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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 743, कुल 869 में से

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पृष्ठ 743

सत्ताईसवाँ अध्याय ७२७
उनका पूजन करें। गुरु-दुर्गादिक तथा अष्ट लोकपालों की, प्रोक्षण पाद्य आदि उपचारों से निश्चल मन से यथासांग
पूजा करें। उस पूजा के क्या उपचार हैं आदि के बारे में श्रीकृष्ण अगले छह श्लोकों में संक्षेप में बता रहे हैं।
चन्दनोशीरकर्पूरकुंकुमागुरुवासितैः ।
सलिलैः स्नापयेन्मन्त्रैर्नित्यदा विभवे सति ॥ ३० ॥
स्वर्णधर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया।
पौरुषेणापि सूक्तेन सामभी राजनादिभिः ॥ ३१ ॥
इलायची, खस, कर्पूर, चन्दन, रोरी, केशर तथा उसमें अगर मिलाकर उससे सुगन्धित किया हुआ जल
स्नान करने के लिये दें। सुगन्धित किया हुआ यह पवित्र गंगा जल शंख में शंखमुद्रा दिखाकर भरें। ऐसा शुद्ध
जल लेकर आपस्तंभ शाखा का 'सुवर्णधर्म' अनुवाक पढ़कर उससे अभिषेक करें अथवा केवल पुरुषसूक्त,
रुद्राभिषेक या विष्णुसूक्त मंत्रों से देवता को स्नान करायें अथवा सामवेद का गायन कर अर्थात् उसमें के राजनादि
साम गाकर उससे देवता को स्नान करायें। द्रव्य की अनुकूलता के अनुसार इस ठाठ से प्रतिदिन महाभिषेक करें।
अन्यथा किसी विशेष पर्व पर अथवा जयन्ती उत्सवों के समय इस प्रकार का स्नान करायें। आगमशास्त्र में वर्णित
सुलक्षण महापुरुष विद्या आदि के साथ देवता को स्नान करायें। देवता का सम्पूर्ण स्नान होने के बाद मंगलारती
करें और फिर देवता को वस्त्र, आभूषण आदि से अलंकृत करें।
वस्त्रोपवीताभरणपत्रस्रग्गन्धलेपनैः ।
अलंकुर्वीत सप्रेम मद्भक्तो मां यथोचितम् ॥ ३२ ॥
देव मेघ की तरह श्यामवर्ण का है। उसकी कटि में जरी का पीताम्बर पहनायें, गले में सुवर्ण यज्ञोपवीत
डालकर कटि में रत्नजड़ित करधनी पहनायें। कंकण चूड़ियों का सुमधुर घोष, पैरों में घुँघरू की झंकार, मस्तक
पर मनोरम मुकुट, कान में कुण्डल तथा हृदय पर सुन्दर महापदक ! कपाल पर जड़ित मोतियों की बेल, उसके
नीचे पीले चंदन का टीका, कंठ में शोभे कौस्तुभ, बाहुओं पर कंकण, उँगलियों में रत्नों से जड़ी अँगूठियाँ और
पीताम्बर की आभा तो ऐसी कि उसके तेज के आगे सूर्य का तेज भी फीका पड़ जाये। भगवान के साँवले अंग
पर शुभ्र चन्दन का लेप शोभा दे रहा है मस्तक पर केशों पर लपेटी पुष्पों की माला है जिस पर भ्रमर अपने
घोंसले बनाने की ताक में हैं। 'वैजयंती' और वनमाला पैरों तक झूल रही हैं और आँखों को भव्य दिखायी दे रही
हैं। इस प्रकार वह मेघ श्याम देव सुशोभित दिखायी दे रहा है। इस प्रकार वस्त्रालंकार भूषणों से श्रीहरि की पूजा
करें। लेकिन पूजा से भी अधिक श्रद्धा मन में होनी चाहिये। भक्त अत्यन्त सम्पन्न हो अथवा दरिद्र हो, जहाँ
परिपूर्ण श्रद्धा होती है वहीं नारायण सन्तुष्ट होता है। सकल पूजा में श्रद्धा ही प्रमाण है। जो अत्यन्त श्रद्धालु होता
है वही देव का अत्यन्त लाडला होता है।
पाद्यमाचमनीयं च गन्धं सुमनसोऽक्षतान्।
धूपदीपोपहार्याणि दद्यान्मे श्रद्धयार्चकः॥ ३३ ॥
इस प्रकार मूर्ति का पूरी तरह शृंगार करने के बाद पाद्य, अर्घ्य और आचमन करें और मधुपर्क विधान कर
श्रद्धायुक्त पूजा करें। गन्ध, अक्षत, अच्छे सुगन्धित फूल, दशांग धूप, दीपदान, नीरांजन आदि साहित्य के साथ
साधकों को पूर्ण श्रद्धा से मेरी पूजा करनी चाहिये।