श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 747, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्ताईसवाँ अध्याय ७३१
ही मुख्य है। उसी से नारायण सन्तुष्ट होता है। देव को भक्ति-प्रेम की ही चाह है। वह भाषा का आडम्बर नहीं
देखता। भाविक का भावार्थ ही उसे प्रिय लगता है। इसलिये देव के लिये भक्तों की बात टालना कठिन हो जाता
है। सारांश, भक्तिभाव से स्तवन करने से देव भक्तों के वश में हो जाता है। इसलिये भक्तिभाव से ही नमस्कार
कर हरि चरणों में मत्था नवाना चाहिये। मुहूर्त, निमेष अथवा क्षणभर के लिये भी यदि मन हरिचरणों में सुखी
हुआ तो उस सुख से अन्य कार्य सहज ही सम्पन्न हो जाते हैं। जिससे मेरा अनुसंधान टूट रहा हो, ऐसा कर्म छोड़
दें और जिससे मन स्वरूपनिष्ठ हो कर रहे, ऐसा ही समाधान रखें। जिससे भगवान को सप्रेम नमन करने से
नित्य नया समाधान प्राप्त होता हो, उस नमन का क्या लक्षण है? तो साष्टांग दण्डवत् यही लक्षण है। हाथ से
डण्डा छूट रहा हो फिर भी जो आगे-पीछे मुड़ कर नहीं देखता उसी प्रकार देहाभिमान त्याग कर अहेतुक होकर
साष्टांग दण्डवत् करें। देह की ओर ध्यान देते हुए भी जो परमार्थ सिद्धि के लिये नमन करता है उसका लक्षण
श्रीकृष्ण बताते हैं।
शिरोमत्पादयोः कृत्वा बाहुभ्यां च परस्परम्।
प्रपन्नं पाहि मामीश भीतं मृत्युग्रहार्णवात्॥ ४६॥
भक्त मेरे चरणों पर शीश रखकर दोनों पैर भक्तिभाव से पकड़ता है और कहता है कि संसारसागर के गर्भ में
मृत्युरूपी मगर ने मुझे पकड़ रखा है; इसलिये हे जगज्जेती, मुझे इस मगर की पकड़ से बचाइये। संसार भय से
आक्रांत होने के कारण मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ। मुझे जन्म-मरण की बाधा से मुक्त कीजिये। मैंने भक्तिभाव से
तुम्हारे पूज्य चरण कस कर पकड़ रखे हैं। तुम्हारे जैसा स्वामी मेरी रक्षा में हो तो बेचारा मृत्यु मुझे कैसे मार सकता
है ? इसलिये भक्तिभाव से आपके चरणों पर दण्डवत कर रहा हूँ। हे कृपालु! कृपा करके मेरा उद्धार करें। वह
साष्टांग नमस्कार और भयभीत होकर किया हुआ स्तवन सुनकर नारायण प्रसन्न हुआ ऐसी मन में भावना करें।
इति शेषां मया दत्तां शिरस्याधाय सादरम्।
उद्वासयेच्चेदूद्वास्यंज्योतिर्ज्योतिषि तत् पुनः॥ ४७॥
तदुपरान्त मैंने दिया हुआ शेष प्रसाद प्रसन्नतापूर्वक धारण करें। जहाँ प्रसिद्ध अचल (स्थावर) मूर्ति हो, वहाँ
विसर्जन विधि नहीं करनी चाहिये। किन्तु जहाँ चल (जंगम) प्रतिमामूर्ति हो, उसमें जिस आत्मज्योति से
आवाहन किया हो, उस ज्योति को पुनः अपने हृदय में स्थापित करें। पुनः उसका अपनी आत्मज्योति से मिलन
करायें। इस प्रकार विसर्जन तक की पूजा-विधि सुनकर उद्धव के मन में आया कि साधकों की पूज्य मूर्ति कौन-
सी है? उद्धव का यह मनोगत जानकर उसके सम्बन्ध में ही देव बताते हैं।
अर्चादिषु यदा यत्र श्रद्धा मां तत्र चार्चयेत्।
सर्वभूतेष्वात्मनि च सर्वात्माहमवस्थितः॥ ४८॥
उद्धव! जिसे जो मूर्ति अच्छी लगी हो, वह उसके लिये पूज्य है, इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। विष्णु,
ब्रह्मदेव, सूर्य, शिव, शक्ति अथवा गणपति इनमें से किसी भी मूर्ति में मैं सर्वात्मा समान हूँ। किसी भी प्रतिमा का
पूजन करो लेकिन वह पूजा मेरे लिये समान है। भक्तों का प्रेम जिसमें अधिक रहता है, उसके अधीन मैं परमात्मा
रहता हूँ। बच्चे के साथ खेलते समय जिस प्रकार माँ उसी की इच्छा के अनुसार खेलती है। उसी प्रकार भक्त प्रेम
की लीला के अनुसार मैं भी क्रीड़ा करता हूँ। मैं इन सभी प्राणियों में तथा अवतारों में लिये गये देह में एक
समान हूँ, इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। उद्धव! मैं जहाँ न रहूँ ऐसा कोई स्थान ही नहीं लेकिन प्राणियों का भाग्य