श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
गुडपायससर्पींषि शष्कुल्यापूपमोदकान्।
संयावदधिसूपांश्च नैवेद्यं सति कल्पयेत् ॥ ३४ ॥
धूप, दीप, नीरांजन आदि दिखाने के बाद देवता को भोजन अर्पण करें। उनमें नाना प्रकार के पकवान तथा
षड्रसयुक्त भोजन हो। सादे और शर्करायुक्त पराठे, गुजिया, अमृत फल, रबड़ी, दूध औटा कर उसमें बनायी हुई
खीर, विभिन्न प्रकार के बड़े, तिल्ली के तथा बेसन के लड्डू, खट्टे पकौड़े आदि पदार्थ भगवान को परोसें। दूसरी
पंक्ति में सब्जियाँ हों, बीच में पतले और मुलायम चावल का भात हो, उस पर मूँग की दाल तथा घर में तैयार
किया हुआ सुगन्धित घृत हो। गुड और केसर मिलाकर तैयार किया हुआ हलुआ हो, उसी प्रकार छाछ की कढ़ी
हो, आमरस से भरी हुई कटोरी हो जिसे देखकर इन्द्र की भी लार टपकने लगे। नैवेद्य में दही, दूध, मलाई,
शक्कर आदि पदार्थ रखें। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि देवता उपचारों की ओर ध्यान नहीं देते। वे श्रद्धा से
ही तृप्त हो जाते हैं। यदि सामर्थ्य हो तो इतने पदार्थ रोज तैयार कर देवता को नैवेद्य अर्पण करें। अन्यथा किसी
विशेष पर्व पर अर्पण करें। सचमुच, जो अपनी उपास्य मूर्ति हो उसके जयन्ती अथवा विशेष पर्व पर अर्पण करने
का पूजोपचार श्रीहरि बता रहे हैं।
अभ्यङ्गोन्मर्दनादर्शदन्तधावाभिषेचनम्।
अन्नाद्यं गीतनृत्यादि पर्वणि स्युरुतान्वहम्॥ ३५ ॥
आगमशास्त्र में बताये गये पर्व अथवा अन्य वार्षिक पर्व आते हैं, अथवा अपनी उपास्य मूर्ति की जयन्ती
आती है उस दिन की पूजा श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं। दंतधावन, उद्वर्तन, अभ्यंजन मूर्ति को देकर पंचामृत से स्नान
करायें और नाना प्रकार के आभूषणों के साथ उसकी पूजा करें। इसके उपरान्त उसे षड्रस अन्न का नैवेद्य अर्पण
करें। फिर हाथ धोने के लिये सुगन्धित उदक देकर मुखशुद्धि के लिये ताम्बूल अर्पण करें। देव को अपने देवत्व
का विस्मरण हो गया था। वह देवत्व अब उसे प्राप्त हो गया, इस भावना से देवता को दर्पण दिखायें। इससे
भगवान को सन्तोष प्राप्त होता है। विशेष पर्व के दिन अथवा जयंती के दिवस पर संत वैष्णवों को एकत्र कर,
प्रेमपूर्वक रात-दिन गीत, नृत्य और कीर्तन का आयोजन करें। उसी प्रकार शास्त्रों के अनुसार दीक्षा लेकर हवन
करने से भी देवता तत्काल प्रसन्न होता है। उद्धव ! उस होम का विधिविधान भी अच्छी तरह ध्यान देकर सुनो।
विधिना विहिते कुण्डे मेखलागर्तवेदिभिः।
अग्निमाधाय परितः समूहेत् पाणिनोदितम् ॥ ३६ ॥
परिस्तीर्याथ पर्युक्षेदन्वाधाय यथाविधि।
प्रोक्षण्याऽऽसाद्य द्रव्याणि प्रोक्ष्याग्नौ भावयेत माम्॥ ३७॥
कुण्ड का विधान अर्थात् आगमशास्त्र में वर्णित उसकी लम्बाई, चौड़ाई, गहराई तथा कोनों का प्रमाण
लेकर ऊँचाई भी ठीक तरह से नाप लें तथा कुण्ड तैयार करें। अपनी शाखा के वेद में वर्णित मेखला के साथ गर्त
को साधकर योनि के साथ यथोक्त लक्षण की वेदी तैयार करें। उस पर अग्न्याधान कर जो अग्नि तैयार किया गया
हो, उसका करस्पर्श कर परिसमूहन करें। दर्भ से परिस्तरण करें और तदुपरान्त परिसमूहन करें। दर्भ से परिस्तरण
करें और तदुपरान्त पर्युक्षण करें। इध्माबर्ह का विसर्जन कर उस पर त्रिसंधान रखें। बर्ही का आस्तरण कर उस पर
घृत का बर्तन रखें। व्याहर्तीं से समिधाओं का होम करने की क्रिया को 'अन्वाधान' कहते हैं। प्रोक्षणीपात्र का जो