
और ब्राह्मण को दी हुई वृत्ति (खेत इत्यादि) हरा करता है, वह अघोर नरक में जाता है। उसके बारे में भी सुनो।
यः स्वदत्तां परैर्दत्तां हरेत सुरविप्रयोः।
वृत्तिं स जायते विड्भुग् वर्षाणामयुतायुतम्॥ ५४॥
कर्तुश्च सारथेर्हेतोरनुमोदितुरेव च।
कर्मणां भागिनः प्रेत्य भूयो भूयसि तत्फलम्॥ ५५ ॥
जो देवालय की प्राप्ति का हरण करता है, ब्राह्मण की वृत्ति का अपहार करता है, वह करोड़ों वर्ष तक
सुअर की योनी में जन्म लेकर विष्ठा खाता रहता है। उसी प्रकार ब्राह्मण की वृत्ति हरण करने के काम में जो
सहायता करता है, अथवा उसका जो अनुमोदन करता है, वे तीनों अघोर नरक में जाते हैं। उद्धव! वे जन्म-मरण
के भँवर में फँस कर वही फल मर-मर कर बार-बार भोगते रहते हैं। मेरी प्राप्ति की यदि मन में इच्छा हो तो मन
को अकर्म का स्पर्श नहीं होने देना चाहिये। अधर्म कर्म की बात नहीं करनी चाहिये। किसी के दोष नहीं देखने
चाहिये, किसी को चोट पहुँचे ऐसी बातें नहीं करनी चाहिये और प्राणिमात्र का द्वेष कभी नहीं करना चाहिये।
दूसरे की निन्दा कभी नहीं सुननी चाहिये, दूसरे के दोष नहीं कहने चाहिये, अधर्म के भाषण में कभी भी किसी
से नहीं मिलना चाहिये। त्रिभुवन के सारे पातक जिसे अपने माथे पर लेने हों, वह अपने मुख से साधुओं की
निन्दा कर सकता है। दुःखों की सारी राशियाँ अपने पास आ जायें ऐसी जिसे इच्छा हो वह अवश्य ब्रह्मद्वेष करे।
सारा समय व्यर्थ ही बीत जाय, ऐसी जिसे इच्छा हो वह रात-दिन चौपड़ का खेल रचाये। हृदय में रहने वाला, मैं
आत्माराम, स्वतः सिद्ध परब्रह्म हूँ उसके दुर्गम होने के लिये ही संसार को अधर्म कर्म लगा हुआ है। वह
कर्माकर्म नष्ट करना अत्यन्त आसान है। पुरुषोत्तम, अच्युत, रामराम का अखण्ड नामस्मरण करते रहना चाहिये।
जहाँ हरिनाम का अखण्डघोष चलता है, वहाँ कर्माकर्म की राशियाँ पूरी तरह जल जाती हैं। उनकी जरा-सी राख
भी शेष नहीं रह जाती। हरि का नाम इतना पवित्र है। हरि का नाम सारे पापों का विनाश करता है, यह बात सारे
शास्त्र बता रहे हैं। ऐसा होते हुए भी जो इसमें सन्देह करता हो उसे वज्रपापी समझना चाहिये। श्रीमहाभागवत्
ऐसे वज्रपापों के पर्वत भी भस्म कर देता है। जनार्दन की कृपा से वह मुझे अनायास प्राप्त हो गया है। इस
भागवत का अर्थ यही है कि हरि का नाम अत्यन्त समर्थ है। इस सम्बन्ध में हरि ने स्वमुख से पराकाष्ठा का
वर्णन किया है। यहाँ भी जो विकल्प करे उसे संसार में अत्यन्त भाग्यहीन समझना चाहिये। विकल्प के कारण
वह महादोषों के दुःख सागर में डूबा ऐसा समझना चाहिये। संकल्प-विकल्प के ही कारण लोगों के दृढ़बन्धन
को काटने के लिये एक जनार्दन का नाम ही समर्थ है। कैसा भी भवभय क्यों न हो लेकिन जनार्दन का नाम
उसका विनाश कर देता है। वह नाम जो अंतर-प्रेम से स्मरण करता है, वह स्वयं ही पुरुषोत्तम बन जाता है।
स्वयं ही पूर्ण ब्रह्म कैसे बनें इस विषय का सुमधुर निरूपण अट्ठाइसवें अध्याय में श्रीकृष्ण उद्धव को सुनायेंगे।
७३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वह कथा कान में पहुँचते ही जीव को स्वयंभू सुख प्राप्त होगा और भीतर-बाहर वह भर जाएगा। जिस कथा की
माधुरी प्राण जाने पर भी नहीं छूट सकेगी, ऐसा रसमय निरूपण श्रीकृष्ण उद्धव को सुनायेंगे। उसे सुनते ही
ब्रह्मभाव उत्पन्न होगा। यह अट्ठाइसवाँ अध्याय ब्रह्मसुख की संचित निधि है, यह ध्यान रखो। इसकी सूक्ष्म से
सूक्ष्म बात श्रीकृष्ण उद्धव को स्पष्ट करके बतायेंगे। यह कृष्ण-उद्धव का आत्मज्ञान है। एकनाथ जनार्दन की
शरण में जाकर बिनती करता है कि आपकी पूर्ण कृपा से श्रोतागण इधर मेरी ओर ध्यान दें। श्रोताओं के ध्यान देने
से ग्रन्थ के निरूपण का उल्हास बढ़ता है। इसलिये एकनाथ जनार्दन की शरण जाकर उनके चरणों का वन्दन कर
रहा है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धव संवादे एकाकार टीकायां
प्रकृति पुरुष सांख्य योग नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
अठ्ठाईसवाँ अध्याय
हे परम सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। हे सद्गुरु पुरुषोत्तम ! तुम्हारी जय हो। हे सद्गुरु परब्रह्म ! तुम्हारी जय हो।
ब्रह्मा को 'ब्रह्म' यह नाम तुम्हारे ही कारण प्राप्त हुआ है। हे चित्तैक्य स्वरूपी सद्गुरु। तुम्हारी जय हो। इन साकार
और निराकार पदार्थों में चिद्रूप से तुम ही भरे हुए हो। हे सद्गुरु सत्क्षेत्र ! तुम्हारी जय हो। सद्गुरु सत्पात्र ! तुम्हारी
जय हो। हे स्वानंदपूर्ण सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। हे स्वानंदघन सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। आनन्द को मधुरता
