श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
७०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जिसकी आसक्ति होती है वे कीड़ों की ही तरह हैं। इस प्रकार विचार करें तो स्त्रियों का देह अत्यन्त गन्दा है।
उसे वस्त्रालंकार से सुशोभित कर पुरुष उस पर आसक्त होते हैं। बहेलिया जाल लगाकर हिरनों को पकड़ता है
लेकिन पुरुष स्त्रियों का श्रृंगार कर स्वयं ही उस जाल में फँसता है। इसलिये विरक्तों को स्त्री की संगत कभी
नहीं करनी चाहिये, गृहस्थाश्रमियों को भी उसकी आसक्ति छोड़नी चाहिये। इसके सम्बन्ध में राजा बता रहे हैं।
अथापि नोपसज्जेत स्त्रीषु स्त्रैणेषु चार्थवित्।
विषयेन्द्रियसंयोगान्मनः क्षुभ्यति नान्यथा ॥ २२॥
स्त्रियों का यह देह यदि वास्तव में सुन्दर होता, तो वस्त्रालंकार के बिना भी सुन्दर लगता। लेकिन वह
अत्यन्त निंद्य और गन्दा होने के कारण वस्त्रों के बिना बिलकुल अच्छा नहीं लगता इसीलिये स्त्रियाँ अपना देह
वस्त्रालंकारों में लपेटती हैं। जिस प्रकार धोखेबाज ब्राह्मण का स्वांग बनाकर विश्वास जता कर घात करते हैं,
उसी प्रकार यह स्त्रियों की संगत है। स्त्रियों की संगत नाना प्रकार के तरीकों से दास्यत्व कराती है और अन्त में
अपने साथ नरक ले जाती है। इसलिये विरक्तों को उधर नहीं जाना चाहिये। यदि स्त्री विरक्त हो तो भी साधक
को उसकी संगत नहीं करनी चाहिये। अग्नि के संग से जिस प्रकार घी पिघलता है, उसी प्रकार स्त्री की संगत से
भी वृत्तियों में विकार उत्पन्न होता है। अमृत के स्थान पर विष खा लेने से मृत्यु अवश्यंभावी है, उसी प्रकार स्त्री
सात्त्विक है यह जानकर सेवन करने पर भी वह दुःख ही देती है। यदि अग्नि में घृत बहुत समय तक रह पाता
तो स्त्री की संगत से भी पारमार्थिक लोग आत्मस्वरूप प्राप्त करते। घृत समाप्त होकर यदि साठ वर्ष भी हो गये
हों तो भी अग्नि के संगत से घृत की गागर द्रवित हो उठती है। उसी प्रकार स्त्रियों के सहवास से वृद्धावस्था में
भी काम विकार प्रबल होता है। कपूर अगर अग्नि में बिना जले रह गया होता तो स्त्री की संगत से सबको
परब्रह्म का लाभ हुआ होता। अग्नि हाथ में लेते ही, वह जलाता है वैसी ही स्त्रियों की संगत है। उसकी संगति
से आसक्ति बढ़ती है और वह पुरुष को अनर्थ में डालती है। स्त्री से भी ज्यादा यदि स्त्रैण की संगति मिले तो वह
करोड़ों अनर्थ का मूल है। उसकी संगति से अधःपतन ही होगा। स्त्रीलंपट पुरुष से यदि भेंट हो जाय तो वह
सारा ब्रह्मानन्द स्त्री सुख में ही है, ऐसा आदेश विरक्त को देता है। इससे तत्काल स्त्री कामना उत्पन्न होती है।
फिर वह स्वदारा और परदारा का विचार ही नहीं करने देती और स्वेच्छाचार की ओर प्रवृत्ति मुड़ती है। इसलिये
स्त्रैण ही वास्तव में घातकी है। स्त्रैण जहाँ प्रवेश करता है, वहाँ अनाचार की बेल बढ़ी ही समझिये। अधर्म सर्वांग
से फलता-फूलता है और वह बाधक बनकर अनर्थ के फल देता है। इसलिये जिसे परमार्थ साधना हो उसे स्त्री
की अथवा स्त्रैण की संगत कभी नहीं करनी चाहिये क्योंकि उनकी संगत अनर्थ में डालती है। लेकिन यदि स्त्रैण
को ही वर्जित कर दिया जाय तो फिर स्त्रीसंग रह ही कहाँ जाता है ? सारांश यह संगत ही परमार्थ के लिये
उपयोगी नहीं है। इसलिये साधक को स्त्रियों की ओर नहीं देखना चाहिये और बातें तो नहीं ही करनी चाहिये
और एकान्त में भी कभी नहीं बैठना चाहिये। अब आप यह कहेंगे कि जो विचारी है उसे स्त्रीसंगति क्या करेगी ?
तो भाई ! इस स्त्री की संगत के पीछे बड़े-बड़े ज्ञाताओं ने भी आघात सहे हैं। पराशर ऋषि को नाव में क्षणभर के
लिये नाविक की कन्या मिली, लेकिन उतने ही क्षणों के लिये उन पर अपयश का आघात हुआ। ऋष्यशृंग बहुत
बड़ा तपस्वी था किन्तु वह भी वेश्या के वश में हो गया, औरों की क्या बात करें ? साक्षात महादेव पर भी
मोहिनी ने मोहिनी डाली। विषय और इन्द्रियों की संगत से चित्तवृत्ति निश्चित रूप से क्षुब्ध होती है। सज्ञान भी
जब उनमें बँध जाते हैं तो अज्ञानों की क्या कथा ? लेकिन, स्त्रियों की प्रत्यक्ष संगत न होते हुए भी स्त्री के स्मरण
मात्र से भी काम विकार उत्पन्न होता है। इसी का स्पष्टीकरण राजा कर रहे हैं।
छब्बीसवाँ अध्याय ७०५
अदृष्टादश्रुताद् भावान्न भाव उपजायते।
असम्प्रयुञ्जत: प्राणान् शाम्यति स्तिमितं मन: ॥ २३ ॥
जिसे न कभी देखा है न सुना है, ऐसे विषय से पुरुष का मन कभी क्षुब्ध नहीं होता। लेकिन पहले के भोगे
हुए जो विषय हैं, उनका स्मरण मन में होते ही स्त्री की संगत न होने पर भी वृत्ति का क्षोभ होता है। इस प्रकार
पहले से चली आ रही विषयासक्ति ही पुरुष को निश्चित रूप से बाधक होती है। वह एकान्त में अकेला ही बैठा
हो, लेकिन वासना के संस्कार से उसकी वृत्ति सकाम होकर क्षुब्ध होती है। पिछली रात के पकवान ढँककर रखे
रहते हैं, वे दूसरे दिन सुबह बिना पकाये खाये जा सकते हैं। उसी प्रकार वासना में स्थित काम ही पुरुष को
सकाम कर देता है। उस काम का क्षोभ होने पर कर्म और अकर्म का स्मरण नहीं हो पाता। सारांश, वासना-
कामसंगति यही परमार्थ में साधक होते हैं। इसलिये सभी साधकों को स्त्री विषय की आसक्ति छोड़ देनी चाहिये।
मन में यदि कामासक्ति क्षुब्ध हो जाय तो साधकों को एक उपाय करना चाहिये। उन्हें बाह्य इन्द्रियवृत्ति पर
नियंत्रण रखना चाहिये, ताकि धीरे-धीरे मन को शान्ति प्राप्त हो। कर्मेन्द्रियों को दृढ़ वैराग्य से वश में रखने से,
मन में काम कितना ही क्षुब्ध क्यों न हो जाय लेकिन वह अपने आप ही शान्त हो जाता है। जिससे अनर्थ हो
जाता है। वह संगत ही छोड़ देनी चाहिये। वह संगत्याग कैसे किया जाय उसका स्पष्टीकरण राजा श्लोकार्थ में
कर रहे हैं।
तस्मात्सङ्गो न कर्तव्यः स्त्रीषु स्त्रैणेषु चेन्द्रियैः।
विदुषां चात्यविश्रब्धः षड्वर्गः किमु मादृशाम् ॥ २४ ॥
जो ज्ञानियों को भी चक्कर में डालता है, कामी पुरुष को तत्काल अपने वश में कर लेता है, ऐसा यह
स्त्रीसंग अनर्थकारी है और स्त्रैण पुरुषों के लिये तो और भी अधिक अनर्थकारी है। इसलिये जो अपना सच्चा
हित साधने के इच्छुक हों ऐसे परमार्थी लोग कर्मेन्द्रियों को स्त्री और स्त्रैण की संगत न होने दें। मन विषयों में
भले ही क्षुब्ध हो जाय फिर भी हमें अपने इन्द्रियों को काबू में रखना चाहिये। जिससे मन का विषय अपने आप
ही समाप्त हो जाता है। विषय और स्त्रीसंगत साथ होने पर विषयासक्ति से मन क्षुब्ध होता है। क्षणार्ध के लिये
हुए स्त्रीसंग के कारण भी सज्ञान लोग अनर्थ में पड़े हैं। स्त्री को देखकर देवेन्द्र कामातुर हो गया और उसके
शरीर में छिद्र पड़ गये और गुरुपत्नी तारा ने चन्द्रमा को भी कलंकित करके छोड़ा। सौभरी नाम का ऋषि महान
तपस्वी था, वह मत्स्य का मैथुन देखकर कामातुर हो गया (यह कथा नौंवे स्कंध के छठवें अध्याय में आयी है)
इस प्रकार यह स्त्रियों का स्कंध अनर्थकारी है। जब ब्रह्मदेव अपनी ही कन्या को देखकर कामासक्त हो गया तो
औरों की क्या बात की जाय ? कामिनी का संग महाभयंकर है। शिव का लिंगपतन इसी कारण हुआ। इन स्त्रियों
की संगत में बड़े-बड़े सज्ञान और योगी भी फँस गये हैं। नारद ने केवल विनोद ही विनोद में कृष्ण की स्त्री माँग
ली, उसके लिये गंगातट पर उसकी नारदी बना दी और उसके गर्भ से साठ पुत्र उत्पन्न हुए। सहज मौज के लिये
भी यदि स्त्रियों के पास जाएँ तो जब सज्ञानों के लिये भी वह संगत बाधक होती है तो औरों की क्या बात करें ?
