श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इसलिये जहाँ भक्तों की भावना रहती है, वहाँ सहज ही मैं देव प्रकट हो जाता हूँ। सारांश, भक्तों को भावार्थ मुझे
अत्यन्त प्रिय लगता है, उसके आगे मुझे वैकुण्ठ अथवा क्षीराब्धी भी अच्छा नहीं लगता। भक्तों के भावार्थ का
अलंकार धारण करने के लिये मुझ निर्गुण श्रीकृष्ण को सगुण रूप लेना पड़ता है। यह सब भक्तों के भावार्थ के
लिये। इसीलिये मैं अजन्मा होते हुए जन्म लेता हूँ, अकर्मा होते हुए भी कर्म करता हूँ, अनामा होते हुए भी भक्तों
को मनोधर्म से प्रसन्न करने के लिये नाम धारण करता हूँ। निर्गुण के प्रति मन रमने पर वह चैतन्यरूप हो जाता है
और सगुण स्वरूप में मन लीन हो जाने पर साधक स्वयं ही श्रीकृष्णरूप हो जाते हैं। निर्गुण का ज्ञान होना
अत्यन्त कठिन है, इसीलिये यह उपासना की योजना की गयी है। सगुण मूर्ति की भावना मन में रखकर साधना
करने से साधक अनायास तर जाते हैं। यह उपासना विधि का आगमोक्त विधान था। इससे साधकों को भोग और
मोक्ष दोनों साध्य होते हैं और मैं कृपानिधि सन्तुष्ट होता हूँ। अब आवरण पूजा का विधि बताता हूँ।
सुदर्शनं पाञ्चजन्यं गदासीषुधनुर्हलान्।
मुसलं कौस्तुभं मालां श्रीवत्सं चानुपूजयेत् ॥ २७॥
अण्वी-जीवकला को देहावरण, सिंहासन पर शक्ति का आवरण और सुदर्शनादि अस्त्रों के बारे में श्रीकृष्ण
स्वयं ही बता रहे हैं। लपलपाता हुआ तेज धार का 'सुदर्शन'; शोभायमान 'पांचजन्य', शंख, 'नंदक' नाम का
खड्ग और 'कौमोदकी' नामक प्रचण्ड गदा अत्यन्त मजबूत 'शार्ङ्ग' नामक धनुष्य; सुवर्णमय पंख के सरल बाण;
'हल' और 'मूसल' इन प्रबल अस्त्रों की पूजा करें। सशस्त्र सरल आठ हाथ, गले में कौस्तुभ मणि और
वनमाला; कटि के नीचे परिधान किया पीला पीताम्बर, ऐसी मेघ जैसी श्यामवर्ण सुन्दर मूर्ति की कल्पना करें।
साक्षात् लक्ष्मी का पति लेकिन ब्राह्मण ने मारी हुई लात अलंकार के रूप में हृदय पर अंकित करने वाला ब्राह्मण
भक्त देव उस श्रीवत्स चिह्न से विलक्षण शोभा प्रदान करता है। उस वत्स की पूजा करें। चिद्रत्नों के अलंकार में
से गुण बाहर निकाल कर अत्यन्त कुशलतासे पिरोयी हुई वैजयन्ती माला भी हृदय पर लहरा रही है। इस प्रकार
सालंकार और सायुध; शंख, चक्र, पद्मादि के साथ अद्भुत दीखने वाला स्वयंबोध (स्वयंप्रकाश) भगवान जिसके
पास नारदादि सदा उपस्थित रहते हैं। इस प्रकार अलंकारों के साथ पूज्य जो श्रीहरि हैं उसकी पूजा कर फिर
उसके परिवार की पूजा करें। वह पार्षद भी तुम्हें विस्तार से बताता हूँ।
नन्दं सुनन्दं गरुडं प्रचण्डं चण्डमेव च।
महाबलं बलं चैव कुमुदं कुमुदेक्षणम् ॥ २८ ॥
नंद और सुनंद ये सदा देव के पास रहते हैं। गरुड़ तो सदा आँख के सामने खड़ा ही रहता है। चण्ड और
प्रचण्ड ये दोनों ओर रात-दिन खड़े रहते हैं। बल और महाबल ये नेत्र संकेत से ही किसी भी आशा का पालन
करने के लिये तत्पर रहते हैं. और कुमुद और कुमुदाक्ष ये दोनों महाबलि पीछे खड़े रहते हैं। गरुड़ आँखों के
सामने ही खड़ा रहता है; और शेष नंदादिक आठ असामी आठ दिशाओं की ओर रहते हैं। इस प्रकार श्रीहरि के
सान्निध्य में रहने वाला पार्षदावरण है।
दुर्गां विनायकं व्यासं विष्वक्सेनं गुरून् सुरान्।
स्वे स्वे स्थाने त्वभिमुखान् पूजयेत् प्रोक्षणादिभिः ॥ २९ ॥
इसके अतिरिक्त दुर्गा, विनायक, व्यास और विष्वक्सेन को चार कोनों में स्थापित कर, देवताओं के साथ ही
उनका भी पूजन करें। मूल मूर्ति से एकरूप रहने वाले गुरु और परम गुरु का परमेष्ठी गुरु से ऐक्य स्थापित कर