श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 748, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें७३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जरा देखो। वे ऐसे विश्वास से मेरा भजन नहीं करते। जो जहाँ भी मेरा भजन करने बैठता है, वहाँ मैं उसे वैसा
ही दिखायी देता हूँ, यह रहस्य उपासना मार्ग प्रकट करने के बहाने सहज ही प्रकट किया। उपासनाकाण्ड का
मर्म यही है कि समस्त प्राणियों में मैं देवाधिदेव हूँ। यह बात जिनकी समझ में नहीं आती उनके लिये यह मूर्ति
प्रकार बताया। मेरी प्रतिमामूर्ति ही क्यों न हो, लेकिन वह भी चिदात्मरूप मैं ही हूँ। उद्धव! उसकी भावपूर्ण भक्ति
करने से भी भक्तों का उद्धार होता है।
एवं क्रियायोगपथैः पुमान् वैदिकतान्त्रिकैः।
अर्चन्नुभयतः सिद्धिं मत्तो विन्दत्यभीप्सिताम्॥ ४९॥
सारांश, क्रियायोग का लक्षण वैदिक और तांत्रिक अर्थात् मिश्र है। उसका वेदशास्त्र में अत्यधिक विस्तार
है। उसका थोड़ा सार-तत्त्व तुम्हें बताया। इस क्रियायोग के भजनमार्ग से भक्त यदि भोग और मोक्ष माँगे तो इन
दोनों की सिद्धि श्रीहरि उन्हें तत्काल देता है। भक्त यदि निष्काम बुद्धि से अनन्य भक्ति करने लगे तो भोग मोक्षादि
सम्पत्ति लेकर मैं श्रीपति उसके द्वार पर उसकी सदा प्रतीक्षा करता रहता हूँ।
मदर्चां सम्प्रतिष्ठाप्य मन्दिरं कारयेद् दृढम्।
पुष्पोद्यानानि रम्याणि पूजायात्रोत्सवाश्रितान्॥ ५० ॥
मेरे भक्त अत्यन्त प्रेम से मेरी निर्व्यंग प्रतिमा तैयार कराकर सद्भाव से स्थापित करते हैं और मजबूत
देवालय बनवाते हैं। वन, उपवन, उद्यान, पुष्पवाटिका आदि का आयोजन करते हैं और विधियुक्त नित्य पूजा कर
उत्साहपूर्वक महापूजा करते हैं। उस देवता की यात्रा का आयोजन हो, बहुजन समाज एकत्र हो, वार्षिक पर्व में
महापूजा आयोजित हो और वह अखण्ड चलती रहे, इसके लिये श्रीकृष्ण सहज उपाय बताते हैं।
पूजादीनां प्रवाहार्थं महापर्वस्वथान्वहम्।
क्षेत्रापणपुरग्रामान् दत्वा मत्सार्ष्टितामियात् ॥ ५१ ॥
नित्यपूजा, महापूजा अथवा वार्षिक पर्व नियमित रूप से चलें इसके लिये राजा ग्रामवासियों को कुछ वार्षिक
सहायता देकर निर्वाह की व्यवस्था करता है। 'क्षेत्र' अर्थात् बड़ा खेत, 'बाजार' उस बाजार में होने वाली आमदनी
देता है, जो बिना बाजार के होता है, वह है 'ग्राम'। अब 'पुर' का अर्थ सुनो। 'बाजार' जहाँ लगता है वह है 'पुर'
अर्थात् शहर। इस प्रकार जो लोग देवालय को अर्पण करते हैं, वे सर्वत्र मेरा ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं। देवालय में मूर्ति
की प्रतिष्ठा करने से अथवा पूजा करने से कर्त्ता को क्या फल मिलता है, इसके सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्मना भुवनत्रयम्।
पूजादिना ब्रह्मलोकं त्रिभिर्मत्साम्यतामियात् ॥ ५२ ॥
जो मूर्ति की प्रतिष्ठा करके रखता है, उसे सार्वभौम राज्य प्राप्त होता है, जो स्वयं देवालय बनवाता है, वह
त्रिभुवन का स्वामी बनता है। जो पूजाविधान करता है वह सत्यलोक में जाता है। जो ये तीनों बातें करता है उसे
मेरे जैसा ऐश्वर्य प्राप्त होता है। ये तीनों प्रकार के साधक सकाम होते हुए भी अपने इच्छित लोक में जाते हैं।
लेकिन जो निष्काम भक्त होते हैं, उन्हें क्या प्राप्त होता है, उनका लक्षण श्रीकृष्ण अत्यन्त आदर से बता रहे हैं।
मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन विन्दति।
भक्तियोगं स लभते एवं यः पूजयेत् माम् ॥ ५३ ॥