आधे क्षण के लिये स्त्रियों की संगत करके ज्ञानी भी ठग गये हैं। इसलिये जो स्त्रीसंग पर विश्वास करेंगे वे मेरी
ही तरह दुःखी होंगे। इसलिये स्त्री संग पर विश्वास रखने से छह इन्द्रियों का समूह सबको चक्कर में डाल देता
है। इसीलिये इन्द्रियों को वश में रखकर स्त्रियों का सर्वथा त्याग करना चाहिये। इस प्रकार स्त्रियों की संगति
छोड़कर इन्द्रिय वृत्तियों को नियंत्रण में रखकर राजा ने परम शान्ति प्राप्त की। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
७०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीभगवानुवाच
एवं प्रगायन् नृपदेवदेवः स उर्वशीलोकमथो विहाय।
आत्मानमात्मन्यवगम्य मां वै उपारमज्ज्ञानविधूतमोहः ॥ २५॥
जिसने उर्वशी सह स्वर्ग के सारे भोगों का भोग किया, जिसे देवता भी श्रेष्ठ मानते हैं; जो सभी समस्त
राजाओं का मुकुटमणि था, जिसके आगे राजा साष्टांग दण्डवत् करते थे, ऐसा चक्रवर्ती राजा पुरु उर्वशी का तथा
स्वर्ग का उपभोग कर विरक्त हुआ, इसलिये वह एक भाग्यशाली राजा था। जिन्हें विषयों का लाभ ही नहीं हुआ
ऐसे विरक्त योगी बहुत दिखायी देते हैं किन्तु स्वर्ग की देवांगना का उपभोग कर राजा पुरुरवा विरक्त हुआ, इस
दृष्टि से वह बहुत ही धन्य है। पुरुरवा जैसी विरक्ति अन्य किसी में नहीं देखी, इसलिये पुरुरवा सारे त्रिभुवन में
धन्य हे ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण अपने मुख से वर्णन करते हैं। अनुताप के आवेग में उसने अपनी स्थिति की निन्दा
कर स्त्रीविषय की आसक्ति छोड़ दी और मोह को सचमुच ही धो डाला। पश्चात्ताप की अँगीठी सुलगा कर,
वैराग्य का पुट देकर, विचारों से भलीभाँति इन्द्रियदमन कर उसने काममोह का दाग धो दिया। जिस प्रकार सुवर्ण
का पुट देने से उसका वजन घट जाता है किन्तु गुणवत्ता बढ़ जाती है, उसी प्रकार आत्मानुभव के लाभ से वृत्ति
को भलीभाँति धो-पोंछ दिया। इस प्रकार ऐसी अत्यन्त शुद्ध वृत्ति हो जाने के कारण विवेक वैराग्य रूप सम्पत्ति
से और पूर्ण पश्चात्ताप से वह मेरे कृपा प्रसाद का सुपात्र बना। मेरी कृपा के बिना देह में कभी अनुताप उत्पन्न
नहीं होता। जिसमें पूर्ण अनुताप हुआ दिखायी दे उसके प्रति मेरी पूर्ण कृपा है, ऐसा समझना चाहिये। मेरी कृपा
होने से जीव पूर्ण ब्रह्मरूप होता है और देहाभिमान समूल नष्ट होकर 'मैं' 'तू' का आभास ही नहीं होता। फिर
कार्य, कर्म, और कर्ता; भोग्य, भोग और भोक्ता; दृश्य, दर्शन और द्रष्टा यह त्रिपुटी बिलकुल शेष नहीं रहती।
तीन गुणों की त्रिपुटी का कारण जो मूलभूत अज्ञान है वह सद्गुरु कृपा से समाप्त हो जाता है। रस्सी से सर्प का
भास होना जिस प्रकार रस्सी को पहचानने से समाप्त हो जाता है उसी प्रकार गुणों के साथ अविद्या भी गुरुपदेश
से अदृश्य हो जाती है। सद्गुरु के उपदेश के अनुसार जब द्वैत का भान नहीं होता तो फिर उर्वशी का भोग कौन
करेगा? राजा आत्मानंद से अत्यन्त तृप्त हो गया। राजा जब ब्रह्मरस से तृप्त हुआ, तब वह उर्वशी को छोड़,
स्वर्गलोक छोड़कर आत्मानंद से तृप्त होकर वहाँ से चल पड़ा। अन्य ज्ञाता स्त्रियों को अवश्य त्याग करते हैं
किन्तु उनसे कामासक्ति का त्याग नहीं होता। लेकिन राजा की वैसी स्थिति नहीं थी। वह वास्तविक विरक्ति में
पहुँच गया था ऐसी विरक्ति में जहाँ स्त्री विषय की बात ही नहीं उठती, ब्रह्मानन्द से सारी सृष्टि भर जाती है, ऐसे
आत्मानंद की पुष्टि से वह तृप्त हुआ। ऐसे आनन्दरूप में वह सहज ही मत्स्वरूप होकर मुझसे मिल गया।
कल्पना से उत्पन्न काम-विषय को जीत कर वह आत्मानंद में नाचने लगा। ऐसे दृढ़निश्चय से उसे मेरा
निजस्वरूप प्राप्त हुआ और उसी ने अपना इतिहास अपने सुख समाधान के लिये सुनाया। अनुताप के आवेग में
सहज ही अविद्या का नाश हो वह आत्मसुख से तृप्त हुआ। ऐसा निजलाभ प्राप्त करना हो तो स्त्रियों की
विषयासक्ति छोड़ देनी पड़ेगी और अच्छी संगति करनी होगी। यही बात श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
ततोदुःसङ्गमुत्सृज्य सत्सुसज्जेतबुद्धिमान्।
सन्त एतस्यच्छिन्दन्ति मनोव्यासङ्गमुक्तिभिः ॥ २६ ॥
यदि दुःसंग हो तो उसे अवश्य छोड़ देना चाहिये। अब दुःसंग कैसा ? तो स्त्री और स्त्रैण इनसे अधिक
दुःसंग और कोई नहीं है जो वेदशास्त्र को नहीं मानता, जो परमार्थ पर विश्वास नहीं करता और जिसका अन्तर
छब्बीसवाँ अध्याय
७०७
विकल्प से भरा रहता है वह भी सचमुच दुःसंग ही है। जो अत्यन्त विरक्ति की बात करता है किन्तु हृदय में
अधर्म काम की प्रीति रहती है; कामना के आड़ आते ही द्वेष बढ़ता है; वह भी सचमुच दुःसंग है। उसी प्रकार
स्वधर्म, कर्म, विनय, और सात्त्विक वृत्ति का बाहर प्रदर्शन करना और अंतःकरण में संतों के दोष देखना; और
संवाद में उसका उदाहरण देना, वह अत्यन्त कठिन दुःसंग है। मुख्यतः हमारी सकामता ही सचमुच दुःसंग है।
उस काम का समूल त्याग कर देने से दुःसंग का त्याग होता है। काम कल्पना की मार यही सबसे असाध्य
दुःसंग है। जो पुरुष कामकल्पना का त्याग करेगा उसी का संसार सुखमय होगा। कामकल्पना छूटने के लिये
