श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्ताईसवाँ अध्याय ७२९
विधान हो उसे पूरा कर उसे जल से पूरा भर लें। फिर दर्भ (कुश) के शीर्ष से उसमें का उदक लेकर सारे
होमद्रव्यों पर प्रोक्षण करें। फिर कुण्ड के प्रदीप्त अग्नि में मेरा ध्यान करें। उस ध्यान की मूर्ति का लक्षण स्वयं
श्रीकृष्ण ही बताते हैं।
तप्तजाम्बूनदप्रख्यं शङ्खचक्रगदाम्बुजैः।
लसच्चतुर्भुजं शान्तं पद्मकिञ्जल्कवाससम् ॥ ३८ ॥
स्फुरत्किरीटकटककटिसूत्रवराङ्गदम्।
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम् ॥ ३९ ॥
तप्तसुवर्ण की कांति के समान उस मूर्ति की अंग कांति है तथा अत्यन्त सुशोभित और चिन्मात्र गाभा वाली
ऐसी साकार है। हाथ में शंख, चक्र, पद्म ये अस्त्र कटि पर पीताम्बर, आभा ऐसी कि उसके आगे अग्नि की आभा
भी फीकी पड़ जाय। मुकुट, कुण्डल, मेखला अर्थात् कमरपट्टा, वक्षःस्थल पर शोभा देने वाला श्रीवत्सलांछन, पैरों
तक लटकने वाली वनमाला और गले में झलकने वाला कौस्तुभमणि, ऐसी मूर्ति का ध्यान करें।
ध्यायन्नभ्यर्च्य दारूणिहधिषाभिघृतानि च।
प्रास्याज्यभागावाधारौ दत्त्वा चोज्यप्लुतं हविः ॥ ४० ॥
इस प्रकार अग्नि में यथासांग मेरे ध्यान की कल्पना कर, उसका आवाहन और पूजन कर विधियुक्त होम
की शुरुआत करें। अग्नि का विधियुक्त आवाहन कर समिधायें घृत में भिंगो कर पहले होम में दो आज्य भाग की
आहुति दें। उसमें तिल्ली, घृत आदि होमद्रव्य लेकर घृत में भिंगोकर आगमोक्त विधि से होम करें। वह विधान
श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
जुहुयान्मूलमन्त्रेण षोडशार्चावदानतः।
धर्मादिभ्यो यथान्यायं मन्त्रैः स्विष्टकृतं बुधः ॥ ४१ ॥
देवता के मुख की ओर ध्यान देकर साधकों को अष्टाक्षरी मूलमंत्र से होम करना चाहिये अथवा पुरुषसूक्त
की सोलह ऋचायें पढ़ कर होम करने की भी विधि है। पहले बताये गये पीठार्चन में से धर्मादिक देवताओं को,
तथा अन्य देवताओं की यदि पूजा की हो तो उन्हें भी नाममंत्र से एक-एक अवदान दें। फिर साधक को
'स्विष्टकृता' का भी विधियुक्त अवदान करना चाहिये। मेरा ऐसा भजन सज्ञान भक्त जानते हैं। होम आदि की
सहायता से मूर्तिभजन की विधि से साधकों को तत्काल सिद्धि प्राप्त होती है और हे उद्धव! ऐसे भक्त ब्रह्मपद
प्राप्त करते हैं यह निश्चित रूप से जान लो।
अभ्यर्च्यथ नमस्कृत्य पार्षदेभ्यो बलिं हरेत्।
मूलमन्त्रं जपेद् ब्रह्म स्मरन् नारायणात्मकम् ॥ ४२ ॥
इस प्रकार विधियुक्त होम और पूजन कर देव को साष्टांग नमस्कार करें और फिर देव के सेवकों को बलि
अर्पण करें। इसके उपरान्त जहाँ बाह्य प्रतिमा का पूजास्थान हो वहाँ जाकर ध्यानपूर्वक मूलमंत्र का स्मरण करें।
पूज्य और पूजक से जो भिन्न नहीं है उस परात्पर नारायण को उस परब्रह्म के प्रति मन में ध्यान कर अंतःकरण से
आसन लगायें। ध्यान में जब तक मन स्थिर रहे तब तक आसन स्थिर रखें। जब वहाँ मन को शान्ति मिले तो
अगली पूजा विधि कैसी हो इसके बारे में श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।