तुम्हारी ही कारण आयी है। हे देव-अग्रणी सद्गुरु। तुम्हारी जय हो। हे देवशिरोमणि ! तुम्हारी जय हो। हे देवश्रेष्ठ
गुरुराया ! सारे देवता तुम्हारे चरणों को प्रणाम करते हैं। हे जीवादिजीव तुम्हारी जय हो। हे शिवादिशिव ! तुम्हारी
जय हो। हे देवादिदेव तुम्हारी जय हो। हे अभिनव गुरुराया ! तुम्हारी जय हो। हे सद्गुरु सुखसम्पन्न ! तुम्हारी जय
हो। हे सद्गुरु सुखनिधान तुम्हारी जय हो। हे सुखैकघना सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। सुख को सुख भी तुम्हारे ही
कारण प्राप्त हुआ है। तुम्हारे ही कारण आनन्द को निजानंद प्राप्त होता है; तुम्हारे ही कारण बोध को निजबोध का
लाभ होता है; तुम्हारे ही कारण ब्रह्म को ब्रह्मत्व प्राप्त होता है। तुम्हारे जैसे समर्थ एक तुम ही हो। ऐसे श्रीगुरु तुम
अनंत हो। तुम्हारे स्वरूप का अंत नहीं है। तुम कृपालु होकर अपने भक्तों को निजात्म स्वरूप से ज्ञान प्रदान करते
हो। अपने निजरूप का बोध करा कर देव-भक्त का भाव नहीं रहने देते हो। उस पर पुनः पूर्ण अद्वैतभाव से
आत्मभजन कराते हो। गंगा समुद्र में मिलने पर भी उस पर चमकती रहती है, उसी प्रकार भक्त तुम्हारे साथ मिल
जाने पर भी तुम्हारे ही कारण तुम्हारा भजन करते हैं। अद्वैतभाव से तुम्हारी भक्ति करने से तुम्हें परमसंतोष होता है
और प्रसन्न होने पर तुम शिष्य के हाथों आत्मसम्पत्ति अर्पण करते हो। शिष्य को निजात्मस्वरूप का दान देकर उसे
महान बनाते हो, यह तुम्हारा अद्भुत चमत्कार है। यह अतर्क्य विचार अंतहीन है। जो वेदशास्त्रों की समझ में
नहीं आता; जिसके लिये वेद रातदिन विवाद कर रहे हैं वह आत्मज्ञान तुम तच्छिष्य को एक क्षण में करा देते हो।
करोड़ों वेद एवं वेदान्त का पठन करने पर भी तुम्हारे आत्मोपदेश की शैली किसी को नहीं आ सकती। अदृष्ट
वस्तु ध्यान में आना सम्भव नहीं है। अनेक लोग जानने का दम भरते हैं। अनेक प्रकार की युक्तियाँ करते हैं
लेकिन उनकी बकवास तोता रटंत जैसी होती है। इसलिये तुम्हारी बोध कराने वाली शक्ति सबकी समझ में आने
लायक नहीं है। तुम्हारी कृपा युक्ति का लाभ होने पर ही दुर्गम सरल हो जाता है। श्रीभागवत अगम्य है, तिस पर
एकादश स्कंध का अर्थ अत्यन्त गहन है लेकिन तुम सद्गुरु और कृपालु होने के कारण तुमने मुझसे उसका अर्थ
प्राकृत में करवाया। माँ जिस प्रकार दही को मथ कर उसका मक्खन निकाल कर बालक को देती है, उसी प्रकार
जनार्दन ने यहाँ किया है। वेदशास्त्रों का मंथन कर व्यासजी ने भागवत निकाला; उस भागवत का मतितार्थ यह
ग्यारहवाँ स्कंध है, ऐसा समझो। उस एकादश स्कंध का माधुर्य स्वयं मेरी समझ में नहीं आया इसलिये जनार्दन ने
उसका मंथन कर उसका सारतत्त्व मुझे निकाल कर दिया। उसे सहज ही मुख में डाला तो उस एकादश की माधुरी
मेरी समझ में आयी। उसी माधुर्य की चाह से यह टीका तैयार हो रही है। इसलिये एकादश स्कंध पर की यह
टीका अकेले एक एकनाथ से नहीं बल्कि एक से एक मिलकर बाहर आ रही है। एक पीछे और एक आगे यही
एकादश का अर्थात् ग्यारह का स्वरूप है। जनार्दन ने अपना एकपन एका (एकनाथ) में (अद्वैत में) दृढ़ किया।
वही एकादश स्कंध के अर्थ में आया है। एका (एकनाथ) में एकत्व घुलमिल गया। भोजन में जिस प्रकार
मिष्ठान्न का ग्रास होता है, उसी प्रकार भागवत में यह एकादश स्कंध है। उसमें भी अठ्ठाईसवाँ अध्याय अत्यन्त
७३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सुरस और मधुर है। सारे अवयवों में जिस प्रकार मस्तक श्रेष्ठ है, उसी प्रकार यह अट्ठाईसवाँ अध्याय श्रेष्ठ है।
उसमें जो भी निरूपण है वह सब शुद्ध आत्मानंद ही है। यह अट्ठाईसवाँ अध्याय मानों ब्रह्मसुख का खजाना ही है।
मजे की बात है कि श्रीकृष्ण उद्धव के पूछे बिना ही सब कुछ बता रहे हैं। उद्धव के प्रश्न किये बिना ही श्रीकृष्ण
क्यों बता रहे हैं, इसका कारण ध्यानपूर्वक सुनें। कृष्ण का भाषण सुनकर उद्धव को आत्मज्ञान हुआ और यह
ज्ञानसम्पन्न हो गया। इससे अत्यधिक ज्ञातृत्व हो जाने के कारण ज्ञानाभिमान होने की सम्भावना हुई। सारा संसार
मूर्ख है और एक मैं ज्ञाता हूँ, ऐसा जो अहंकार बढ़ता रहता है वही गुणदोषों की सर्वत्र चर्चा कराता है और जहाँ
गुणदोषों का दर्शन होता है, वहाँ ज्ञान का लोप होते-होते वह निःशेष हो जाता है। साधकों के लिये इतना अधिक
ज्ञानाभिमान बाधक है। अभिमान के कारण जहाँ सदाशिव को भी जीवदशा प्राप्त हुई वहाँ मनुष्य की क्या गति
है? अहंता से जीव को मुक्ति कैसे मिलेगी? ईश्वर भी यदि गुणदोष देखने लगे तो उसका भी नाश होगा। इस
प्रकार गुणदोषों का दर्शन साधक के लिये पूरी तरह घातक है इसलिये प्रश्न किये बिना ही श्रीकृष्ण उसका उपाय
बताते हैं। बालक को उसका हित समझ में नहीं आता अतः उसकी माँ ही निष्ठापूर्वक उसका ख्याल रखती है।