सत्संग ही प्रमुख कारण है। संतों के चरणों में लीन होने से कल्पना और काम का अपने आप लय हो जाता है।
संग सभी अर्थों में बाधक है इसलिये यदि सभी प्रकार का संग छोड़ने को कहें तो सत्संग न करें तो साधक कैसे
छूट पायेंगे ? सत्संग के बिना जो साधन है वही साधक के लिये दृढ़ बन्धन हो जाता है। सत्संग के बिना किया
हुआ त्याग ढकोसला है। चित्त और विषय का बन्धन दृढ़ है; उसे विवेक से छुड़ाने से केवल साधु ही समर्थ है।
संतों की सहज बातें करोड़ों उपदेशों से अधिक प्रभावी होती हैं; देहात्म भाव से उत्पन्न हुए जीवों के बन्धन वे
शब्दों से काट देते हैं। सद्भाव से संगत करने से साधकों की संसारपाश से मुक्ति होती है। इसलिये बुद्धिमानों को
संतों की संगति अवश्य करनी चाहिये। उन संतों के लक्षण यथार्थ ढंग से और अपनी प्रसाद वाणी से श्रीकृष्ण
अत्यन्त संक्षेप में और अत्यन्त प्रेम से उद्धव को बता रहे हैं।
सन्तोऽनपेक्षा मच्चित्ताः प्रशान्ताः समदर्शिनः।
निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः॥ २७॥
साधुओं के अनेक लक्षण हैं किन्तु श्रीकृष्ण उनमें से केवल आठ लक्षण चुनते हैं। सुनो। लाभ अथवा हानि
साधुओं के चित्त को बाधा नहीं पहुँचा सकते, चित्त सदा भगवान की ही ओर लगा रहता है। इसी का नाम है
'निरपेक्षण'। कोई एक विशिष्ट विषय मुझे प्राप्त हो इसका स्मरण भी जीव को नहीं होता। उद्धव ! साधुओं की
यह निरपेक्षता की निधि, यह उनका पहला गुण है। चित्त से चैतन्य का ही चिन्तन करना, इसी का नाम है
'मच्चित्त' होना। इसी का नाम है, पूर्ण निरपेक्षता। अन्य किसी भी बात का चिन्तन करना संसार बाधा का कारण
बनता है। इस प्रकार निरपेक्ष होने के लिये जागृती में, स्वप्न में और सुषुप्ति में चित्स्वरूप में दृढ़ रहना, इसी का
नाम है 'मच्चित्त'। यह दूसरा गुण है। देह का चाहे श्रृंगार हुआ हो या वह आपत्ति से ग्रस्त हुआ हो, फिर भी
परमानन्द में निमग्न रहना, इसी का नाम है 'मच्चित्त'। चित्त जब कामलोभादि से दोषरहित होकर परमानन्द में
स्थिर हो जाता है, तभी वहाँ शान्ति का वास होता है, इसीलिये उसे प्रशान्त कहते हैं। कोई प्राणान्त होने तक
अपराध करता रहे फिर भी जो उसे 'दुष्ट' नहीं कहता, उलटे उस अपकार करने वाले पर भी उपकार करता है,
उसी को उत्कृष्ट 'शांति' कहते हैं। कोई सब कुछ ठग ले फिर भी जो उस पर क्रोध नहीं करता, उसे दोषी नहीं
कहता, बल्कि उसे ब्रह्मार्पण समझता है; इसी कारण उसके शरीर में प्रशांतता आती है। सचमुच, ब्रह्मभावना से
सभी प्राणियों पर विश्वास करना तथा चित्त में किसी प्रकार का विकल्प उत्पन्न न होने देना, इसी का नाम
'प्रशांतता' है। यह तीसरा गुण है। यह गुण आने का कारण यही है कि संसार में सर्वत्र वैषम्य ही भरा हुआ है,
फिर भी जो उस वैषम्य में भी 'समभाव' देखता है, वही सच्चा 'समदर्शी' है। यही निरुपम चौथा गुण है। यह
समदृष्टि हाथ लगने के लिये, भक्तिभाव से भगवान को भजन कर अहंता और ममता का पूर्णरूप से त्याग करना
चाहिये। उसके बारे में भी सुनो। देह में देहाभिमान रखने से 'अहंता' 'मैं' पन बढ़ाती है और उस 'मैं पन' के
७०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कारण देह सम्बन्धी 'ममता' बढ़ती है। यह बढ़ी हुई अहंममता महादुःख के भँवर में फँसती है। उसी निज दुःख
का निवारण करने के लिये भक्तिभाव से श्रीगुरु की शरण में जाना चाहिये। गुरु की कृपा पूर्ण होने तथा उनके
द्वारा देह की अहंत प्रकट कर देने से सारा संसार 'मैं' ही हूँ ऐसा अनुभव होता है। छोटा-बड़ा जो भी कुछ सृष्टि
में दिखायी पड़ता है, वह सब मेरा ही स्वरूप है, मेरे 'मैं' पन की इतनी प्रसिद्धि है कि वह सारे त्रैलोक्य को
व्याप लेती है। ऐसे शुद्ध 'मैं' पन से परिपूर्ण होने पर देह को मैं कहने वाला कौन होगा? 'मैं'-'तू' सब कुछ वहाँ
समाप्त हो जाता है। इसी का नाम है 'निरभिमान'। इस प्रकार मेरे 'मैं' पन का विचार करने पर 'मेरा पन' अर्थात्
'ममता' पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है। यदि मेरे 'मैं' कहने लायक कोई दूसरा स्थान शेष हो तभी वहाँ ममता का
स्फुरण हो सकता है। उसे मैंने चिन्मात्रस्वरूप से निगल ही लिया है। इसलिये मैं पन से 'मैं और मेरा', तथा 'तू'
पन से तेरा कहने का प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसा परब्रह्म से ऐक्य होने के कारण ही सहज ही 'निर्मम' होता है।
उद्धव ! 'निर्मम' और 'निरभिमान' वह यही है। संतों का निजगूढ़ तथा पाँचवाँ और छठवाँ लक्षण यही है। इस
प्रकार जो सचमुच ही निर्मम और अहंकार रहित होकर रहते हैं, उन्हें द्वंद्व दुःख के पहाड़ों की भी बाधा नहीं
होती। देह को प्रारब्ध के भरोसे छोड़ देने पर चाहे सुख दुख की झड़ी भी लग जाय तो भी वह ब्रह्मसुख के
चौराहे पर देह का केवल द्रष्टा-साक्षी होकर रहता है। देह को बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त होने पर भी वह मन में हर्षित
नहीं होता अथवा कोई देह को नरक में ढकेल दे तो दुःखी नहीं होता। देह बाघ के मुँह में फँस जाय तो भी वह
दुःख से विह्वल नहीं होता अथवा पालकी में बैठने पर आनन्दित नहीं होता। परछाई विष्ठा पर पड़े अथवा
