श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 759, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअट्ठाईसवाँ अध्याय ७४३
को लोग 'हर्ष' कहते हैं। सारे बलवान सम्बन्धी मिलकर अपनी पसन्द की वस्तु के लिये मारपीट करने आते हैं,
जिससे मन व्याकुल होता है। इसी को 'भय' कहते हैं। अपने इष्ट काम में किसी के व्यवधान करने पर उसका
विनाश करने के लिये दौड़ना, इसे 'क्रोध' कहते हैं। करोड़ों की सम्पत्ति संग्रह में होने पर कौड़ी खर्च करने के
लिये प्राण छोड़ना यह 'कंजूस' व्यक्ति की रीति है। इसी का नाम है 'लोभ का बंधन'। कर्म क्या है और अकर्म
क्या है, हित किसमें हैं और अहित किससे है, इष्ट क्या है और अनिष्ट क्या है, इसका विचार न होना और समझ
में न आना, इसी का नाम 'मोह' है। नित्य विषय सेवन करते हुए भी मन में बार-बार विषय की प्रबल इच्छा
उत्पन्न होना, अखण्ड विषयों का ही ध्यान करना, इसका नाम 'स्पृहा' है। ये जो नानाप्रकार के गुण अथवा जन्म-
मरण हैं उनका आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह सारा भोग देहाभिमान ही भोगता है। जागृति और स्वप्न
देखने में देहाभिमान होता है। इसलिये वहाँ ये गुण दिखायी देते हैं। लेकिन सुषुप्ति में ये गुण नहीं होते। वृत्ति
जब निरभिमान रहती है उस समय जन्म-मरणादि गुण नहीं उभरते। गुणों का कारण केवल अभिमान है। वायु
पानी पर बहता है और जमीन पर भी बहा है लेकिन जल पर लहरें उठती हैं, वे जमीन पर नहीं उठतीं। अतः
लहरों का उठना यह धर्म पानी में रहता है। उसी प्रकार शोक आदि करोड़ों धर्म अहंता में होते हैं। इससे अहंकार
को ही बन्धन है। अतः उसी को मुक्ति मिले ऐसा यदि तुम कहो, तो वह अहंता जीव के साथ लगी हुई है। जिसे
अंत्यज से छूत लगती है, उसे गंगास्नान से शुद्धि मिलती है, लेकिन वही गंगा स्नान अंत्यज की शुद्धि के लिये
व्यर्थ है। उसी प्रकार अहंता जीव के साथ जुड़ी हुई है, उसे छोड़ देने पर उसे मुक्ति है। लेकिन अहंकार को
मुक्ति कल्पांत में भी सम्भव नहीं है।
देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः।
सूत्रं महानित्युरुधेव गीतः संसार आधावति कालतन्त्रः॥ १६॥
आत्मा अनंत, अपार, ज्ञानमय, मायातीत और सम्पूर्ण है। वही माया का अधिष्ठान बनता है, इसीलिये उसे
'अंतरात्मा' कहते हैं। माया को व्याप कर भी वह अपार है। इसीलिये उसे परमेश्वर कहते हैं। वही माया का
नियंता है इसलिये उसे 'ईश्वर' कहते हैं। 'अविद्या' में प्रतिबिम्बित हुआ है इसलिये उसे 'जीव' कहते हैं और
वही देह की लगन से प्रबल होकर 'अहंकार' बन गया। वही 'संकल्प', 'विकल्प' इन विकारों के संसर्ग से
'मन' बन कर विद्यमान है और उस मन के गमन के लिये वह इन्द्रिय भी वही बन गया है। उन इन्द्रियों को
आधार, सुख-दुःख भोगों का समुदाय, पाप-पुण्य का चमत्कार इस प्रकार 'देह' का आकार भी वही बन गया है
और उस देह का कारण जो सत्त्व, रज और तम गुण हैं, वे भी वह स्वयं ही हो गया है। गुणक्षोभ का मुख्य मर्म
'पंचविषय', विषय भोग आदि क्रिया कर्म और 'स्वधर्म' भी वह स्वयं ही बन गया है। तीनों गुणों के जन्म का
कारण जो यह 'महत्तत्त्व' अथवा 'प्रधान सूत्र' है वह भी वह स्वयं ही हो गया है। इस प्रकार सारा संसार ईश्वर
स्वयं ही बन गया है। उसी संसार को आश्रयभूत ऐसी गुणसाम्यरूप प्रकृति वही बना हुआ है। उसी प्रकार
उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने वाली क्षोभक शक्ति तो 'काल' है वह भी वह स्वयं ही बन गया है। वह काल
अपने सत्ता सामर्थ्य से जीव की अथवा संसार की उत्पत्ति करता है, पालन करता है और अन्त में संहार करता
है। ऐसी आवृत्ति वह कितनी बार करता है, इसका पता नहीं है। इससे ज्ञात होता है कि परब्रह्म की स्फूर्ति ही
संसार है। उसी को लीला शक्ति से साकार स्थिति प्राप्त हुई है। मैं विश्वेश्वर होते हुए विश्वस्वरूप हूँ। नानापदार्थ
मैं ही हूँ। इसलिये जो भी पदार्थ दिखाई देता है वह आत्मा का ही स्वरूप है। मुझसे अलग कोई पदार्थ नहीं है,