श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 741, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्ताईसवाँ अध्याय ७२५
पाद्योपस्पर्शार्हणादीनुपचारान् प्रकल्पयेत्।
धर्मादिभिश्च नवभिः कल्पयित्वाऽऽसनं मम॥ २५॥
पद्ममष्टदलं तत्र कर्णिकाकेसरोज्ज्वलम्।
उभाभ्यां वेदतन्त्राभ्यां मह्यं तूभयसिद्धये॥ २६॥
स्नान मण्डप की कल्पना कर वहाँ चित्स्वरूप देवता को लायें और पाद्य, अर्घ्य, आचमन, मधुपर्क आदि
विधियाँ करें। अभ्यंग से अंगमर्दन कर पुरुष सूक्त से स्नान करायें और स्नान के मण्डप में ही देवता को पीताम्बर
धारण करायें। अन्य यथोक्त पूजन सिंहासन पर ही करायें। उस आसन और पीठावरण के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण
स्वयं बता रहे हैं। सिंहासन पर के आवरण क्रम में आधारशक्ति, मूलप्रकृति, क्षीराब्धि, श्वेतदीप तथा वहाँ के
मनोरम कल्पवृक्ष इत्यादि की वहाँ भावना करें। उसके नीचे सुन्दर रत्न मण्डप, उसमें सुवर्ण के पलंग की कल्पना
करें। उस पलंग के बारे में श्रीकृष्ण बताते हैं धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य ये उस मंचक के चार पैर हैं। अधर्म,
अज्ञान, अनैश्वर्य तथा अवैराग्य ये उस मंचक के चौखट की चार आड़ी लकड़ियाँ हैं। ईश्वर तत्त्व सूत है,
गुणागुण से उसे बुनकर यह मंचक योगयुक्त महामुद्रा से मजबूती से बुना हुआ है ऐसी कल्पना करें। उस मंचक
पर अत्यन्त सुन्दर और सुशोभित शेष कुण्डली मार कर बैठा है तथा उसके पीछे उसके सहस्र फन रत्नों की
दिव्यता से दमक रहे हैं। शेष के वर्तुल में डंठल के साथ निर्मल लाल कमल खिला हुआ है, उसकी आठ
पंखुड़ियाँ हैं जो अपनी मनोहर शोभा बिखेर रही हैं। सत शक्ति यह उस कमलकंद का मूल है तथा ज्ञान उसकी
सरल नाल है और अष्टधा प्रकृति उस कमल की आठ पंखुड़ियाँ हैं। ऐसा वह सुन्दर कमल है तथा षड्विकार
उसके केसर हैं और वैराग्य उसका सुगन्धित मकरंद है। पूर्वादि अष्टदिशा के कमलदलों में उन-उन देवताओं का
न्यास करें। विमला, उत्कर्षिणी ज्ञाना और चौथी क्रियाशक्ति। उसी प्रकार योगा, प्रह्वी, सत्या और ईशाना इन
अष्टशक्तियों की स्थापना करें। उसी प्रकार अनुपम कल्पना से सजे हुए कमल के मध्यभाग में नौवें अनुग्रह की
स्थापना करें। आत्मा, अंतरात्मा और परमात्मा यह देवोत्तम का अगला भाग है। सत्त्व, रज, मोह, तम, यह उस
पुरुषोत्तम का पृष्ठभाग है। इस प्रकार धीरे-धीरे आगमोक्त पीठ न्यास कर देवाधिदेव को सिंहासन पर ले आयें।
छत्र और दो चँवर के साथ अनेक प्रकार के वाद्यों के जयघोष में उचित ढंग से मुद्रा दिखाकर श्रीहरि को आसन
पर बिठायें। मैं सर्वव्यापी होते हुए मेरा आवाहन करते हैं, मुझ निर्विकार को विकार मुद्रा दिखाते हैं। मुझ
ज्ञानस्वरूप को आँखें, निःशब्द को कान तथा मुझ विश्वतोमुख को सुन्दर मुख है ऐसी कल्पना करते हैं। मैं
विश्वपाद होते हुए दो पैरों से चलता हूँ; मुझ विश्वबाहु को चार हाथ हैं; और सर्वगत को एकदेशी स्थान की
कल्पना करते हैं। मुझ निरूपचार को उपचार; मुझ निदेह को अलंकार और सदा सम रहने वाले को शत्रु-मित्र;
ऐसी विचित्र कल्पना करते हैं। मुझ अकर्त्ता को कर्मबन्धन; अजन्मा को जन्म-निधन; नित्य-तृप्त को भोजन; और
निर्गुण को सगुण ऐसी कल्पना करते हैं। इन सबका यही तात्पर्य है कि उपासना काण्ड का निर्वाह हो। उपासकों
की जैसी भावना रहती है, उसके अनुसार मैं उनका देव बनता हूँ। मैं पूर्णकाम होते हुए भी भक्त के प्रेम के लिये
सकाम बनता हूँ। भक्तों का जैसा भाव होता है उसके अनुसार मैं पुरुषोत्तम उन्हें दिखायी देता हूँ। भक्त मेरे प्रति
जैसी भावना रखता है, वैसा ही मैं उसके लिये हो जाता हूँ। वह भावार्थ से मुझे जो भी अर्पण करता है, वह
सहज ही मेरे पास पहुँचता है। मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ, भक्त मुझे अर्पण करने के लिये जहाँ भी कहीं बैठा हो लेकिन
वह मुझे अनायास सहज ही अर्पण होता है। मैं देवाधिदेव सर्वत्र उपस्थित हूँ ऐसी प्राणियों में भावना नहीं होती,