उसी प्रकार उद्धव के सच्चे हित की चिन्ता श्रीकृष्ण को थी। ज्ञानाभिमान कितना बाधक होता है, यह साधक की
समझ में नहीं आता। इसलिये प्रश्न किये बिना ही श्रीकृष्ण उसका निराकरण बताते हैं। उद्धव का जन्म यादववंश
में हुआ था और यादव तो ब्रह्मशाप से मरने वाले थे। तिस पर उद्धव को बचाने के लिये श्रीकृष्ण उसे सम्पूर्ण
ब्रह्मज्ञान बता रहा था। जहाँ देहातीत ब्रह्मज्ञान रहता है, वहाँ शाप का बन्धन बाधक नहीं होता। यह जानकर ही
श्रीकृष्ण ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने लगे। शक्कर पर बैठी मक्खी की तरह कृष्ण की प्रतिमा पर उद्धव की प्रीति
जड़ गयी थी अर्थात् उसका वह भाव एकदेशी हो गया था। कृष्ण से दूर जाने पर उद्धव सचमुच प्राण ही त्याग
देगा इसलिये उसकी एकदेशीयता समाप्त करने के लिये श्रीकृष्ण ब्रह्मसमता का पाठ दे रहा हे। एकदेशी भाव
श्रीकृष्ण को अच्छा नहीं लगा, इसलिये देवाधिदेव उसे ब्रह्मसमन्वय अर्थात् ब्रह्म की व्यापकता के बारे में बताते
हैं। उद्धव यदि कृष्ण के पास रह गया तो ब्रह्मशाप से उसकी होली हो जायगी इसलिये श्रीकृष्ण उसे ब्रह्मसुख की
समृद्धि में ले जाना चाहते हैं। उद्धव श्रीकृष्ण को छोड़कर जाने पर भी उसे वियोग की बाधा न हो ऐसा सर्वदेशी
व्यापकता का उपदेश उद्धव श्रीकृष्ण को दे रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत्।
विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च॥ १॥
निःशब्द का वह स्वच्छ शब्द; जिसके श्वासोच्छ्वास से वेदों का निर्माण हुआ, वह श्रीकृष्ण उद्धव के हित
में विशुद्ध ज्ञान बताने लगा। संसार में मुख्य रूप से तीन गुण हैं। उन गुणों के कारण लोग भी तीन प्रकार के हो
गये हैं। उनका शान्त,दारुण और मिश्र इस प्रकार का कर्म है। उस कर्म की निन्दा या स्तुति हमें कभी नहीं करनी
चाहिये क्योंकि एक के भलेपन का वर्णन करने से, उन्हीं शब्दों से दूसरे की निन्दा हो जाती है। पाँच लोगों में से
यदि हम एक की ही स्तुति करने लगें तो शेष चार की निन्दा करने जैसी बात हो जाती है। दाहिना और बायाँ ये
दो भाग होने पर भी उनसे एक ही अंग का बोध होता है; उसी प्रकार प्रकृतिपुरुषात्मक यह संसार चिद्रूप से एक
ही रूप है। संसार परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप है। इसलिये निन्दा अथवा स्तुति किसी भी प्राणी की नहीं करनी चाहिये।
सभी प्राणियों में आत्माराम है, इसलिये प्राण जाने पर भी निन्दा या स्तुति नहीं करें। उद्धव ! निन्दा स्तुति की बात
सदा के लिये त्याग दो, तभी तुम्हें परमार्थ साध्य होगा और निजबोध से निजस्वार्थ प्राप्त होगा। उद्धव! समस्त
प्राणिमात्र में भगद्भाव रखना यही ब्रह्मस्वरूप होने का मार्ग है। इसमें कोई धोखा नहीं है। वह भाव अब सुनो।
जहाँ से खतरे की सम्भावना हो, यदि वहीं भगवद्भावना दृढ़ता से बढ़ायी जाय, तो जो खतरा है वहीं उपाय हो
जायगा और विद्या को स्थान नहीं बचेगा। इस स्थिति को छोड़ जो 'मैं ज्ञाता हूँ' ऐसा अहंकार करेगा और निन्दा
स्तुति का आश्रय लेगा, वह अनर्थ में पड़ेगा।
परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति ।
स आशु भ्रश्यते स्वार्थादसत्यभिनिवेशतः ॥ २ ॥
मैं ही एक सर्वज्ञ हूँ, ऐसा ज्ञानाभिमान कर जो संसार के गुणदोष देखता रहता है; और मुख्यरूप से ब्राह्मण
की निन्दा करता है, दूसरे के स्वाभाविक कर्म की निन्दा करना अधर्म है। मारुति इतना बड़ा ज्ञाता था लेकिन वह
भी वानरचेष्टा से नहीं बच पाया। नारद भी बहुत बड़ा ज्ञानसम्पन्न और बड़ों के लिये भी पूज्य, लेकिन वह कलह
कराने में उद्भट था। इसलिये स्वभावधर्म अनिवार्य है, ऐसा मानना चाहिये। गरुड़ देवता का वाहन, सदा हाथ
जोड़कर भगवान के सामने खड़ा रहने वाला; लेकिन वह भी सर्प खाता है। ऐसा यह स्वाभाविक कर्म है। विकार
करने पर यह संसार त्रिगुणात्मक होने के कारण गुणों के अनुसार कर्मों का आचरण होता है। इसलिये उसमें
गुणदोष देखने पर देखने वाला ही दोषी होता है। संसार में एकात्मता ही देखी जाय यही सच्ची ब्रह्मस्थिति है। इसे
देखना छोड़ जो गुणदोष देखता रहता है, वह आत्मघात की ही ओर प्रवृत्त होता है। सहज ही किसी के मिलने
पर वह जानबूझकर उसके गुणदोष देखने लगता है और इस प्रकार ज्ञानाभिमान निन्दा और स्तुति उत्पन्न करता है।
अभिमान का स्वभाव ही ऐसा है कि वह ज्ञाता के पास अधिक उत्तेजित होता है; और वही गुणदोषों को दिखाकर
निन्दा स्तुति उत्पन्न करता है। अपने स्वभाव के साथ जिसका मेल खाता है, उसकी वह थोड़ी तारीफ करता है
और जिसके गुण उसे अच्छे नहीं लगते उसकी पर्याप्त निन्दा करता है। निन्दा और स्तुति जहाँ उत्पन्न होती है,
वहाँ भेद क्षुब्ध हो उठता है और वह परमार्थ को चकनाचूर कर देता है। इस प्रकार उसका बहुत बड़ा अनर्थ होता