पालकी पर चढ़े इससे उस पुरुष को सुख या दुःख कुछ भी नहीं होता। उसी प्रकार देहभोग मुक्त के लिये होते
हैं। उसकी दृष्टि में दुःख दुःख से वंचित होता है और सुख सुख को भूलता है, इसीलिये वह निर्द्वन्द्व बनता है।
उसी प्रकार जो निर्मम और अभिमानरहित होता है उसे भेद का भान नहीं रहता और अभेद में द्वंद्व बन्धन मिथ्या
होता है। यह 'निर्द्वन्द्व' अर्थात् अभेद भाव मुक्त का सातवाँ गुण है। अरे ! जरा देखो। जो निर्द्वन्द्व और निरभिमान
होता है, उसे जब अपना देह बिलकुल मिथ्या लगता है तो उसे देह सम्बन्धी परिवार बढ़ाने का अवकाश कहाँ
है? अपने सगे-सम्बन्धी, धन सम्पदा, पत्नी-बच्चे इनके साथ रहकर भी वह इन्हें स्पर्श नहीं करता। जिस प्रकार
जगे हुए व्यक्ति के लिये स्वप्न का व्यवहार नहीं रहता, उसी प्रकार साधुओं का भी संसार नहीं होता। सारांश,
साधु परिग्रही होते हुए भी पूर्णरूप से 'अपरिग्रही' होते हैं। यह उनका आठवाँ मुख्य लक्षण है। संसार के लिये
यह दुर्गम है क्योंकि साधु परिग्रही दिखाई देते हैं किन्तु परिग्रही नहीं होते हैं। संतों की यह स्थिति प्राप्त करने के
लिये उनकी ही भक्ति करनी चाहिये। साधुओं के ये आठ लक्षण वास्तव में ब्रह्मा के अष्ट अंग ही हैं अथवा
निर्गुण की ये अष्ट महासिद्धियाँ ही साधु के आठ पंखुड़ियों का कमल खिला हो, ऐसा यह संतों का स्वानंदशील
साधु का लक्षण है। ये श्रेष्ठ आठ गुण सभी भूषणों के भूषण हैं। ये गुण जिनमें पूर्णरूप से अंकित हो जायें वे
साधु सज्जन नितांत पवित्र हैं। अन्य किसी का भी संग अत्यन्त बाधक होता है। लेकिन यह सत्संगति वैसी नहीं
है। इस संग के योग से देहसंग की आसक्ति टूटती है। इसके लिये उन्हें उपदेश नहीं करना पड़ता। केवल संग ही
देही को विदेही बनाता है। वही अपूर्वता सात श्लोकों में श्रीहरि वर्णन करते हैं।
तेषु नित्यं महाभाग महाभागेषु मत्कथाः।
सम्भवन्ति हिता नृणांजुषतां प्रपुनन्त्यघम्॥ २८॥
इन्द्र पद से ब्रह्मलोक तक प्राप्त होने को बड़ा 'भाग्य' कहते हैं। लेकिन यह भी सत्संग का एक अंश भी
नहीं है। ऐसी सत्संगति महाभाग्यवानों को ही प्राप्त होती है। साधु मेरी यशगाथा का गायन करते हुए
छब्बीसवाँ अध्याय ७०९
भगवद्भावना से ही व्यवहार करते हैं। वह कथा यदि अकस्मात भी सुनायी पड़ी तो कलियुग के सारे पाप
तत्काल धो देती है। वह गंगा से भी अधिक पवित्र है। जहाँ मेरी निजकथा का गायन होता है, वह तीर्थ स्थान भी
पवित्र हो जाते हैं। ऐसे भगवान की कथा कीर्ति का साधु घोष करते रहते हैं। स्वयं भागीरथी भी मन ही मन
चिन्तन करती रहती है कि कभी कोई साधु मेरे पास आये तो मेरे सारे पाप धुल जायें। मेरे मन में पार्वती का द्वेष
होने के कारण मैं भी पाप से बद्ध हूँ। वह पातक भी संतचरणों से झड़ जायगा क्योंकि सत्संगति से सारे पाप घुल
जाते हैं अथवा जिसके मुख में हरिनाम की कीर्ति होगी उसके पैर यदि मेरे पात्र तक पहुँचेंगे तो मेरे सारे पाप चले
जायेंगे, ऐसा स्वयं भागीरथी कहती है। इस प्रकार भागीरथी भी संतों के संगति की निरन्तर इच्छा करती है। ऐसा
उन संतों के मुख से मेरी कथा अत्यन्त आदर से जो श्रोता सुनेगा उसका भाग्य सचमुच मैं भी वर्णन नहीं कर
पाऊँगा। मेरी कथा में रुचि रखने से उसमें नित नया माधुर्य मिलने लगता है और आदरपूर्वक सुनने से करोड़ों
पाप जल कर नष्ट हो जाते हैं। मेरी कथा अथवा मेरा नाम सारे पातकों को भस्म कर देता है। उद्धव ! चित्तशुद्धि
का अत्यन्त सुगम मर्म यही है। अनेक प्रकार के योग अथवा वेदाध्ययन करने से भी मन पवित्र नहीं होता। उसी
हरिकथा का श्रवण करने से अंतःकरण पवित्र होता है। अबद्ध रीति से वेद का पठन करने से अनेक प्रकार के
दोषों की बाधा होती है। किन्तु नाम यदि अशुद्ध भी कहा जाय तो भी उसे कहने वाले परमार्थ से शुद्ध ही हो जाते
हैं। अनेक प्रकार के योग, याग अथवा वेदाध्ययन के अधिकारी केवल ब्राह्मण ही होते हैं। किन्तु उद्धव ! कथा के
श्रवण से चारों वर्ण पावन होते हैं। जब कथाश्रवण से इतना लाभ है तो फिर सभी लोग उसका श्रवण क्यों नहीं
करते, ऐसा यदि कोई कहे तो उसका उत्तर है भगवत्कृपा के बिना किसी को वह भाग्य प्राप्त नहीं होता। जिन
पर भगवान की पूर्ण कृपा रहती है, उनका ही कथा कीर्तन से प्रेम रहता है। भाग्य से वही श्रेष्ठ हैं। ऐसा श्रीकृष्ण
स्वमुख से बताते हैं। मेरा नाम और यश संसार को पवित्र कर देता है ऐसा श्रीकृष्ण ने विह्वल होकर उद्धव से
कहा। किन्तु ऐसी भगवत्कथा हमें कैसे प्राप्त हो ? उसी के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण अगले श्लोकार्थ में स्पष्ट करके
बताते हैं।
ता ये शृण्वन्ति गायन्ति ह्यनुमोदन्ति चादृताः ।
मत्पराः श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दति ते मयि ॥ २९॥
कोई अपने घर के काम से कहीं जा रहा हो और जाते-जाते सहज ही उसके कान में हरिकथा पड़ जाय तो
कृष्ण कीर्ति की कथा के अक्षर कर्णद्वार में घुसते ही भीतर के सारे पातक खड़बड़ा कर बाहर आ जाते हैं। सिंह
की गर्जना कान पर आते ही जिस प्रकार मदमत्त हाथी की हालत खराब हो जाती है, उसी प्रकार हरिकथा कान
