श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 757, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंजगह है। वह यदि आत्मा से मिलता है तो आत्मा उसे तत्काल जला कर भस्म कर देगा। कर्पूर यदि अग्नि में
एकरूप आठों पहर रह सके तो देह और आत्मा एकरूप होकर देह भी संसार बन्धन में रह सकता था। काष्ठ में
अग्नि रहता है लेकिन वह काष्ठ बनकर नहीं रहता। उसका घर्षण कर मूलतेज से बाहर निकालने पर वह
लकड़ी को जलाकर भस्म कर देता है। उसी प्रकार आत्मा देह में रहता है लेकिन वह देहरूप नहीं रहता। वह
चिद्रूप से ज्ञानस्वरूप से देह का प्रकाशक है, उसे संसार बन्धन की बाधा नहीं होती। आप कहेंगे कि यदि आत्मा
की संगति से देह जल जायेंगे, तो फिर प्राणी जीवित कैसे रहते हैं? वह भी सुनो। रूपहले परदे पर दीपक के
प्रकाश की सहायता से कागज की पुतलियाँ नाचती रहती हैं लेकिन यदि उन्हें दीपक से लगा दिया जाय तो वह
उन्हें जला देगा। उसी प्रकार आत्मा की सत्ता शक्ति से प्राणि अपने प्रारब्ध के अनुसार व्यवहार करते रहते हैं;
लेकिन वही आत्मा स्वयंभू स्वस्वरूप में स्थिर हो जाने पर आत्मा का अनुसंधान करने पर संसार का भान नहीं
रहता फिर भिन्न-भिन्न आकार के बद्ध जीव कैसे रहेंगे? इस प्रकार देखने पर संसार बन्धन मुझे मिथ्या ही लगता
है। संसार बन्धन के लिये निश्चित स्थान कोई नहीं है। आत्मा में और देह दोनों में कोई भवबंध नहीं है, इसलिये
वह मिथ्या है, उसे कहीं कोई ठिकाना नहीं है। श्रीकृष्ण ! तुम नाराज न हो। मेरा निश्चय है कि संसारबन्धन
सचमुच ही मिथ्या है। उद्धव का यह भाषण सुनकर श्रीकृष्ण के आनन्द में उफान आ गया। उन्होंने मन ही मन
कहा, मेरा उद्धव अब ज्ञानी हो गया, उसे निजात्म की पहचान हो गयी। भवबन्धन सचमुच मिथ्या है, यह उद्धव
का भाषण सुनकर श्रीकृष्ण परमानंद से डोलने लगे और उद्धव पर प्राण न्योछावर करने की उन्हें इच्छा हुई।
आत्मा को भवबन्धन नहीं है, देह में भी वह नहीं दिखायी देता, यह विचार जिनकी समझ में नहीं आता उन्हीं
को भवबन्धन है, ऐसा श्रीकृष्ण बताते हैं।
श्रीभगवानुवाच
यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः संनिकर्षणम्।
संसारः फलवास्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः ॥१२॥
जो वर्णाश्रम से परे है, जो बंधमोक्ष से अलिप्त है, जो देहद्वंद्व को स्पर्श न करने वाला है, वह श्रीहरि उद्धव
के हित की बात करने लगा। मैं स्थूल, मैं कृश, मैं गोरा, मैं काला, ये देह के 'देहधर्म' हैं और मैं काना, मैं गूँगा,
मैं बहरा, ये इन्द्रियों के इन्द्रियधर्म हैं। क्षुधा, तृषा आदि 'प्राणधर्म' हैं। काम, क्रोध, लोभ आदि जो संभ्रम हैं वह
मन का 'मनोधर्म' है। सत्वगुण से जागृति, रजोगुण से स्वप्नस्फूर्ति और तमोगुण से जड़ता और सुषुप्ति, ये
वास्तव में देह के योग से होते हैं। देह को मारण आने पर 'मैं मेरा' कहता है और देह का जन्म होने पर 'मैं
जनमा' समझता है। इन्द्रिय विषय सेवन करते रहते हैं फिर भी मैं स्वयं उसका सेवन कर रहा हूँ, ऐसा मानता है;
स्वर्ग-नरक के भोग देहात्मता के कारण ही सच मालूम होते हैं। प्राण अन्न की इच्छा करता है, उसे खाता है
अग्नि; लेकिन वह स्वयं चिदात्मा उसका साक्षी होते हुए, वह अन्न मैंने ही खाया ऐसा समझता है। ये सारे धर्म
'मेरे ही हैं' ऐसा जब तक आत्मा को पक्का भ्रम है, तब तक वह मिथ्या ही रहने वाला अत्यन्त दुर्गम और विषम
संसार का भ्रमवश भोग करता रहता है। उस भोग का फल अत्यन्त कठिन है अविराम जन्म-मरण, स्वर्ग-नरक,
पाप-पुण्य, यह सब वह भ्रम के कारण सच ही मानता है। संसार तो वास्तव में निर्मूल है; लेकिन वह भ्रम के
फल से सदा फलता-फूलता है। अविवेकी लोग उसे अत्यन्त प्रबल समझते हैं और वह निरन्तर फलता-फूलता
है। जिसका सचमुच कोई अर्थ नहीं है, उसे 'अनर्थ' कहते हैं। उस अनर्थ का फलभोग भी वही भोगते हैं जो