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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 740, कुल 869 में से

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पृष्ठ 740

७२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
दीपक जिस प्रकार घर को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार जीवज्योति देह को प्रकाशित करती है। वही
मेरी साकार मूर्ति का हृदय में चिन्तन करती है। घृत जमने पर स्वयं रंगविहीन होने पर भी रंग, रूप, आकार
लेता है, उसी प्रकार मेरा चैतन्य ढल कर रूप में साकार हो गया है। ऐसी वह मेरी सगुण मूर्ति चिन्मात्र तेज
से हृदय को प्रकाशित करती है। वही सारे देह में समाकर मन में भक्ति उत्पन्न करती है। देह जड़, मूढ़ और
अचेतन है। उसमें चिन्मय मूर्ति प्रकट होकर अचेतन को सचेतन कर उल्हास से भजन करवाती है। हिरन का
स्वांग करने वाला जिस प्रकार हिरन के ही रूप में नाचता रहता है, उसी प्रकार भक्त के रूप में भजन पूजन
करने वाला स्वयं नारायण ही है। इस प्रकार चिन्मय-चिद्धन मूर्ति की पूजा करने से अभेद भक्ति उत्पन्न होती
है और पूज्य और पूजक यह स्मृति सहज ही धुँधली पड़ जाती है। यह भजनभेद समाप्त होते ही भक्ति का
अभेद बोध बढ़ता जाता है। यही अतिशुद्ध, प्रसिद्ध और मुझे प्रिय गुरुमार्ग है। जहाँ मेरी अभेद भक्ति रहती है,
वहाँ मैं स्वानंद प्रेम के उल्लास से पूर्णतया भक्तों के अधीन रहता हूँ। जिस प्रकार अपार वर्षा के जल को
बाँध बनाकर तालाब में एकत्र किया जाता है, उसी प्रकार अभेद भजन के योग से मुझ अनंत से ऐक्य किया
जाता है। जंगल में अतुल वर्षा होने से उत्तम फल नहीं आएगा, लेकिन वर्षा का जल तालाब में एकत्र करने
से उससे अच्छे चावल की खेती हो सकती है। उसी प्रकार मेरा अनंत अपार स्वरूप प्रेमपूर्वक अभेद भावना
के भक्तों में ही दिखाई देता है। तब ब्रह्मानन्द परमोत्कर्ष पर पहुँचता है और भक्ति अपने शिखर पर जा
पहुँचती है। अभेद भावना के भक्त के पास तीर्थ भी पवित्र होने के लिये आते हैं। देव और मानव उसके
चरणों पर गिरते हैं और मैं भगवान भी उसके पास रहता हूँ। अभेद भावना के भक्त के पास सारे तीर्थ आकर
निर्दोष हो जाते हैं। वह भक्ति का मायका है। मुझे भी उनके ही कारण सुख प्राप्त होता है। अभेद भक्ति का
ही नाम 'उत्तम भक्ति' है ऐसा श्रीकृष्ण ने अत्यन्त उल्लास से उद्धव से कहा। अभेद भक्ति के सम्बन्ध में प्रेम
से बताते समय कथा भाग एक ओर रह गया इसका उन्हें स्मरण ही नहीं रहा। भगवान निरूपण भूल गये
लेकिन उद्धव के मन पर भक्ति की पहचान अमिट हो गयी। वह भी अपने उद्धव को भूल गया और कृष्ण
भी अपने अस्तित्व को भूल गये। अभेद भजन के हर्ष से देव और भक्त एक हो गये। दोनों स्तब्ध होकर बैठ
गये और परम सुखी हो गये। उद्धव जब आत्मज्ञान से इतना अधिक पूर्ण था तो फिर उसे पूजाविधान पूजने
की क्या आवश्यकता थी? ऐसी शंका मन में होगी। तो उद्धव के मन में यह था कि यदि मैं चुपचाप बैठा
रहा तो यह निजधाम चला जायेगा। इसलिये वह प्रश्न पूछने लगा। उपासना कांड का गुप्त ज्ञान, आगमोक्त
पूजा विधान आदि वेद का अर्थ उद्धव के बहाने श्रीकृष्ण स्वयं ही बताने लगे। सचमुच, साधकों की जैसी
श्रद्धा हो, वैसी ही सिद्धि प्राप्त हो, इसलिये वेदार्थ का सारा शास्त्रविधि श्रीकृष्ण इस ग्रन्थ में प्रतिपादित कर
रहे हैं। अद्वैत भक्ति के बारे में सुनते-सुनते उद्धव मन में तृप्त हो गया। इससे श्रीकृष्ण को भी समाधान हुआ।
उसने आनन्दपूर्वक कहा, उद्धव! ध्यान से सुनो, आगे का यथोक्त पूजाविधान तुम्हें सुनाता हूँ। पूज्य और
पूजक की एकात्मता का ध्यान दृढ़ कर, उसका ही बाह्य पूजा के लिए प्रतिमा में आवाहन करें। स्वयं प्रतिमा
के सामने बैठ कर, आवाहन मुद्रा दिखाकर, मेरा सारी चित्कला उस प्रतिभा में आ गयी है ऐसी भावना करें।
उस समय मूर्ति की जड़ता का ख्याल न करें, मूर्ति चैतन्यरूप है, ऐसी ही कल्पना करें। इसी का नाम है
मुख्य 'आवाहन'। गुरु के मुख से मिला हुआ मंत्र निर्दोष होता है। इसलिये उस मंत्र से मूर्ति के सर्वांग पर,
आगमशास्त्र के अनुसार सभी न्यास धीरे-धीरे करें। इस प्रकार आवाहन, संस्थापन, संन्निधि, संनिरोधन,
संमुखीकरण, स्वायतन ये मुद्रायें करके दिखायें।