पर पड़ते ही महापापों की राख हो जाती है। इस प्रकार पातकों का कचरा साफ होते ही हरिकथा में रुचि जगती
है और कथा श्रवण की ओर ध्यान देने से मन भी हर्ष से प्रफुल्लित होता है। जैसे-जैसे कथा का रहस्य समझ में
आने लगता है वैसे-वैसे उसके प्रति प्रेम बढ़ने लगता है और उसी प्रेम के आवेग में वह स्वयं ही वह कथा गाने
लगता है। लोकलज्जा की गाँठ खोलकर खुले मन से हरि के गुणानुवाद गाने से रुचि अपने आप उत्पन्न होने
लगती है तो वह मन में लज्जा नहीं करता। भक्तिभाव से भगवत्कथा गाने से अपने आप रुचि उत्पन्न होती है।
इसलिये वह अधिक आदर से और अधिकाधिक श्रद्धा से कथा सुनाने लगता है और जैसे-जैसे रुचि से कथा
सुनाता है वैसे-वैसे श्रद्धा भी अधिक बढ़ने लगती है और अन्त में प्रेम का ज्वार आकर उसमें श्रद्धा भी डूब जाती
है। कथा कीर्तन का प्रतिपादन बढ़ती श्रद्धा में होने पर विषयासक्ति की बाधा नहीं होती और इस प्रकार साधकों
७१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
को मत्परायण स्थिति प्राप्त होती है। भगवद्भजन न कर वेदाध्ययन अथवा यज्ञदान करने से ही हम तर जायेंगे
ऐसा कहने वाले लोग महामूर्ख हैं। इसमें भगवद्भक्ति ही मुख्य है, ऐसा मन में विश्वास करने पर वृत्ति
भगवत्परक ही होती है और इस प्रकार सभी प्राणियों में मद्भाव उत्पन्न होता है। ऐसा भाव अंतःकरण में धारण
कर मेरी भक्ति करने के अलावा वे और कुछ नहीं करते। इस प्रकार वे मत्पर हो जाते हैं। ऐसी मत्पर वृत्ति से वे
निजस्थिति में सावधान रहते हैं। इससे उन भक्तों में चौथी भक्ति उत्पन्न होती है। वहाँ स्मरण किये बिना ही हरि
का अखण्ड स्मरण होता रहता है। जो-जो क्रिया होती है उससे निरन्तर भगवद्भजन सहज ही होता रहता है।
दृष्टि से वह जो भी दृश्य देखता है, वह भले ही बड़ा हो या छोटा हो उसमें हरि का ही दर्शन होता है। यही
अहेतुक और सहज भजन है। उसकी वाणी से जो निकलता है, वह सब स्तव्य, स्तविता आदि लक्षणों को
भूलकर केवल हरि का स्तवन होता है। शब्दों से शब्द सजाते समय शब्दरूप से वह हरि की सत्ता ही रहती है।
इसी प्रकार शब्द जिस शब्दार्थ का द्योतक रहता है वह अर्थग्राहकता भी हरि की अर्थात् हरिरूप ही है। उसी
प्रकार कानों से शब्दों का श्रवण होते समय वह सारा शब्दार्थ ब्रह्मार्पण ही होता रहता है। नाक और सुवास का
मिलन होता है, उस समय भोक्ता के रूप में हरि ही खड़ा रहता है। अर्थात् जिसकी गंध लेनी है, वह वस्तु, गन्ध
लेने वाला तथा नाक यह त्रिगुट गन्ध निगल लेता है। 'रस', 'रसना' और 'रसाभिरुचि' इसमें भी श्रीहरि ही
भोक्ता रहता है। इसलिये भोग्य, भोक्ता और भोजन सम्बन्ध निजबोध के योग से वह परमानन्दरूप कर देता है।
शीत-उष्ण-मृदु-कठोर ('स्पर्श' विषय के चार गुण) आदि का शरीर से स्पर्श होते ही वह सारा वह स्वयं हो
जाता है क्योंकि मृदु, कठिन आदि भेद वह मिथ्या समझता है। उसे इस सबमें चित्सत्ता का ही स्फुरण होता है।
हाथ की क्रिया वह अकर्ता के ही रूप में करता रहता है इसलिये लेने-देने में भी अकर्त्तात्मभाव से हरि का ही
भजन होता है। निजरूप पर निश्चल हो जाने के कारण वह चपल कदमों को इस सूक्ष्मता से चलाता है जिस
प्रकार सूर्य किरणों के कारण मृगजल पर लहरें चलती हैं। जागृति, स्वप्न तथा सुषुप्ति में वृत्ति चित्स्वरूप में ही
लगी रहती है, इसलिये उद्धव ! 'चित्त' को अंतःकरण की स्फूर्ति का ही विस्मरण हो जाता है। इसी का नाम
'मद्भक्ति' है। यह मेरे पसन्द की भक्ति है। इसी का नाम 'चौथी भक्ति' है। इस भक्ति का भाग्य जिसे प्राप्त होता
है, उसकी चारों मुक्तियाँ दासी बन जाती हैं।
भक्तिं लब्धवतः साधोः किमन्यदवशिष्यते।
मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि॥ ३०॥
यह मेरी अत्यन्त प्रिय चौथी भक्ति है। यदि यह भाग्य से प्राप्त हो जाय तो चारों मुक्तियाँ तृणवत् हो जाती
हैं। जहाँ मेरी निरपेक्ष भक्ति रहती है वहाँ चारों मुक्तियाँ चरणों पर गिरती हैं लेकिन भक्त उनका स्पर्श तक नहीं
करते। मेरे भजन से उन्हें इतना अधिक प्रेम रहता है। मेरे भजनों से प्रेम के कारण उन्हें स्वप्न में भी किसी प्रकार
की बद्धता का आभास नहीं होता और बिना बद्धता के मुक्ति व्यर्थ है इसलिये मेरे भक्त मुक्ति स्वीकार नहीं करते।
जहाँ समूल बद्धता ही मिथ्या वहाँ बेचारी मुक्ति क्या है? मेरे भजन की चाह में ही मेरे भक्तों को स्वानंद की राशि
मिलती है। निरपेक्ष और प्रेमयुक्त भक्ति से मेरा अनन्य भजन करने से, उस भजनास्थिति में ही भक्तों को स्वानंद
की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार गर्भवती स्त्री गर्भ के साथ बढ़ती है अथवा कोई युवती अपने यौवन के साथ
व्यवहार करती है, उसी प्रकार आत्मानंद की परिपूर्णता के साथ मेरे भक्त मेरे भजन में लीन रहते हैं। उस समय
सगुण अथवा निर्गुण इन दोनों रूपों से परिपूर्ण ब्रह्म मैं ही रहता हूँ। इसलिये भक्ति से मेरा भजन करने से मेरे
छब्बीसवाँ अध्याय ७११
भक्त ब्रह्मसम्पन्न होते हैं। निष्ठा से मेरी भक्ति करने से ऐसी कौन-सी वस्तु है जो भक्तों को नहीं मिल सकती ?
