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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 758, कुल 869 में से

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पृष्ठ 758

७४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बच्चों के हौवे से भय खाते हैं। (आशंका) आकाशपुष्पों की माला यदि बाँझ का लड़का पहने तभी संसार भोग
का मेला आत्मा के पास दिखायी देगा। ऐसी न होने वाली बात कैसे होगी? इसी अर्थ का निरूपण बड़े चाव से
श्रीकृष्ण उद्धव को सुनाते हैं।
अर्थे ह्यविद्यमानेपि संसृतिर्न निवर्तते।
ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ १३ ॥
सत्य का अंश न होते हुए भी यह संसार अत्यन्त असाध्य है और छूटता नहीं है, इसी अर्थ का निर्णयात्मक
विचार सुनाता हूँ। बाँझ स्त्री के बच्चे की ही तरह संसार की कोई वास्तविकता नहीं है। उसे सच माना जाय तो
उसका कालांतर में ही विनाश होने वाला है। संसार यदि वास्तविक होता तो उसका ब्रह्मज्ञान से भी विनाश नहीं
हुआ होता। इसलिये वह सत्य है या मिथ्या है इसका निर्णय ही नहीं लिया जा सकता। उसी प्रकार इसकी बात
अनिर्वचनीय है। अविचार के कारण इसकी चाह उत्पन्न होती है, अविवेक के कारण यह अतिमधुर लगता है;
विषय के ध्यान से यह बढ़ता है और संकल्प ही इसका सशक्त मूल है। न रहते हुए भी इसका आभास होता है।
सोये हुए को स्वप्न में अनर्थ का आभास होता है उसी प्रकार यह संसार माया के योग से भ्रान्ति से विषय भोगने
को बाध्य करता है। विषयों का जैसे-जैसे सेवन किया जाता है वैसे-वैसे विषयों का ध्यान बढ़ता जाता है और हे
उद्धव ! विषय की लगन से सुदृढ़ संसार बन्धन प्राप्त होता है। विषय सेवन के कारण ही जीव का भवबन्धन दृढ़
हो गया है। उन्हीं विषयों का भान जीवन्मुक्तों को दैवयोग से दिखायी देता है। जीवन्मुक्तों को विषयप्राप्ति होने से
उनकी मुक्ति का विलय हो जायेगा, ऐसी शंका मन में न लाओ। इसी का स्पष्टीकरण श्रीकृष्ण करते हैं।
यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापे बह्वनर्थभृत्।
स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ १४ ॥
सज्ञान और अज्ञान का जो विषय सेवन होता है, उनका अनुभव भिन्न-भिन्न होता है। इसका भी लक्षण
सुनो। उसका भी लक्षण सुनो। स्वप्न में मिले हुए विषयों को स्वप्नस्थ लोग किस प्रकार सच मान लेते हैं,
लेकिन नींद खुलने पर उसकी सत्यता में विश्वास नहीं होता उसी प्रकार अज्ञानी जब विषयों का सेवन करते हैं
तो उनका मन विषयासक्त होता है; लेकिन वही विषय जीवन्मुक्तों को दिखाई देने पर वे उसे मिथ्या मानते हैं।
नाटक में जिस प्रकार अभिनेता लोकदृष्टि के अनुसार स्त्री-पुरुष के रूप में विचरण करते हैं, उसी प्रकार
मुक्तपुरुष के घर में स्त्री बच्चों के साथ व्यवहार करते हैं अथवा जिस प्रकार बालक खेल-खेल में तुलसी-पत्र
लेकर उससे विविध वस्तुओं की कल्पना करते हैं, उसी प्रकार जीवन्मुक्तों के लिये संसार में एक ही विषय रहता
है। लेकिन जीवन्मुक्त लोग इन विषयों को अनेकत्व से नहीं देखते। देहाभिमान दृढ़ रहने पर 'मैं' और 'मेरा' इस
विषय का स्फुरण ही संसारबन्धन का कारण है। इसी का स्पष्टीकरण श्रीकृष्ण करते हैं।
शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः ।
अहंकारस्य दृश्यन्ते जन्म मृत्युश्च नात्मनः ॥ १५ ॥
देहाभिमान के उदर में सहस्रों दुःख भरे रहते हैं। उनके गुणकार्य सारांश रूप में श्रीकृष्ण जगसेठी बता रहे
हैं। देहाभिमान का कार्य ऐसा है कि वह अद्वैत में भेद उत्पन्न करता है। इससे यह सारा संसार इष्ट और अनिष्ट
बातों से भर गया है। अपने नाशवान इष्ट वस्तुओं का नाश होते ही उससे देह का अहंकार दुःख करने लगता है।
इसी को सब लोग शोक कहते हैं। नश्वर विषयों की प्राप्ति होने पर मन को बड़ा संतोष होता है। उद्धव ! इसी