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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 749, कुल 869 में से

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पृष्ठ 749

मुख्यरूप से मुझे अंतःकरण में रखकर जो मेरा निष्काम भजन करते हैं, जो निष्कामता में अनन्य होते हैं, वे
पुरुष मैं बन जाते हैं। विद्यमान स्वरूप में रहते हुए भी वास्तव में मेरा ही स्वरूप रहते हैं। हम दोनों में कोई अन्तर
नहीं होता। निष्काम भजन करने के कारण वह भक्त मुझ जैसा हो जाता है। 'समान' भी क्यों कहा जाय, उसमें
और मुझमें कोई भेद नहीं रहता। इस प्रकार वह भक्त मुझमें और मैं भक्त के अन्दर-बाहर मिलकर विचरते रहते
हैं। गुड़ जिस प्रकार माधुरी से अभिन्न रहता है या जिस प्रकार लहरें समुद्र से अभिन्न रहती हैं, उसी प्रकार वह
और मैं अभिन्न रूप में रहते हैं। इस प्रकार जो निष्काम भक्ति करता है वह चराचर में धन्य है। अब जो देवता को
और ब्राह्मण को दी हुई वृत्ति (खेत इत्यादि) हरा करता है, वह अघोर नरक में जाता है। उसके बारे में भी सुनो।
यः स्वदत्तां परैर्दत्तां हरेत सुरविप्रयोः।
वृत्तिं स जायते विड्भुग् वर्षाणामयुतायुतम्॥ ५४॥
कर्तुश्च सारथेर्हेतोरनुमोदितुरेव च।
कर्मणां भागिनः प्रेत्य भूयो भूयसि तत्फलम्॥ ५५ ॥
जो देवालय की प्राप्ति का हरण करता है, ब्राह्मण की वृत्ति का अपहार करता है, वह करोड़ों वर्ष तक
सुअर की योनी में जन्म लेकर विष्ठा खाता रहता है। उसी प्रकार ब्राह्मण की वृत्ति हरण करने के काम में जो
सहायता करता है, अथवा उसका जो अनुमोदन करता है, वे तीनों अघोर नरक में जाते हैं। उद्धव! वे जन्म-मरण
के भँवर में फँस कर वही फल मर-मर कर बार-बार भोगते रहते हैं। मेरी प्राप्ति की यदि मन में इच्छा हो तो मन
को अकर्म का स्पर्श नहीं होने देना चाहिये। अधर्म कर्म की बात नहीं करनी चाहिये। किसी के दोष नहीं देखने
चाहिये, किसी को चोट पहुँचे ऐसी बातें नहीं करनी चाहिये और प्राणिमात्र का द्वेष कभी नहीं करना चाहिये।
दूसरे की निन्दा कभी नहीं सुननी चाहिये, दूसरे के दोष नहीं कहने चाहिये, अधर्म के भाषण में कभी भी किसी
से नहीं मिलना चाहिये। त्रिभुवन के सारे पातक जिसे अपने माथे पर लेने हों, वह अपने मुख से साधुओं की
निन्दा कर सकता है। दुःखों की सारी राशियाँ अपने पास आ जायें ऐसी जिसे इच्छा हो वह अवश्य ब्रह्मद्वेष करे।
सारा समय व्यर्थ ही बीत जाय, ऐसी जिसे इच्छा हो वह रात-दिन चौपड़ का खेल रचाये। हृदय में रहने वाला, मैं
आत्माराम, स्वतः सिद्ध परब्रह्म हूँ उसके दुर्गम होने के लिये ही संसार को अधर्म कर्म लगा हुआ है। वह
कर्माकर्म नष्ट करना अत्यन्त आसान है। पुरुषोत्तम, अच्युत, रामराम का अखण्ड नामस्मरण करते रहना चाहिये।
जहाँ हरिनाम का अखण्डघोष चलता है, वहाँ कर्माकर्म की राशियाँ पूरी तरह जल जाती हैं। उनकी जरा-सी राख
भी शेष नहीं रह जाती। हरि का नाम इतना पवित्र है। हरि का नाम सारे पापों का विनाश करता है, यह बात सारे
शास्त्र बता रहे हैं। ऐसा होते हुए भी जो इसमें सन्देह करता हो उसे वज्रपापी समझना चाहिये। श्रीमहाभागवत्
ऐसे वज्रपापों के पर्वत भी भस्म कर देता है। जनार्दन की कृपा से वह मुझे अनायास प्राप्त हो गया है। इस
भागवत का अर्थ यही है कि हरि का नाम अत्यन्त समर्थ है। इस सम्बन्ध में हरि ने स्वमुख से पराकाष्ठा का
वर्णन किया है। यहाँ भी जो विकल्प करे उसे संसार में अत्यन्त भाग्यहीन समझना चाहिये। विकल्प के कारण
वह महादोषों के दुःख सागर में डूबा ऐसा समझना चाहिये। संकल्प-विकल्प के ही कारण लोगों के दृढ़बन्धन
को काटने के लिये एक जनार्दन का नाम ही समर्थ है। कैसा भी भवभय क्यों न हो लेकिन जनार्दन का नाम
उसका विनाश कर देता है। वह नाम जो अंतर-प्रेम से स्मरण करता है, वह स्वयं ही पुरुषोत्तम बन जाता है।
स्वयं ही पूर्ण ब्रह्म कैसे बनें इस विषय का सुमधुर निरूपण अट्ठाइसवें अध्याय में श्रीकृष्ण उद्धव को सुनायेंगे।