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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 756, कुल 869 में से

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पृष्ठ 756

७४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
से मूर्खों का ही मन आनन्दित होता है। उत्पत्ति और विनाश का लक्षण भगवान उदाहरण देकर बताते हैं।
प्राणिमात्र का जन्ममरण हम नित्य आपकी आँखों से देखते हैं। अनुमान करके देखें तो भी गेरू पर्वत, पृथ्वी
आदि जो भी साकार दिखाई देता है वह सब प्रलय के अंत में नष्ट होने ही वाला है। वेदोक्ति भी यही बताती है
कि अष्टधा पृथ्वी भी नाशवान है। जीवभावना भी अन्त में विनष्ट होती है, ऐसा श्रुति भी जोर-शोर से कहती है।
साथ ही जो भी जड़ और विकारी है वह सब नष्ट होता है यह अनुभव हमें भी है। इससे यह भी अपने आप ही
मालूम होता है कि संसार 'नश्वर' ही है। पिता को मरा हुआ देखते हैं और पुत्र-पौत्र उनके सारे संस्कार करते
हैं। फिर भी अपनी मृत्यु की चिन्ता नहीं करते। देह की आसक्ति के कारण ऐसा भ्रम हो जाता है। पुत्र पितरों को
पिण्डदान देते हैं और उन्हें सद्गति प्राप्त हो, ऐसा कामना करते हैं किन्तु अपनी गति का विचार नहीं करते। देह
के लोभ के कारण नश्वर की इतनी आसक्ति रहती है। आत्मा केवल प्रकाशमय है और प्रपंच जड़, मूढ़ और
अज्ञान है। यह सुनकर उद्धव भगवान से प्रश्न करता है।
उद्धव उवाच
नैवात्मानो न देहस्य संसृतिर्द्रष्टृदृश्ययोः ।
अनात्मस्वदृशोरीश कस्य स्यादुपलभ्यते ॥ १०॥
आत्मा नित्यमुक्त है तथा ज्ञानस्वरूप है। उसे संसार का बन्धन आवश्यक नहीं है। देह जड़, मूढ़ और
अज्ञान है। उसे भी संसार की आवश्यकता नहीं होती। अतः हे श्रीकृष्ण! फिर संसार का बन्धन किसे बाधक
होता है? तुम कहते हो संसार है ही नहीं, लेकिन वह तो प्रत्यक्ष दिखायी देता है। आत्मा का विचार करने पर
संसार बन्धन को कोई स्थान ही नहीं है, इसी अर्थ का निरूपण उद्धव स्वयं ही करते हैं।
आत्मव्यायोऽगुणः शुद्धः स्वयंज्योतिरनावृतः ।
अग्निवद् दारुवच्चिद् देहः कस्येह संसृतिः ॥ ११॥
आत्मा नित्यमुक्त होते हुए चित्स्वरूप है। उसे गुण अथवा निर्गुण बिलकुल स्पर्श नहीं करते। उसके पास
कर्माकर्म अथवा पाप पुण्य के लिये कोई स्थान नहीं है। परादि वाणी से उसका उच्चार नहीं होता, इसलिये उसे
'परात्पर' कहते हैं। प्रकृति गुणों से उस पर विकार का प्रभाव नहीं होता क्योंकि परमात्मा प्रकृति से परे है।
जिसके प्रकाश की दीप्ति से सूर्य, चन्द्र आदि प्रकाशित होते हैं, जिसके प्रकाश से त्रिभुवन प्रकाशित होता है,
ऐसा वह परमात्मा तेजोमूर्ति है। ऐसे आत्मा को संसार बन्धन नहीं हो सकता। यदि मृगजल के कुण्ड में सूर्य डूबे
तभी आत्मा को बन्धन होगा। जुगनू के प्रकाश से यदि सूर्य जले, बगुले के भय से यदि काल पलायित हो, चींटी
के पर से यदि सारा आकाश उड़ जाय, वायु यदि लड़खड़ा कर कुएँ में गिर पड़े, गड्ढे के पानी में यदि मेरू डूब
जाय तो भी हे गोविन्द! आत्मा को संसार बन्धन कभी नहीं होगा। उसी प्रकार देह के लिये संसार बन्धन है ऐसा
कोई मूर्ख भी नहीं कहेगा क्योंकि देह जड़, मूढ़ और अज्ञान होने के कारण उसे संसार बन्धन की बाधा कभी
नहीं होगी। हाँ, यदि पत्थर के पेट में दर्द होने लगे, सूखी लकड़ी भूख के मारे तड़पना शुरू करे तो अवश्य ही
देह को संसारबन्धन होगा। पर्वत अगर हिलने लगे, मृत्तिका यदि स्नान करने के लिये व्याकुल हो जाय, कोयले
से यदि अन्धकार काला हो जाय, तो संसारबन्धन की बाधा देह को होगी। अब आप यह कहेंगे कि देह और
आत्मा की संगति से संसार बन्धन होता है, तो विचार करने से मालूम होता है कि बात ऐसी नहीं है। क्यों नहीं
है, वह भी सुनो कृष्ण! आत्मा यह स्वयंप्रकाश बड़ा अग्नि ही है और देह जड़ और मूढ़ होने के कारण काष्ठ की