है। निंदा के पीछे अनर्थ खड़ा ही रहता है, उसमें उधार की बात नहीं होती। निजस्वार्थ का घात करने वाला वह
सीधे शरीर पर गिर पड़ता है। भेद का अर्थ दूजापन यह बात ही यहाँ मिथ्या है। दृढ़ परमार्थ साधने के लिये भेद
के मिथ्यत्व के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण स्वप्न का दृष्टांत सुनाते हैं।
तैजसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतनः ।
मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्न्नानार्थदृक् पुमान् ॥ ३ ॥
रजोगुण से इन्द्रियों की उत्पत्ति हुई है। तमोगुण से तन्मात्रा विषय उत्पन्न हुए हैं। वे इन्द्रिय जागृति में विषय
सेवन कर निद्रा में निश्चल होकर रहते हैं। जागृति अवस्था का अभिमानी 'विश्व' और जागृति इन दोनों का जब
अस्त होता है, उस समय स्वप्न में 'तैजस' अभिमानी 'मिथ्या' प्रपंच की सृष्टि करता है। उस समय स्थूल देह
निश्चल रहता है; स्वप्न में केवल मन का विचरण होता है और वह भवजाल उत्पन्न कर त्रैलोक्य की सृष्टि करता
है। उस स्वप्न की सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय हम स्वयं देखते रहते हैं, फिर भी वह जन्म-मरण (उत्पत्ति
और विनाश) मिथ्या ही है। उसी प्रकार अविद्या भी एक प्रदीर्घ स्वप्न ही है। वह केवल अभिमान को बढ़ाता है।
उसका जन्म-मरण मिथ्या ही है और तुम पूर्णत्व से परिपूर्ण ब्रह्म ही हो। तुम्हारे निजस्वरूप में दूजेपन की गन्ध
भी नहीं है। इसलिये उसका शुभाशुभ तुम्हें बिलकुल स्पर्श नहीं करता।
किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत्।
वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ ४॥
जिसने जन्म ही नहीं लिया, वह काला है या गोरा है यह कैसा कहा जाय ? बिना ग्रहण के खग्रास नहीं
दिखाई देता। यदि ऊसर भूमि पर मृगजल का आभास हो तो वह गहरा है या छिछला है, मीठा या खारा है, यह
बताने में विचार कुंठित होगा। उसी प्रकार जब प्रपंच का भान ही मिथ्या है, तब उसमें के गुण और दोष खोजने
वाले ज्ञाता अज्ञान में डूबे ऐसा समझना चाहिये। यदि अमावस्या की रात्रि को अँधेरे का वजन करने अन्धे आये
तो वे दोनों हाथ से तौलें तो भी वजन एक रत्ती भी नहीं होगा। उसी प्रकार प्रपंच मिथ्या होने के कारण उसमें
कान का सुनना, या आँखों से देखना, जीभ से चखना अथवा शरीर से स्पर्श करना, उसी प्रकार हाथ से लेना-
देना, पैरों का चलना, वाचा का बोलना अथवा मन से कल्पना करना यह सब मिथ्या है। उसी प्रकार अहंकार का
जोश, चित्त का चिंतन, बुद्धि का विवेक-विचार यह विचार समूल मिथ्या है। दीवार पर बने चित्र का पानी और
अग्नि, अंत्यज और ब्राह्मण, बाघ और हिरन यह दिखाई देने पर भी दीवार पर दिखाई देने वाला आभास ही है।
उसी प्रकार यह द्वैतमय प्रपंच दिखाई देते हुए भी उसमें अद्वैत वस्तु का ही भास होता है। उसमें शुभ-अशुभ
कैसा ? सर्वत्र ब्रह्म ही परिपूर्ण है। केले के खोल खोलते समय प्रत्येक परदा रीता दिखाई देता है, उसी प्रकार
देहादि प्रपंच का विचार करने पर वह भी सचमुच मायिक अर्थात् मिथ्या है। उस मिथ्या प्रपंच में शुभाशुभ भी
मिथ्या है। परब्रह्म जो सत्य है, वह अपने स्थान पर स्थिर है। उसमें रत्तीभर भी शुभाशुभ नहीं है। जो इसे
शुभाशुभ कहता है, उसकी कल्पना ही उसके सामने खड़ी रहती है और वह अपनी ही कल्पना के महाभय से
मिथ्या जन्म-मरण भोगता रहता है।
छायाप्रत्याह्वयाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिणः ।
एवं देहादयो भावायच्छन्त्या मृत्युतो भयम् ॥ ५ ॥
वास्तव में पानी में प्रतिबिम्ब रहता ही नहीं है, जो देखता है वही उसमें प्रतिबिम्बित रहता है, उसी प्रकार
प्रपंच का स्वरूप भी मिथ्या है। वह हमारी कल्पना के कारण ही भासित होता है। उस प्रतिबिम्ब को आँखों से
देखकर, वह मैं ही हूँ कह कर कपाल पर टीका लगाये उसी प्रकार देहाभिमान में फँस कर जीव का सर फूटता
है। अपना अपने ही शब्दों की प्रतिध्वनि के प्रत्युत्तर आते हैं, जो मिथ्या होते हैं। लेकिन कान को वे शब्द सच्चे
ही लगते हैं। रस्सी का मूल स्वरूप वैसा ही रहता है किन्तु भ्रमवश बड़े सर्प का आभास होता है। वह रहता
मिथ्या ही है, फिर भी भय से शरीर काँपने लगता है और अफरातफरी कर देता है। इस प्रकार देहादिक मिथ्या
होते हुए भी देहाभिमान के कारण जीव को जन्म-मरण के अनेक भँवरों में उलझा कर आकल्प दुःख भोगने को
बाध्य करता है। आत्मा से ही देहादि भेद उत्पन्न हुए हैं ऐसा वेद कहते हैं; और वेद तुम्हारा ही रूप है यह प्रसिद्ध
है, अतः वेदवाद मिथ्या कैसे होगा? उद्धव को वेदवाद की शंका हुई। श्रीकृष्ण ने उसे पूरी तरह जान लिया
इसलिये वह उत्तर दे रहा है।
आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभुः ।
त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः ॥ ६ ॥
तस्मान्न ह्यात्मनोऽन्यस्मादन्यो भावो निरूपितः ।
निरूपितेयं त्रिविधा निर्मूला भातिरात्मनि ॥ ७॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय ७३९
प्रपंच प्रत्यक्ष दिखायी देता है, जिससे मन में दुविधा हो जाती है। इसलिये मेरा वेदवचन प्रपंच आत्मरूप से
अभिन्न है, ऐसा उपदेश करता है। ईख बीज में ही विद्यमान रहता है और वही ऊपर एक कांड से दूसरे कांड में
चढ़ता है, उसी प्रकार प्रपंच भी ब्रह्मा के कारण ही तद्रूप बढ़ता है। जिस प्रकार सुवर्ण के अलंकार बनाने पर वे
सुवर्ण के ही रूप में रहते हैं, उन्हें तोड़ने पर भी वे सुवर्ण के रूप में ही रहते हैं, तिल की पुतली बनाने पर भी
वह तिल के अवयवों से शोभा प्रदान करती है और तोड़ने पर भी वह तिल के ही रूप में रहती है, उसी प्रकार
प्रपंच को भी उत्पत्ति, स्थिति और लय प्राप्त होने पर भी आदि, मध्य और अन्त में यह परब्रह्म से परिपूर्ण रहता
है। यहाँ जिस चराचर का आभास होता है, वह सचमुच मैं आत्मा ही हूँ। मेरे बिना इस संसार में अणुमात्र का भी
स्थान नहीं है क्या ? इस प्रकार सृज्य और सृजित पाल्य और प्रतिपालक, संहार और संहारकर्त्ता एकात्मरूप से मैं
भगवंत ही हूँ। यहाँ उत्पत्ति, स्थिति और लय इन तीन विविध स्वरूपों से प्रपंच भले ही भिन्न दिखायी देता हो
लेकिन इन सबका आधार मैं ही हूँ। मेरे सिवा अन्य कुछ भी नहीं है। जिस प्रकार मृगजल के उदक से सूर्य कभी
नहीं भींगता, उसी प्रकार मुझ पर प्रपंच का आभास होता है, लेकिन मैं प्रपंच में नहीं रहता। त्रिविध प्रपंचों का
जाल मुझ पर अवश्य ही दिखायी देता है, लेकिन वह मिथ्या है। जिस प्रकार आकाश सुन्दर नीलवर्ण का दिखाई
देता है, लेकिन वहाँ अणुमात्र के लिये भी नील वर्ण नहीं रहता। संसार जो आँखों को साक्षात् दिखाई देता है, उसे
तुम समूल मिथ्या कैसे कहते हो ? यदि मन में ऐसी शंका आ रही हो तो उसका प्रकार भी सुनो।
इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम् ॥ ७॥
एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणम् ।
न निन्दति न च स्तौति लोके चरित सूर्यवत् ॥ ८॥
अध्यस्थ, अधिदैव तथा अधिभूत यह तीन प्रकार का संसार माया द्वारा निर्मित है। न होते हुए भी वह मुझ
में भासित होता है। लेकिन वह निश्चित रूप से त्रिगुणात्मक है, यह जान लो। उद्धव ! यह संसार मिथ्या है,
इसलिये शायद तुम उसका त्याग करोगे। लेकिन मेरे इसी भाषण से साधु-संतों को ज्ञान और विज्ञान प्राप्त हुआ
है। प्रपंच का आभास मिथ्या है यह ज्ञान का मुख्य ज्ञान है। इस ज्ञान से जो सम्पन्न होता है वही समस्त प्राणियों
के प्रति समान भाव रखता है। इसीलिये वह प्राणिमात्र के गुण-अवगुण अथवा निन्दा स्तुति की बात नहीं करता।
सूर्य की ही तरह सबसे समान भाव से व्यवहार करता है। बद्रिकाश्रम उत्तर दिशा में है और सेतुबंध-रामेश्वर
दक्षिण में है, फिर भी सूर्य सबके सामने ही है। वह उनसे कभी विन्मुख नहीं होता। पूर्व के लोगों को सूर्य
सन्मुख और पश्चिम के लोगों को विन्मुख कभी नहीं होता। उसी प्रकार मैं सर्वत्र सबके सन्मुख ही हूँ। किसी से
विन्मुख नहीं होता। अपने सामर्थ्य से अन्धकार को दूर कर प्राणिमात्र से सूर्य स्वयं होकर मिलता है, उसी प्रकार
संसार के गुणदोषों के एक ओर रखकर साधुगण संचार में विचरण करते रहते हैं। मैंने बताया हुआ यह ज्ञान का
लक्षण ही सिद्धों की पूर्णता है ताकि मुमुक्षु इस अनुसंधान को सामने रखकर सावधान होकर यह स्थिति साध
सकें। जिससे यह निजज्ञान प्राप्त हो ऐसे विषयों का साधन श्रीकृष्ण उद्धव को अपने मुख से बता रहे हैं।
प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा।
आद्यान्तवदसज्ज्ञात्वा निस्सङ्गो विचरेदिह ॥ ९॥
जो उत्पन्न होकर नष्ट होता है, वह सब मिथ्या है यह जान लें और उस पर आसक्ति त्याग कर उदास और
विरक्त होकर रहें। वंध्या के पुत्र का नामकरण कोई आनन्दपूर्वक नहीं करता; उसी प्रकार नाशवान देह के बढ़ने
७४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
से मूर्खों का ही मन आनन्दित होता है। उत्पत्ति और विनाश का लक्षण भगवान उदाहरण देकर बताते हैं।
प्राणिमात्र का जन्ममरण हम नित्य आपकी आँखों से देखते हैं। अनुमान करके देखें तो भी गेरू पर्वत, पृथ्वी
आदि जो भी साकार दिखाई देता है वह सब प्रलय के अंत में नष्ट होने ही वाला है। वेदोक्ति भी यही बताती है
कि अष्टधा पृथ्वी भी नाशवान है। जीवभावना भी अन्त में विनष्ट होती है, ऐसा श्रुति भी जोर-शोर से कहती है।
साथ ही जो भी जड़ और विकारी है वह सब नष्ट होता है यह अनुभव हमें भी है। इससे यह भी अपने आप ही