विवेक, वैराग्य, ज्ञानसम्पत्ति ये मेरे भक्तों के चरणों पर गिर पड़ते हैं। मेरे भजन से भेदभाव नष्ट होता है और
अभेदज्ञान अपने आप प्रकट होता है। इससे परमानंद भर जाता है और वह स्वतःसिद्ध स्वानंद का स्वरूप बन
जाता है। मेरे स्वरूप का अंत नहीं है इसीलिये मुझे 'अनंत' कहते हैं। किन्तु भक्त का भाव इतना समर्थ और
श्रेष्ठ रहता है कि वह अनंत को भी बाँध कर रख सकता है। जिनका प्रेम इतना मधुर है, उनकी सेवा की मुझे
चाह रहती है। उनका संकट मैं सहन करता हूँ और मुझ निरिच्छ को भी उनकी इच्छा रहती है। देव प्रेम के वश
में हो गया और बोला कि मैं उन्हीं का अंकित हूँ। मैं जीवकाल से उस पर न्योछावर हूँ और सारे त्रिभुवन में
उन्हीं का होकर रह गया हूँ। अकस्मात सत्संगति होने से मेरे भक्तों को जब इतनी प्राप्ति होती है तो फिर अनन्य
भक्ति से साधु की सेवा करते हैं उनकी गति मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता। ऐसे संतों की महिमा का वर्णन
करने से श्रीकृष्ण को संतोष नहीं हुआ इसलिये वही संतमहिमा अगले चार श्लोकों में वर्णन कर रहे हैं।
यथोपश्रयमाणस्य भगवन्तं विभावसुम्।
शीतं भयं तमोऽप्येति साधून् संसेवतस्तथा ॥ ३१॥
उद्धव ! तेजोमूर्ति अग्नि की सेवा करना जो जानते हैं, उनकी ठंडक, अन्धकार और भय का वह (अग्नि)
निवारण करता है। उसके पास रहने से ठंडक नष्ट हो जाती है, उसकी तेजोवृद्धि से अन्धकार नष्ट होता है और
उस पर ईश्वर भावना रखने से भय का निवारण होता है। सत्संगति को भी तुम उसी प्रकार समझो। उस संगति से
त्रिविध तापों का निवारण होता है। यही बात उद्धव तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ। ठंडक अर्थात् द्वंद्व के कारण होने
वाली पीड़ा साधु समूल नष्ट कर देते हैं। तम का अर्थ है अज्ञानांधकार। इसका भी वे आत्मज्ञानोपदेश से विनाश
करते हैं। भय में, मरने जैसा भय नहीं है। ज्ञानी साधु उसका निवारण करते हैं। इतना ही नहीं, बल्कि वे
जन्ममरण को दूर कर देते हैं क्योंकि वे दीनों के प्रति पूर्णरूप से दयालु हैं। अब साधु अग्नि जैसे हैं यह कहना
भी विसंगत है, क्योंकि साधु अग्नि से भी श्रेष्ठ हैं। अग्नि के पास भीषण धुआँ रहता है और साधु क्रोधरहित
तथा धूम्ररहित होते हैं। अग्नि अधम और उत्तम दोनों को ही झुलसाता है, किन्तु साधु सबके लिये, समान रूप से
सुखदायी होते हैं। साधु की संगति धन्य है। वे अपनी संगति से जड़ का जड़त्व नष्ट करते हैं, कर्म का कर्मत्व
तोड़ते हैं और निजसंगति से डूबते हुए को बचाते हैं।
निमज्ज्योन्मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम्।
सन्तो ब्रह्मविदःशान्ता नौर्दृढेवाप्सु मज्जताम् ॥ ३२॥
संसारसागर में क्षण-प्रतिक्षण ज्वार आता रहता है और उसका आकार असीम बढ़ता रहता है। उसमें गोता
खाते हुए लोगों में अधर्म बुद्धि ही उत्पन्न होती है। अधर्म से नरक में डूबते हैं और स्वधर्म से स्वर्ग में जाते हैं।
इस प्रकार संसारी लोग स्वर्ग और नरक में डूबते-उतराते रहते हैं। उन्हें तारने के लिये साधु सज्जन ही मजबूत
नौका है। पानी के समुद्र में गिरने पर संसार सागर में डूबने वालों के लिये भी सज्जनरूप नौका ही पार लगाती
है। कामक्रोध रहित शान्ति यही नाव की अछिद्रता है। वह ब्रह्मज्ञान से सुदृढ़ होने के कारण सुरक्षित है। काम-
क्रोधादि भयंकर जलचर आमिष खाने के लिये इस नाव तक कभी नहीं आ पाते। सारांश, सत्संग सभी को तारता
है। इस नाव की एक बात बिलकुल अद्भुत है और वह यह कि वह कल्पांत में भी पुरानी नहीं होती। बड़े प्रवाह
के भँवरों में भी उसे डुबाया नहीं जा सकता। वह अपनी संगति से सभी को तारती है। लेकिन उद्धव ! इस नाव
७१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
का एक और चमत्कार है। वह यह कि इस नाव पर जो चढ़ते हैं वे डूबते हैं और जो 'तल' में रहते हैं, वे तर
जाते हैं। यहाँ दीनों के प्रति दया ही मुख्य रूप से उपाय है। इस दया का उद्देश्य स्वयं श्रीकृष्ण बताते हैं।
अन्नं हि प्राणिनां आर्तानां शरणं त्वहम्।
धर्मो वित्तं नृणां प्रेत्य सन्तोऽर्वाग् विभ्यतोऽरणम् ॥ ३३ ॥
अन्न के बिना प्राण कभी नहीं बचता, क्योंकि प्राणियों के पोषण का पूर्ण सामर्थ्य अन्न में ही होता है। धर्म
से प्राप्त की हुई सम्पत्ति इस लोक में हमारा संरक्षण करती है। वही धर्मरूप धन देह में भी उत्तम गति प्रदान
करता है। संसार में नितांत त्रस्त और त्रिविध तापों संतप्त शरणागतों का आश्रयस्थान होने के नाते मैं नारायण ही
उनका संरक्षक होता हूँ। मेरा नामस्मरण करने से जन्म-मरण सहज ही दूर होता है; मेरी शरण आने पर भला
कौन-सा दुःख उसे पीड़ा देगा ? दुःख का भय होने के पहले ही जो सद्बुद्धि से साधु की सेवा करते हैं उन्हें
संसारभय की व्याधि जरा भी नहीं सताती। यदि प्राणी का पतन हो जाय और वहाँ सौभाग्य से सज्जनों की भेंट
हो जाय तो अधोगति का निवारण कर वे जन्म-मरण को भी समाप्त कर देते हैं। संसारसागर तरने के लिये
सत्संगति यही सबसे अच्छा आधार है ! भक्ति भाव से संतों के चरण छूने से उनके द्वारा दीनों का उद्धार होता है।
सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्कः समुत्थितः।
देवता बान्धवाः सन्तः सन्त आत्माहमेव च ॥ ३४ ॥
जिस प्रकार सूर्य अपने तेज से अन्धकार के साथ-साथ रात्रि को भी समाप्त कर देता है, उसी प्रकार
सत्संगरूपी सूर्य का उदय होते ही, वह अविद्या की रात्रि निश्चित रूप से समाप्त कर देता है। बाहर सूर्योदय होते
ही चोरों का भय दूर होता है, उसी प्रकार सत्संगति प्राप्त होने से संसार का भय कल्पांत में भी शेष नहीं रहता।
बाहर का सूर्योदय होते ही पक्षी अपना घोंसला छोड़ देते हैं, उसी प्रकार सत्संग का सूर्योदय होने पर जीव अपने
देहरूपी घोंसले छोड़ देते हैं (देहाभिमान छोड़ देते हैं)। बाहर के सूर्यकिरणों से कमलिनी हर्ष से विकसित होती
हैं, उसी प्रकार सत्संग रूपी सूर्य के प्रकाश से निर्विकल्प कमलिनी प्रफुल्लित होती है। आकाश में सूर्योदय होते
