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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 751, कुल 869 में से

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पृष्ठ 751

अठ्ठाईसवाँ अध्याय
हे परम सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। हे सद्गुरु पुरुषोत्तम ! तुम्हारी जय हो। हे सद्गुरु परब्रह्म ! तुम्हारी जय हो।
ब्रह्मा को 'ब्रह्म' यह नाम तुम्हारे ही कारण प्राप्त हुआ है। हे चित्तैक्य स्वरूपी सद्गुरु। तुम्हारी जय हो। इन साकार
और निराकार पदार्थों में चिद्रूप से तुम ही भरे हुए हो। हे सद्गुरु सत्क्षेत्र ! तुम्हारी जय हो। सद्गुरु सत्पात्र ! तुम्हारी
जय हो। हे स्वानंदपूर्ण सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। हे स्वानंदघन सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। आनन्द को मधुरता
तुम्हारी ही कारण आयी है। हे देव-अग्रणी सद्गुरु। तुम्हारी जय हो। हे देवशिरोमणि ! तुम्हारी जय हो। हे देवश्रेष्ठ
गुरुराया ! सारे देवता तुम्हारे चरणों को प्रणाम करते हैं। हे जीवादिजीव तुम्हारी जय हो। हे शिवादिशिव ! तुम्हारी
जय हो। हे देवादिदेव तुम्हारी जय हो। हे अभिनव गुरुराया ! तुम्हारी जय हो। हे सद्गुरु सुखसम्पन्न ! तुम्हारी जय
हो। हे सद्गुरु सुखनिधान तुम्हारी जय हो। हे सुखैकघना सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। सुख को सुख भी तुम्हारे ही
कारण प्राप्त हुआ है। तुम्हारे ही कारण आनन्द को निजानंद प्राप्त होता है; तुम्हारे ही कारण बोध को निजबोध का
लाभ होता है; तुम्हारे ही कारण ब्रह्म को ब्रह्मत्व प्राप्त होता है। तुम्हारे जैसे समर्थ एक तुम ही हो। ऐसे श्रीगुरु तुम
अनंत हो। तुम्हारे स्वरूप का अंत नहीं है। तुम कृपालु होकर अपने भक्तों को निजात्म स्वरूप से ज्ञान प्रदान करते
हो। अपने निजरूप का बोध करा कर देव-भक्त का भाव नहीं रहने देते हो। उस पर पुनः पूर्ण अद्वैतभाव से
आत्मभजन कराते हो। गंगा समुद्र में मिलने पर भी उस पर चमकती रहती है, उसी प्रकार भक्त तुम्हारे साथ मिल
जाने पर भी तुम्हारे ही कारण तुम्हारा भजन करते हैं। अद्वैतभाव से तुम्हारी भक्ति करने से तुम्हें परमसंतोष होता है
और प्रसन्न होने पर तुम शिष्य के हाथों आत्मसम्पत्ति अर्पण करते हो। शिष्य को निजात्मस्वरूप का दान देकर उसे
महान बनाते हो, यह तुम्हारा अद्भुत चमत्कार है। यह अतर्क्य विचार अंतहीन है। जो वेदशास्त्रों की समझ में
नहीं आता; जिसके लिये वेद रातदिन विवाद कर रहे हैं वह आत्मज्ञान तुम तच्छिष्य को एक क्षण में करा देते हो।
करोड़ों वेद एवं वेदान्त का पठन करने पर भी तुम्हारे आत्मोपदेश की शैली किसी को नहीं आ सकती। अदृष्ट
वस्तु ध्यान में आना सम्भव नहीं है। अनेक लोग जानने का दम भरते हैं। अनेक प्रकार की युक्तियाँ करते हैं
लेकिन उनकी बकवास तोता रटंत जैसी होती है। इसलिये तुम्हारी बोध कराने वाली शक्ति सबकी समझ में आने
लायक नहीं है। तुम्हारी कृपा युक्ति का लाभ होने पर ही दुर्गम सरल हो जाता है। श्रीभागवत अगम्य है, तिस पर
एकादश स्कंध का अर्थ अत्यन्त गहन है लेकिन तुम सद्गुरु और कृपालु होने के कारण तुमने मुझसे उसका अर्थ
प्राकृत में करवाया। माँ जिस प्रकार दही को मथ कर उसका मक्खन निकाल कर बालक को देती है, उसी प्रकार
जनार्दन ने यहाँ किया है। वेदशास्त्रों का मंथन कर व्यासजी ने भागवत निकाला; उस भागवत का मतितार्थ यह
ग्यारहवाँ स्कंध है, ऐसा समझो। उस एकादश स्कंध का माधुर्य स्वयं मेरी समझ में नहीं आया इसलिये जनार्दन ने
उसका मंथन कर उसका सारतत्त्व मुझे निकाल कर दिया। उसे सहज ही मुख में डाला तो उस एकादश की माधुरी
मेरी समझ में आयी। उसी माधुर्य की चाह से यह टीका तैयार हो रही है। इसलिये एकादश स्कंध पर की यह
टीका अकेले एक एकनाथ से नहीं बल्कि एक से एक मिलकर बाहर आ रही है। एक पीछे और एक आगे यही
एकादश का अर्थात् ग्यारह का स्वरूप है। जनार्दन ने अपना एकपन एका (एकनाथ) में (अद्वैत में) दृढ़ किया।
वही एकादश स्कंध के अर्थ में आया है। एका (एकनाथ) में एकत्व घुलमिल गया। भोजन में जिस प्रकार
मिष्ठान्न का ग्रास होता है, उसी प्रकार भागवत में यह एकादश स्कंध है। उसमें भी अठ्ठाईसवाँ अध्याय अत्यन्त