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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 754, कुल 869 में से

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पृष्ठ 754

किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत्।
वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ ४॥
जिसने जन्म ही नहीं लिया, वह काला है या गोरा है यह कैसा कहा जाय ? बिना ग्रहण के खग्रास नहीं
दिखाई देता। यदि ऊसर भूमि पर मृगजल का आभास हो तो वह गहरा है या छिछला है, मीठा या खारा है, यह
बताने में विचार कुंठित होगा। उसी प्रकार जब प्रपंच का भान ही मिथ्या है, तब उसमें के गुण और दोष खोजने
वाले ज्ञाता अज्ञान में डूबे ऐसा समझना चाहिये। यदि अमावस्या की रात्रि को अँधेरे का वजन करने अन्धे आये
तो वे दोनों हाथ से तौलें तो भी वजन एक रत्ती भी नहीं होगा। उसी प्रकार प्रपंच मिथ्या होने के कारण उसमें
कान का सुनना, या आँखों से देखना, जीभ से चखना अथवा शरीर से स्पर्श करना, उसी प्रकार हाथ से लेना-
देना, पैरों का चलना, वाचा का बोलना अथवा मन से कल्पना करना यह सब मिथ्या है। उसी प्रकार अहंकार का
जोश, चित्त का चिंतन, बुद्धि का विवेक-विचार यह विचार समूल मिथ्या है। दीवार पर बने चित्र का पानी और
अग्नि, अंत्यज और ब्राह्मण, बाघ और हिरन यह दिखाई देने पर भी दीवार पर दिखाई देने वाला आभास ही है।
उसी प्रकार यह द्वैतमय प्रपंच दिखाई देते हुए भी उसमें अद्वैत वस्तु का ही भास होता है। उसमें शुभ-अशुभ
कैसा ? सर्वत्र ब्रह्म ही परिपूर्ण है। केले के खोल खोलते समय प्रत्येक परदा रीता दिखाई देता है, उसी प्रकार
देहादि प्रपंच का विचार करने पर वह भी सचमुच मायिक अर्थात् मिथ्या है। उस मिथ्या प्रपंच में शुभाशुभ भी
मिथ्या है। परब्रह्म जो सत्य है, वह अपने स्थान पर स्थिर है। उसमें रत्तीभर भी शुभाशुभ नहीं है। जो इसे
शुभाशुभ कहता है, उसकी कल्पना ही उसके सामने खड़ी रहती है और वह अपनी ही कल्पना के महाभय से
मिथ्या जन्म-मरण भोगता रहता है।
छायाप्रत्याह्वयाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिणः ।
एवं देहादयो भावायच्छन्त्या मृत्युतो भयम् ॥ ५ ॥
वास्तव में पानी में प्रतिबिम्ब रहता ही नहीं है, जो देखता है वही उसमें प्रतिबिम्बित रहता है, उसी प्रकार
प्रपंच का स्वरूप भी मिथ्या है। वह हमारी कल्पना के कारण ही भासित होता है। उस प्रतिबिम्ब को आँखों से
देखकर, वह मैं ही हूँ कह कर कपाल पर टीका लगाये उसी प्रकार देहाभिमान में फँस कर जीव का सर फूटता
है। अपना अपने ही शब्दों की प्रतिध्वनि के प्रत्युत्तर आते हैं, जो मिथ्या होते हैं। लेकिन कान को वे शब्द सच्चे
ही लगते हैं। रस्सी का मूल स्वरूप वैसा ही रहता है किन्तु भ्रमवश बड़े सर्प का आभास होता है। वह रहता
मिथ्या ही है, फिर भी भय से शरीर काँपने लगता है और अफरातफरी कर देता है। इस प्रकार देहादिक मिथ्या
होते हुए भी देहाभिमान के कारण जीव को जन्म-मरण के अनेक भँवरों में उलझा कर आकल्प दुःख भोगने को
बाध्य करता है। आत्मा से ही देहादि भेद उत्पन्न हुए हैं ऐसा वेद कहते हैं; और वेद तुम्हारा ही रूप है यह प्रसिद्ध
है, अतः वेदवाद मिथ्या कैसे होगा? उद्धव को वेदवाद की शंका हुई। श्रीकृष्ण ने उसे पूरी तरह जान लिया
इसलिये वह उत्तर दे रहा है।
आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभुः ।
त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः ॥ ६ ॥
तस्मान्न ह्यात्मनोऽन्यस्मादन्यो भावो निरूपितः ।
निरूपितेयं त्रिविधा निर्मूला भातिरात्मनि ॥ ७॥