मालूम होता है कि संसार 'नश्वर' ही है। पिता को मरा हुआ देखते हैं और पुत्र-पौत्र उनके सारे संस्कार करते
हैं। फिर भी अपनी मृत्यु की चिन्ता नहीं करते। देह की आसक्ति के कारण ऐसा भ्रम हो जाता है। पुत्र पितरों को
पिण्डदान देते हैं और उन्हें सद्गति प्राप्त हो, ऐसा कामना करते हैं किन्तु अपनी गति का विचार नहीं करते। देह
के लोभ के कारण नश्वर की इतनी आसक्ति रहती है। आत्मा केवल प्रकाशमय है और प्रपंच जड़, मूढ़ और
अज्ञान है। यह सुनकर उद्धव भगवान से प्रश्न करता है।
उद्धव उवाच
नैवात्मानो न देहस्य संसृतिर्द्रष्टृदृश्ययोः ।
अनात्मस्वदृशोरीश कस्य स्यादुपलभ्यते ॥ १०॥
आत्मा नित्यमुक्त है तथा ज्ञानस्वरूप है। उसे संसार का बन्धन आवश्यक नहीं है। देह जड़, मूढ़ और
अज्ञान है। उसे भी संसार की आवश्यकता नहीं होती। अतः हे श्रीकृष्ण! फिर संसार का बन्धन किसे बाधक
होता है? तुम कहते हो संसार है ही नहीं, लेकिन वह तो प्रत्यक्ष दिखायी देता है। आत्मा का विचार करने पर
संसार बन्धन को कोई स्थान ही नहीं है, इसी अर्थ का निरूपण उद्धव स्वयं ही करते हैं।
आत्मव्यायोऽगुणः शुद्धः स्वयंज्योतिरनावृतः ।
अग्निवद् दारुवच्चिद् देहः कस्येह संसृतिः ॥ ११॥
आत्मा नित्यमुक्त होते हुए चित्स्वरूप है। उसे गुण अथवा निर्गुण बिलकुल स्पर्श नहीं करते। उसके पास
कर्माकर्म अथवा पाप पुण्य के लिये कोई स्थान नहीं है। परादि वाणी से उसका उच्चार नहीं होता, इसलिये उसे
'परात्पर' कहते हैं। प्रकृति गुणों से उस पर विकार का प्रभाव नहीं होता क्योंकि परमात्मा प्रकृति से परे है।
जिसके प्रकाश की दीप्ति से सूर्य, चन्द्र आदि प्रकाशित होते हैं, जिसके प्रकाश से त्रिभुवन प्रकाशित होता है,
ऐसा वह परमात्मा तेजोमूर्ति है। ऐसे आत्मा को संसार बन्धन नहीं हो सकता। यदि मृगजल के कुण्ड में सूर्य डूबे
तभी आत्मा को बन्धन होगा। जुगनू के प्रकाश से यदि सूर्य जले, बगुले के भय से यदि काल पलायित हो, चींटी
के पर से यदि सारा आकाश उड़ जाय, वायु यदि लड़खड़ा कर कुएँ में गिर पड़े, गड्ढे के पानी में यदि मेरू डूब
जाय तो भी हे गोविन्द! आत्मा को संसार बन्धन कभी नहीं होगा। उसी प्रकार देह के लिये संसार बन्धन है ऐसा
कोई मूर्ख भी नहीं कहेगा क्योंकि देह जड़, मूढ़ और अज्ञान होने के कारण उसे संसार बन्धन की बाधा कभी
नहीं होगी। हाँ, यदि पत्थर के पेट में दर्द होने लगे, सूखी लकड़ी भूख के मारे तड़पना शुरू करे तो अवश्य ही
देह को संसारबन्धन होगा। पर्वत अगर हिलने लगे, मृत्तिका यदि स्नान करने के लिये व्याकुल हो जाय, कोयले
से यदि अन्धकार काला हो जाय, तो संसारबन्धन की बाधा देह को होगी। अब आप यह कहेंगे कि देह और
आत्मा की संगति से संसार बन्धन होता है, तो विचार करने से मालूम होता है कि बात ऐसी नहीं है। क्यों नहीं
है, वह भी सुनो कृष्ण! आत्मा यह स्वयंप्रकाश बड़ा अग्नि ही है और देह जड़ और मूढ़ होने के कारण काष्ठ की
जगह है। वह यदि आत्मा से मिलता है तो आत्मा उसे तत्काल जला कर भस्म कर देगा। कर्पूर यदि अग्नि में
एकरूप आठों पहर रह सके तो देह और आत्मा एकरूप होकर देह भी संसार बन्धन में रह सकता था। काष्ठ में
अग्नि रहता है लेकिन वह काष्ठ बनकर नहीं रहता। उसका घर्षण कर मूलतेज से बाहर निकालने पर वह
लकड़ी को जलाकर भस्म कर देता है। उसी प्रकार आत्मा देह में रहता है लेकिन वह देहरूप नहीं रहता। वह
चिद्रूप से ज्ञानस्वरूप से देह का प्रकाशक है, उसे संसार बन्धन की बाधा नहीं होती। आप कहेंगे कि यदि आत्मा
की संगति से देह जल जायेंगे, तो फिर प्राणी जीवित कैसे रहते हैं? वह भी सुनो। रूपहले परदे पर दीपक के
प्रकाश की सहायता से कागज की पुतलियाँ नाचती रहती हैं लेकिन यदि उन्हें दीपक से लगा दिया जाय तो वह
उन्हें जला देगा। उसी प्रकार आत्मा की सत्ता शक्ति से प्राणि अपने प्रारब्ध के अनुसार व्यवहार करते रहते हैं;
लेकिन वही आत्मा स्वयंभू स्वस्वरूप में स्थिर हो जाने पर आत्मा का अनुसंधान करने पर संसार का भान नहीं
रहता फिर भिन्न-भिन्न आकार के बद्ध जीव कैसे रहेंगे? इस प्रकार देखने पर संसार बन्धन मुझे मिथ्या ही लगता
है। संसार बन्धन के लिये निश्चित स्थान कोई नहीं है। आत्मा में और देह दोनों में कोई भवबंध नहीं है, इसलिये
वह मिथ्या है, उसे कहीं कोई ठिकाना नहीं है। श्रीकृष्ण ! तुम नाराज न हो। मेरा निश्चय है कि संसारबन्धन
सचमुच ही मिथ्या है। उद्धव का यह भाषण सुनकर श्रीकृष्ण के आनन्द में उफान आ गया। उन्होंने मन ही मन
कहा, मेरा उद्धव अब ज्ञानी हो गया, उसे निजात्म की पहचान हो गयी। भवबन्धन सचमुच मिथ्या है, यह उद्धव
का भाषण सुनकर श्रीकृष्ण परमानंद से डोलने लगे और उद्धव पर प्राण न्योछावर करने की उन्हें इच्छा हुई।
