श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 755, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअट्ठाईसवाँ अध्याय ७३९
प्रपंच प्रत्यक्ष दिखायी देता है, जिससे मन में दुविधा हो जाती है। इसलिये मेरा वेदवचन प्रपंच आत्मरूप से
अभिन्न है, ऐसा उपदेश करता है। ईख बीज में ही विद्यमान रहता है और वही ऊपर एक कांड से दूसरे कांड में
चढ़ता है, उसी प्रकार प्रपंच भी ब्रह्मा के कारण ही तद्रूप बढ़ता है। जिस प्रकार सुवर्ण के अलंकार बनाने पर वे
सुवर्ण के ही रूप में रहते हैं, उन्हें तोड़ने पर भी वे सुवर्ण के रूप में ही रहते हैं, तिल की पुतली बनाने पर भी
वह तिल के अवयवों से शोभा प्रदान करती है और तोड़ने पर भी वह तिल के ही रूप में रहती है, उसी प्रकार
प्रपंच को भी उत्पत्ति, स्थिति और लय प्राप्त होने पर भी आदि, मध्य और अन्त में यह परब्रह्म से परिपूर्ण रहता
है। यहाँ जिस चराचर का आभास होता है, वह सचमुच मैं आत्मा ही हूँ। मेरे बिना इस संसार में अणुमात्र का भी
स्थान नहीं है क्या ? इस प्रकार सृज्य और सृजित पाल्य और प्रतिपालक, संहार और संहारकर्त्ता एकात्मरूप से मैं
भगवंत ही हूँ। यहाँ उत्पत्ति, स्थिति और लय इन तीन विविध स्वरूपों से प्रपंच भले ही भिन्न दिखायी देता हो
लेकिन इन सबका आधार मैं ही हूँ। मेरे सिवा अन्य कुछ भी नहीं है। जिस प्रकार मृगजल के उदक से सूर्य कभी
नहीं भींगता, उसी प्रकार मुझ पर प्रपंच का आभास होता है, लेकिन मैं प्रपंच में नहीं रहता। त्रिविध प्रपंचों का
जाल मुझ पर अवश्य ही दिखायी देता है, लेकिन वह मिथ्या है। जिस प्रकार आकाश सुन्दर नीलवर्ण का दिखाई
देता है, लेकिन वहाँ अणुमात्र के लिये भी नील वर्ण नहीं रहता। संसार जो आँखों को साक्षात् दिखाई देता है, उसे
तुम समूल मिथ्या कैसे कहते हो ? यदि मन में ऐसी शंका आ रही हो तो उसका प्रकार भी सुनो।
इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम् ॥ ७॥
एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणम् ।
न निन्दति न च स्तौति लोके चरित सूर्यवत् ॥ ८॥
अध्यस्थ, अधिदैव तथा अधिभूत यह तीन प्रकार का संसार माया द्वारा निर्मित है। न होते हुए भी वह मुझ
में भासित होता है। लेकिन वह निश्चित रूप से त्रिगुणात्मक है, यह जान लो। उद्धव ! यह संसार मिथ्या है,
इसलिये शायद तुम उसका त्याग करोगे। लेकिन मेरे इसी भाषण से साधु-संतों को ज्ञान और विज्ञान प्राप्त हुआ
है। प्रपंच का आभास मिथ्या है यह ज्ञान का मुख्य ज्ञान है। इस ज्ञान से जो सम्पन्न होता है वही समस्त प्राणियों
के प्रति समान भाव रखता है। इसीलिये वह प्राणिमात्र के गुण-अवगुण अथवा निन्दा स्तुति की बात नहीं करता।
सूर्य की ही तरह सबसे समान भाव से व्यवहार करता है। बद्रिकाश्रम उत्तर दिशा में है और सेतुबंध-रामेश्वर
दक्षिण में है, फिर भी सूर्य सबके सामने ही है। वह उनसे कभी विन्मुख नहीं होता। पूर्व के लोगों को सूर्य
सन्मुख और पश्चिम के लोगों को विन्मुख कभी नहीं होता। उसी प्रकार मैं सर्वत्र सबके सन्मुख ही हूँ। किसी से
विन्मुख नहीं होता। अपने सामर्थ्य से अन्धकार को दूर कर प्राणिमात्र से सूर्य स्वयं होकर मिलता है, उसी प्रकार
संसार के गुणदोषों के एक ओर रखकर साधुगण संचार में विचरण करते रहते हैं। मैंने बताया हुआ यह ज्ञान का
लक्षण ही सिद्धों की पूर्णता है ताकि मुमुक्षु इस अनुसंधान को सामने रखकर सावधान होकर यह स्थिति साध
सकें। जिससे यह निजज्ञान प्राप्त हो ऐसे विषयों का साधन श्रीकृष्ण उद्धव को अपने मुख से बता रहे हैं।
प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा।
आद्यान्तवदसज्ज्ञात्वा निस्सङ्गो विचरेदिह ॥ ९॥
जो उत्पन्न होकर नष्ट होता है, वह सब मिथ्या है यह जान लें और उस पर आसक्ति त्याग कर उदास और
विरक्त होकर रहें। वंध्या के पुत्र का नामकरण कोई आनन्दपूर्वक नहीं करता; उसी प्रकार नाशवान देह के बढ़ने