ही नरमादा चक्रवाक का मिलन होता है। उसी प्रकार सत्संग प्राप्त होने पर जीव और शिव ये दोनों एक हो जाते
हैं। बाहर सूर्य की भोर होते ही लोग अपने गाँव का रास्ता चलने लगते हैं, उसी प्रकार सत्संग सूर्य का प्रकाश
होते ही मुमुक्षु निजधाम चले जाते हैं। बाह्य सूर्य का उदय होते ही कर्म की गति शुरू होती है, उसी प्रकार सत्संग
सूर्य की संगति से निष्कर्म प्रवृत्ति प्रारम्भ होती है। सूर्य के उदय के समय वेदज्ञ लोग अर्घ्यदान देते हैं, उसी
प्रकार सत्संग सूर्य का उदय होते ही मुमुक्षु देहबुद्धि को तिलांजलि देते हैं। सूर्योदय होने पर याज्ञिक होम में
आहुति देते हैं, उसी प्रकार सत्संगरूप सूर्योदय होने पर मुमुक्षु ज्ञानाग्नि में अहंता की आहुति देते हैं। सूर्य आकाश
में उदित होकर संसार में जड़ निद्रा को दूर भगाता है; संत चिदाकाश में उदित होकर जीवों को चिद्प्रकाश से
जागृत करते हैं। इसलिये साधु को सूर्य जैसा कहा जाय तो उचित ही है, लेकिन यह बात पूरी तरह गौण है
क्योंकि सूर्य का अस्त होता है किन्तु साधु सदासर्वदा प्रकाशमान ही रहते हैं। सूर्य को बादल ढँक सकते हैं किन्तु
साधु संसार में सदा निर्मल ही रहते हैं। सूर्य को सदा सर्वदा परिक्रमा करनी पड़ती है किन्तु साधु सदा अटल ही
रहते हैं। ग्रहण काल में सूर्य को राहु ग्रस लेता है किन्तु साधु ग्रहों का अस्तित्व ही नष्ट कर आत्मानंद में रहते
हैं। गहरा धुँधलका छा जाने पर रविमण्डल आच्छादित हो जाता हे किन्तु साधु को अन्धकार, धुँधलका अथवा
मोहपटल की जरा भी बाधा नहीं होती। सूर्य अपनी किरणों से सबको तप्त करता है लेकिन साधु अपने अंग से
छब्बीसवाँ अध्याय ७१३
संसार को शान्त करते हैं लेकिन साधु अपने अंग से संसार को शान्त करते हैं। सूर्य दृष्टि को सहायक होने पर
दृष्याकार से सृष्टि दिखाई देने लगती है और सत्संग दृष्टि को सहायक होने पर चिन्मात्र स्वरूप से सृष्टि की
स्थिति अंकित होती है। इस प्रकार विचार करने से मालूम होता हैं कि साधु सूर्य से श्रेष्ठ हैं। साधु पृथ्वी पर के
ज्ञानसूर्य हैं और अपनी संगति से संसारीजनों को संसार से तारते हैं। मृत्युलोक में साधु ही सच्चे देवता हैं; साधु
हीनों के मित्र तथा सखा बन्धु हैं। मैं स्वयं परमानन्दस्वरूप परमात्मा साधु रूप में ही संसार में विचरण कर रहा
हूँ। देवताओं को बलि प्रदान करने से वे प्रसन्न होते हैं किन्तु सज्जन पूर्णरूप से दयालु होने के कारण वे केवल
अपनी कृपा से तारते हैं। इष्ट, मित्र, भाई बन्धु आदि केवल धन के लोभ से भजन सम्बन्ध रखते हैं किन्तु साधु
लोभरहित तथा कृपालु होने के कारण दीनों के सच्चे मित्र और बन्धु हैं। संत कृपा के दीप हैं, संत मेरा
निजस्वरूप हैं। इसीलिये सत्संग से पाप नष्ट होता है और साधक निष्पाप हो जाते हैं। साधकों को निष्पाप कर
उन्हें वे ब्रह्मस्वरूप तक पहुँचाते हैं। उद्धव! साधुओं में सचमुच ही इतनी कृपालुता होती है। मैं निर्गुणरूप में पूर्ण
ब्रह्म हूँ और साधु चलते-फिरते ब्रह्म हैं। उनकी शरण में जाने से जन्म-मरण समाप्त हो जाता है। भक्तिभाव से
साधुओं की शरण में जाने से जन्म-मरण का अस्तित्व ही नहीं रह जाता। उद्धव! सचमुच साधु शरणागत के लिये
आश्रयरूप हैं। भक्तिभाव से सत्संगति करने से इन संसारी लोगों को मुक्ति मिलती है, ऐसा उद्धव ने श्रीकृष्ण को
प्रतिज्ञापूर्वक बतलाया। सद्भाव से सत्संगति करने से ब्रह्मस्थिति स्वयं चलती हुई आती है। यह निजमर्म भगवान
ने उद्धव को अध्याय के अन्त में बतलाया। परम विरक्ति के साधन के रूप में पुरूरवा का आख्यान सुना कर
श्रीकृष्ण अध्याय के अन्त में उसका उपसंहार करते हैं।
वैतसेनस्ततोऽप्येवमुर्वश्या लोकनिःस्पृहः।
मुक्तसङ्गो महीमेतामात्मारामश्चार . ह ॥ ३५॥
पहले सूर्यवंश प्रसिद्ध था और उसमें सोमवंश का सम्बन्ध श्रीकृष्ण 'वैतसेन' इस पद के श्लोक में समाहित
कर बताते हैं। एक बार पार्वती के क्रीड़ावन में सम्पूर्ण एकान्त में शंकर और पार्वती वस्त्ररहित होकर आनन्दयुक्त
लीला कर रहे थे। तभी शिव के दर्शन के लिये अकस्मात सप्तर्षि प्रकट हुए। पार्वती को अत्यन्त लज्जा हुई और
उसने उस वन को शाप दिया। शाप यह था कि जो पुरुष उस वन में प्रवेश करेगा वह वहाँ आते ही स्त्रीरूप हो
जायगा। एक दिन सूर्यवंश का राजा सद्युम्न शाप का सामर्थ्य न जानने के कारण अपनी सेना के साथ उस वन में
शिकार के लिये आया। लेकिन वन में घुसते ही शाप के प्रभाव से वे सब स्त्रीरूप हो गये। उनके मन में उनके
पुरुषत्त्व की स्मृति ही नहीं रही। तत्काल घोड़ा घोड़ी हो गये, हाथी हथिनी हो गये; जो पुरुष थे वे स्त्रियाँ बन
गये। तब पुरुष की इच्छा से कामातुर स्त्रियाँ तत्काल वन के बाहर चली गयीं। राजा सद्युम्न भी अत्यन्त सुन्दर,
सुकुमार युवती बन गया और उसने सोम के पुत्र बुध को, प्रेम वश होकर प्रीति की माला पहनायी। बुध भी
सद्युम्न को युवती के रूप में देखकर उस पर आसक्त हो गया। इस प्रकार वे दोनों एक-दूसरे पर लुब्ध हो गये।
राजा चूड़ामणि बुधराजा ने सद्युम्नरूपी स्त्री से विवाह कर उसे अपनी पटरानी बनाया। कर्म की गति कैसी विचित्र
है। उस सद्युम्नरूपी स्त्री के गर्भ से बुध के वीर्य से पुरुरवा उत्पन्न हुआ। इस प्रकार सूर्यवंश में सोमवंश घुस गया।
यह सोमवंश के मूल की कथा है। यहीं से सोमवंश की वृद्धि हुई। सद्युम्न बुध की स्त्री बना तो उसके बाद राज्य
का कोई अधिकारी नहीं रहा और बहुत बड़ा संकट उत्पन्न हो गया। तब सूर्यवंश के कुलगुरु महायोगीश्वर
वसिष्ठ ने अत्यन्त भक्तिभाव से गौरीहर की प्रार्थना की। पार्वती को प्रसन्न कर सद्युम्न के लिये उःशाप माँगा। तब
७१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसने शंकर से ही कहा कि आप वसिष्ठजी को समझाइये। उनसे कहिये कि पार्वती का शापवचन कभी असत्य
नहीं होगा। तब वसिष्ठ को समझाने-बुझाने के लिये शंकर ने एक तीसरा चमत्कार किया। उन्होंने कहा कि
शुक्लपक्ष में सद्युम्न को पुरुषत्त्व प्राप्त होगा। कृष्णपक्ष में उसने स्त्री के रूप में बुध के साथ विलास किया। एक