आत्मा को भवबन्धन नहीं है, देह में भी वह नहीं दिखायी देता, यह विचार जिनकी समझ में नहीं आता उन्हीं
को भवबन्धन है, ऐसा श्रीकृष्ण बताते हैं।
श्रीभगवानुवाच
यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः संनिकर्षणम्।
संसारः फलवास्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः ॥१२॥
जो वर्णाश्रम से परे है, जो बंधमोक्ष से अलिप्त है, जो देहद्वंद्व को स्पर्श न करने वाला है, वह श्रीहरि उद्धव
के हित की बात करने लगा। मैं स्थूल, मैं कृश, मैं गोरा, मैं काला, ये देह के 'देहधर्म' हैं और मैं काना, मैं गूँगा,
मैं बहरा, ये इन्द्रियों के इन्द्रियधर्म हैं। क्षुधा, तृषा आदि 'प्राणधर्म' हैं। काम, क्रोध, लोभ आदि जो संभ्रम हैं वह
मन का 'मनोधर्म' है। सत्वगुण से जागृति, रजोगुण से स्वप्नस्फूर्ति और तमोगुण से जड़ता और सुषुप्ति, ये
वास्तव में देह के योग से होते हैं। देह को मारण आने पर 'मैं मेरा' कहता है और देह का जन्म होने पर 'मैं
जनमा' समझता है। इन्द्रिय विषय सेवन करते रहते हैं फिर भी मैं स्वयं उसका सेवन कर रहा हूँ, ऐसा मानता है;
स्वर्ग-नरक के भोग देहात्मता के कारण ही सच मालूम होते हैं। प्राण अन्न की इच्छा करता है, उसे खाता है
अग्नि; लेकिन वह स्वयं चिदात्मा उसका साक्षी होते हुए, वह अन्न मैंने ही खाया ऐसा समझता है। ये सारे धर्म
'मेरे ही हैं' ऐसा जब तक आत्मा को पक्का भ्रम है, तब तक वह मिथ्या ही रहने वाला अत्यन्त दुर्गम और विषम
संसार का भ्रमवश भोग करता रहता है। उस भोग का फल अत्यन्त कठिन है अविराम जन्म-मरण, स्वर्ग-नरक,
पाप-पुण्य, यह सब वह भ्रम के कारण सच ही मानता है। संसार तो वास्तव में निर्मूल है; लेकिन वह भ्रम के
फल से सदा फलता-फूलता है। अविवेकी लोग उसे अत्यन्त प्रबल समझते हैं और वह निरन्तर फलता-फूलता
है। जिसका सचमुच कोई अर्थ नहीं है, उसे 'अनर्थ' कहते हैं। उस अनर्थ का फलभोग भी वही भोगते हैं जो
७४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बच्चों के हौवे से भय खाते हैं। (आशंका) आकाशपुष्पों की माला यदि बाँझ का लड़का पहने तभी संसार भोग
का मेला आत्मा के पास दिखायी देगा। ऐसी न होने वाली बात कैसे होगी? इसी अर्थ का निरूपण बड़े चाव से
श्रीकृष्ण उद्धव को सुनाते हैं।
अर्थे ह्यविद्यमानेपि संसृतिर्न निवर्तते।
ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ १३ ॥
सत्य का अंश न होते हुए भी यह संसार अत्यन्त असाध्य है और छूटता नहीं है, इसी अर्थ का निर्णयात्मक
विचार सुनाता हूँ। बाँझ स्त्री के बच्चे की ही तरह संसार की कोई वास्तविकता नहीं है। उसे सच माना जाय तो
उसका कालांतर में ही विनाश होने वाला है। संसार यदि वास्तविक होता तो उसका ब्रह्मज्ञान से भी विनाश नहीं
हुआ होता। इसलिये वह सत्य है या मिथ्या है इसका निर्णय ही नहीं लिया जा सकता। उसी प्रकार इसकी बात
अनिर्वचनीय है। अविचार के कारण इसकी चाह उत्पन्न होती है, अविवेक के कारण यह अतिमधुर लगता है;
विषय के ध्यान से यह बढ़ता है और संकल्प ही इसका सशक्त मूल है। न रहते हुए भी इसका आभास होता है।
सोये हुए को स्वप्न में अनर्थ का आभास होता है उसी प्रकार यह संसार माया के योग से भ्रान्ति से विषय भोगने
को बाध्य करता है। विषयों का जैसे-जैसे सेवन किया जाता है वैसे-वैसे विषयों का ध्यान बढ़ता जाता है और हे
उद्धव ! विषय की लगन से सुदृढ़ संसार बन्धन प्राप्त होता है। विषय सेवन के कारण ही जीव का भवबन्धन दृढ़
हो गया है। उन्हीं विषयों का भान जीवन्मुक्तों को दैवयोग से दिखायी देता है। जीवन्मुक्तों को विषयप्राप्ति होने से
उनकी मुक्ति का विलय हो जायेगा, ऐसी शंका मन में न लाओ। इसी का स्पष्टीकरण श्रीकृष्ण करते हैं।
यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापे बह्वनर्थभृत्।
स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ १४ ॥
सज्ञान और अज्ञान का जो विषय सेवन होता है, उनका अनुभव भिन्न-भिन्न होता है। इसका भी लक्षण
सुनो। उसका भी लक्षण सुनो। स्वप्न में मिले हुए विषयों को स्वप्नस्थ लोग किस प्रकार सच मान लेते हैं,
लेकिन नींद खुलने पर उसकी सत्यता में विश्वास नहीं होता उसी प्रकार अज्ञानी जब विषयों का सेवन करते हैं
तो उनका मन विषयासक्त होता है; लेकिन वही विषय जीवन्मुक्तों को दिखाई देने पर वे उसे मिथ्या मानते हैं।
नाटक में जिस प्रकार अभिनेता लोकदृष्टि के अनुसार स्त्री-पुरुष के रूप में विचरण करते हैं, उसी प्रकार
मुक्तपुरुष के घर में स्त्री बच्चों के साथ व्यवहार करते हैं अथवा जिस प्रकार बालक खेल-खेल में तुलसी-पत्र
लेकर उससे विविध वस्तुओं की कल्पना करते हैं, उसी प्रकार जीवन्मुक्तों के लिये संसार में एक ही विषय रहता
