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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 746, कुल 869 में से

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पृष्ठ 746

७३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
दत्त्वाऽऽचमनमुच्छेषंविष्वक्सेनाय कल्पयेत्।
मुखवासं सुरभिमत् ताम्बूलाद्यमथार्हयेत्॥ ४३॥
इस प्रकार ध्यान का विसर्जन होने पर देवता का भोजन हो गया ऐसी कल्पना कर, उसे शुद्ध आचमन
अर्पण करें। अग्नि का मूर्तिध्यान एवं स्वयं पूजी हुई प्रतिमा इन दोनों स्थानों में यथोक्त रीति से शुद्ध आचमन
समर्पित करें। देवता के नैवेद्य का अवशिष्ट भाग विष्वक्सेना को दें और फिर जूठन साफ करवाये। देवता के हाथ
धुलवायें। कर्पूर मिलायी हुई सुपारी के कतरे, पके पान का ताम्बूल, कत्था आदि मिलाकर रुचि के लिये दें।
इलायची, लौंग, कंकोल, थोड़ा जायफल, इन पदार्थों से युक्त ताम्बूल से देव का मुख रंग जाता है और अत्यन्त
सुन्दर लगता है। चोवा, (चंदन से तैयार किया एक सुगन्धित पदार्थ) कस्तूरी, बुक्का तथा पुष्पांजलि अर्पण करें।
अब जिससे श्रीकृष्ण शीघ्र प्राप्त होंगे उस प्रेम के बारे में श्रीहरि बता रहे हैं।
उपगायन् गृणन् नृत्यन् कर्माण्यभिनयन् मम।
मत्कथाःश्रावयञ्छृण्वन् मुहूर्त क्षणिको भवेत्॥ ४४॥
ज्ञान, ध्यान, उपासना ये सब गौण बातें हैं; देव भाव का भोक्ता। सचमुच देव भाव से ही प्राप्त होता है।
मन ध्यान से फिसल जाय तो मेरा नामस्मरण करें; अथवा आदरपूर्वक मेरे गुणों का श्रवण करें। हरि के गुणों का
अथवा हरि के यश का श्रवण करने से अंतःकरण को सुख प्राप्त होता है। उस सुख से उत्स्फूर्त हो स्वयं
हरिकीर्तन करें। बहुरुपिया की तरह स्वच्छंद होकर हरि के सभामण्डप में नाचें गायें। गोवर्धन पर्वत किस तरह
उठाया होगा इसका अभिनय स्वयं करके दिखायें और फिर आसन जमा कर राम ने शिव का धनुष किस प्रकार
तोड़ा इसका प्रदर्शन करें। पूतना का प्राणहरण, कुवलय हाथी का संहार अथवा मल्लमर्दन का प्रदर्शन कर फिर
हरिकीर्तन करें। प्रेम का आविर्भाव अद्भुत होता है। उसमें गद्य, पद्य, नामप्रबन्ध, भुजंग प्रयातादि छंद में भक्त
आनन्दपूर्वक स्तुतिगोत्र गाते हैं।
स्तवैरुच्चावचैः स्तोत्रैः पौराणैः प्राकृतैरपि।
स्तुत्वा प्रसीद भगवन्निति वन्देत दण्डवत्॥ ४५॥
मेरे स्तुतिस्तोत्र और पुराण आदरपूर्वक श्रवण करें। कोई सुनने वाला हो तो स्वयं ही कथा का निरूपण
करें। स्तोत्रपठन यदि शुद्ध पढ़ने में या ठीक तरह से गाने में कठिनाई हो तो भी प्रेम से कहने वाले को दोष नहीं
लगता। बल्कि उससे महादोष का निर्मूलन ही होता है। वेदों के उपनिषदों का पठन, अथवा ऋचामंत्रों से हरि का
स्तवन, इनमें लौकिक दृष्टि से ऊँच-नीच का भाव है किन्तु देवता को भक्तिभाव के कारण दोनों ही प्रिय हैं।
पुराणों के बड़े-बड़े स्तोत्र पढ़े या केवल नाम ले लें, अर्थ और भाव की दृष्टि से मैं उन्हें एकसमान मानता हूँ।
कोई भोला भाला व्यक्ति जिसे वेद, शास्त्र, पुराण आदि कुछ भी समझ में न आता हो, और वह प्राकृत में ही
स्तवन करे तो भी मैं श्रीकृष्ण सन्तुष्ट होता हूँ। वेद पठन करने में यदि कोई स्वर-वर्ण चूक जाता है तो पठन
करने वाले को दोष लगता है; किन्तु प्राकृत में ही श्रीहरि का स्तवन करें तो उससे दोषों का निर्दलन होता है।
शास्त्रश्रवण के लिये अथवा पुराण प्रवचन के लिये पंचमी-सप्तमी आदि विभक्तियों का ज्ञान आवश्यक होता है
किन्तु प्राकृत में नामकीर्ति यदि अशुद्ध भी गायी जाय तो भी वह भगवत्प्राप्ति करा देती है। संस्कृत भाषा यदि
भगवान ने बनायी तो क्या प्राकृत चोरों ने बनायी? इसमें केवल पक्षाभिमान की बात है। ईश्वर के काम में
अभिमान की बात नहीं होती है। चाहे वेदशास्त्र हो या पुराण हो, या प्राकृत भाषा में स्तवन हो, उसमें भक्तिभाव