है। लेकिन जीवन्मुक्त लोग इन विषयों को अनेकत्व से नहीं देखते। देहाभिमान दृढ़ रहने पर 'मैं' और 'मेरा' इस
विषय का स्फुरण ही संसारबन्धन का कारण है। इसी का स्पष्टीकरण श्रीकृष्ण करते हैं।
शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः ।
अहंकारस्य दृश्यन्ते जन्म मृत्युश्च नात्मनः ॥ १५ ॥
देहाभिमान के उदर में सहस्रों दुःख भरे रहते हैं। उनके गुणकार्य सारांश रूप में श्रीकृष्ण जगसेठी बता रहे
हैं। देहाभिमान का कार्य ऐसा है कि वह अद्वैत में भेद उत्पन्न करता है। इससे यह सारा संसार इष्ट और अनिष्ट
बातों से भर गया है। अपने नाशवान इष्ट वस्तुओं का नाश होते ही उससे देह का अहंकार दुःख करने लगता है।
इसी को सब लोग शोक कहते हैं। नश्वर विषयों की प्राप्ति होने पर मन को बड़ा संतोष होता है। उद्धव ! इसी
अट्ठाईसवाँ अध्याय ७४३
को लोग 'हर्ष' कहते हैं। सारे बलवान सम्बन्धी मिलकर अपनी पसन्द की वस्तु के लिये मारपीट करने आते हैं,
जिससे मन व्याकुल होता है। इसी को 'भय' कहते हैं। अपने इष्ट काम में किसी के व्यवधान करने पर उसका
विनाश करने के लिये दौड़ना, इसे 'क्रोध' कहते हैं। करोड़ों की सम्पत्ति संग्रह में होने पर कौड़ी खर्च करने के
लिये प्राण छोड़ना यह 'कंजूस' व्यक्ति की रीति है। इसी का नाम है 'लोभ का बंधन'। कर्म क्या है और अकर्म
क्या है, हित किसमें हैं और अहित किससे है, इष्ट क्या है और अनिष्ट क्या है, इसका विचार न होना और समझ
में न आना, इसी का नाम 'मोह' है। नित्य विषय सेवन करते हुए भी मन में बार-बार विषय की प्रबल इच्छा
उत्पन्न होना, अखण्ड विषयों का ही ध्यान करना, इसका नाम 'स्पृहा' है। ये जो नानाप्रकार के गुण अथवा जन्म-
मरण हैं उनका आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह सारा भोग देहाभिमान ही भोगता है। जागृति और स्वप्न
देखने में देहाभिमान होता है। इसलिये वहाँ ये गुण दिखायी देते हैं। लेकिन सुषुप्ति में ये गुण नहीं होते। वृत्ति
जब निरभिमान रहती है उस समय जन्म-मरणादि गुण नहीं उभरते। गुणों का कारण केवल अभिमान है। वायु
पानी पर बहता है और जमीन पर भी बहा है लेकिन जल पर लहरें उठती हैं, वे जमीन पर नहीं उठतीं। अतः
लहरों का उठना यह धर्म पानी में रहता है। उसी प्रकार शोक आदि करोड़ों धर्म अहंता में होते हैं। इससे अहंकार
को ही बन्धन है। अतः उसी को मुक्ति मिले ऐसा यदि तुम कहो, तो वह अहंता जीव के साथ लगी हुई है। जिसे
अंत्यज से छूत लगती है, उसे गंगास्नान से शुद्धि मिलती है, लेकिन वही गंगा स्नान अंत्यज की शुद्धि के लिये
व्यर्थ है। उसी प्रकार अहंता जीव के साथ जुड़ी हुई है, उसे छोड़ देने पर उसे मुक्ति है। लेकिन अहंकार को
मुक्ति कल्पांत में भी सम्भव नहीं है।
देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः।
सूत्रं महानित्युरुधेव गीतः संसार आधावति कालतन्त्रः॥ १६॥
आत्मा अनंत, अपार, ज्ञानमय, मायातीत और सम्पूर्ण है। वही माया का अधिष्ठान बनता है, इसीलिये उसे
'अंतरात्मा' कहते हैं। माया को व्याप कर भी वह अपार है। इसीलिये उसे परमेश्वर कहते हैं। वही माया का
नियंता है इसलिये उसे 'ईश्वर' कहते हैं। 'अविद्या' में प्रतिबिम्बित हुआ है इसलिये उसे 'जीव' कहते हैं और
वही देह की लगन से प्रबल होकर 'अहंकार' बन गया। वही 'संकल्प', 'विकल्प' इन विकारों के संसर्ग से
'मन' बन कर विद्यमान है और उस मन के गमन के लिये वह इन्द्रिय भी वही बन गया है। उन इन्द्रियों को
आधार, सुख-दुःख भोगों का समुदाय, पाप-पुण्य का चमत्कार इस प्रकार 'देह' का आकार भी वही बन गया है
और उस देह का कारण जो सत्त्व, रज और तम गुण हैं, वे भी वह स्वयं ही हो गया है। गुणक्षोभ का मुख्य मर्म
'पंचविषय', विषय भोग आदि क्रिया कर्म और 'स्वधर्म' भी वह स्वयं ही बन गया है। तीनों गुणों के जन्म का
कारण जो यह 'महत्तत्त्व' अथवा 'प्रधान सूत्र' है वह भी वह स्वयं ही हो गया है। इस प्रकार सारा संसार ईश्वर
स्वयं ही बन गया है। उसी संसार को आश्रयभूत ऐसी गुणसाम्यरूप प्रकृति वही बना हुआ है। उसी प्रकार
उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने वाली क्षोभक शक्ति तो 'काल' है वह भी वह स्वयं ही बन गया है। वह काल
अपने सत्ता सामर्थ्य से जीव की अथवा संसार की उत्पत्ति करता है, पालन करता है और अन्त में संहार करता
है। ऐसी आवृत्ति वह कितनी बार करता है, इसका पता नहीं है। इससे ज्ञात होता है कि परब्रह्म की स्फूर्ति ही
संसार है। उसी को लीला शक्ति से साकार स्थिति प्राप्त हुई है। मैं विश्वेश्वर होते हुए विश्वस्वरूप हूँ। नानापदार्थ
मैं ही हूँ। इसलिये जो भी पदार्थ दिखाई देता है वह आत्मा का ही स्वरूप है। मुझसे अलग कोई पदार्थ नहीं है,