पक्ष पुरुष और दूसरे पक्ष स्त्री, इस प्रकार उःशाप का पर्याय कर शिव ने उस पर कृपा की और उसे उसके राज्य
का अधिकारी बनाया। इस प्रकार सद्युम्न को पुरुषत्व अवश्य प्राप्त हुआ लेकिन वह पुरुषत्व उसे अच्छा नहीं
लगा। स्त्री संभोग के कारण उसे बुध से ही प्रीति हो गयी थी। स्वर्ग की अप्सराएँ सद्युम्न के पास आतीं लेकिन
वे उसे अच्छी नहीं लगती थीं। स्त्री के नाते उसकी बुध से ही पराकाष्ठा की प्रीति हो गयी थी। बुध को भी
सद्युम्न से ऐसी प्रीति हो गयी थी कि उसे उपभोग के लिये देवांगनाएँ अच्छी नहीं लगती थीं। पुरुष का पुरुष से
ही रममाण होने का मर्म मुझ श्रीकृष्ण को ही मालूम है। अन्य पापी बेचारे स्त्रीदेह पर ही आसक्त हो जाते हैं।
स्त्री देह में जो आत्मा है उसका भोग मैं श्रीकृष्ण ही कर सकता हूँ। अन्यों को विषय की इच्छा से स्त्री देह की
ही चाह होती है। अस्तु! और कितना बताऊँ? काम में निष्काम होकर रमना में रमापति ही जानता हूँ अथवा
जिनका निज का अनुभव है, वे जानते होंगे। पुरुषत्व की अपेक्षा कामरति में स्त्री देह में ही अधिक आसक्ति
रहती है। उस स्त्री विषय की निवृत्ति केवल सत्संग से ही होती है। वसिष्ठ की सत्संगति से स्त्रीभाव की निवृत्ति
हुई और सद्युम्न को पुरुषत्त्व प्राप्त हुआ। इससे स्पष्ट है कि सत्संग सारे त्रिभुवन में धन्य है। सद्युम्न को पुरुषत्त्व
प्राप्त होते ही वह अपने नगर में आया। किन्तु सारी सेना स्त्री रूप होने के कारण नष्ट हो गयी थी। इस प्रकार
उसकी सारी सेना विगत हो जाने के कारण उसे 'वीतसेन' यह नाम पड़ा। वीतसेन का पुत्र 'वैतसेन' अर्थात्
पुरूरवा था। उसने आत्मस्वरूप पहचान कर, विरक्ति से स्वर्ग की सारी भोग सम्पत्ति छोड़कर, उर्वशी के प्रति
कामासक्ति का त्याग कर, वह आत्मस्वरूप में रममाण हो गया। इस प्रकार आत्मस्वरूप में स्थिर होकर देहसंग
और अन्य संगतियों को मिथ्या मान वह त्रिभुवन में स्वानंद से संचार कर रहा था। जहाँ-जहाँ वह पग धरता वहाँ
सुख की राशियाँ एकत्र हो जाती थीं क्योंकि उसे आत्मानंद से सारी सृष्टि भरी हुई मालूम होती थी। इस प्रकार
वह ब्रह्ममय दृष्टि से ही विचरण करता रहता था। ब्रह्मस्वरूप होकर ब्रह्म में संचार करते हुए उसका पूरा जीवन
ही ब्रह्मरूप हो गया। वह जन्म-मरण भूलकर पूरी तरह पूर्ण मैं ही पूर्णस्वरूप होकर रहा। उर्वशी पुरूरवा का यह
आख्यान जो ध्यानपूर्वक श्रवण करेगा, उसके अगम्यागमनादि दोष नष्ट होंगे और साधकों को पूर्ण विरक्ति प्राप्त
होगी। इस प्रकार वैराग्य के बल पर वह राजा ब्रह्मपद पर पहुँचा। वैराग्य सत्संगति से उत्पन्न होता है और मेरे
भजन से सत्संग और विरक्ति ये दोनों प्राप्त होते हैं। सद्भाव से मेरी भक्ति करने से साधकों में विरक्ति उत्पन्न
होती है, ऐसा श्रीकृष्ण ने बताया जिसे उद्धव ने मन में ग्रहण किया। अब उस भजन प्रक्रिया के सम्बन्ध में प्रश्न
उद्धव अगले अध्याय में पूछेगा और उससे श्रीकृष्ण के मन को संतोष प्राप्त होगा। उद्धव अत्यन्त मधुर प्रश्न
पूछेगा और उससे श्रीकृष्ण को आनन्द होगा। उसी आनन्द के आवेग में वे भजन का मार्ग बतायेंगे। उपासना
काण्ड का सम्पूर्ण रहस्य, मुख्यरूप से क्रियायोग का निरूपण तथा आगम का सारा लक्षण स्वमुख से श्रीकृष्ण
बताएँगे। श्रोतागण उस कथा की ओर ध्यान दें। आत्मानन्द के मेघ गुरु जनार्दन ने इस प्रकार ज्ञानबोध से एकनाथ
को तृप्त किया।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धव संवादे एकाकार टीकायां
ऐलगोतोपाख्यान नाम षड् विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
सत्ताईसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप सहज आत्मस्वरूप देव ! तुम्हें नमस्कार है। तुम विश्वात्मा होते हुए चतुर्भुज हो। अष्टभुज
भी तुम्हीं हो और विश्वभुज अर्थात् अनंतभुज भी तुम्हीं हो। तुम्हारा मैं गुरुत्व से ही गौरव करता हूँ। अपने शिष्यों
के भावार्थ गुरु के नाम से अभय देने वाले तुम्हीं हो। अभय देकर संसार दुःख का निवारण करने वाले तुम्हीं हो।
जन्म-मरण का निवारण कर तुम स्वयं स्वयं से ही मिलन करते हो। अतः गुरु और शिष्य इन नामों से तुम्हारा
ऐक्य मालूम होने लगता है। यह ऐक्य दृष्टि को दिखायी पड़ते ही एकनाथ और जनार्दन ये एकरूप ही हो जाते
हैं। सारी सृष्टि गुरुत्व से भर कर सारा संसार स्वानंद से विचरने लगता है। ऐसा वह स्वानंदैक्य चिद्धनस्वरूप
जगद्गुरु जनार्दन है। उस जनार्दन को शरण जाकर एकनाथ ने अपनी एकता दृढ़ की। यह दृढ़ हुआ ऐक्य भी
सद्गुरु ही बन गया। तब एकनाथ और जनार्दन एक हो जाने के कारण 'मैं' पन 'तू'पन समाप्त हो गया। इस
प्रकार अकेले एक होते हुए भी एकनाथ को जनार्दन ने कवि बना दिया। तब उसे एकादश के गहरे एकत्व का
सहज ही बोध हो गया। उसी ऐक्य की सच्ची स्थिति राजा पुरुरवा को भी प्राप्त हो गयी थी ओर सत्संग से
उसका यह अनुताप, विरक्ति और भगवद्भक्ति दृढ़ हो गयी। यह बात छब्बीसवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने अपने ही
मुख से बतायी। सत्संग से भगवद्भक्ति होती है और उससे साधकों को विरक्ति के बिना ही पूर्ण वैराग्य प्राप्त होता
है। भगवद्भक्ति किये बिना विरक्ति कभी उत्पन्न नहीं होगी और साधकों को विरक्ति के बिना भगवत्प्राप्ति कल्पांत
में भी नहीं होगी। ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा; उसे पूरी तरह मन में रखकर उद्धव भगवद्भक्ति, पूजा विधान और उसके
क्रियायोग पूछ रहा है।
उद्धव उवाच
क्रियायोगं समाचक्ष्व भवदाराधनं प्रभो।
यस्मात्त्वां ये यथार्चन्ति सात्वताः सात्वतर्षभ॥ १॥
अपने भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये तुम सत्वमूर्ति अनंत हो, तुम्हारा पूजन तुम्हारे सात्विक भक्त किस
विधि से करते हैं? वह साधु का आराधन और क्रियायोग से तुम्हारा पूजन किस प्रकार होता है? मुझ पर कृपा
करते हुए मुझे वह सब बतायें। आप कहेंगे कि यह तुम किसी से पूछो, तो वह मुझसे नहीं होगा। तुम्हें छोड़कर
दूसरे के पास जाने में मुझे लज्जा लगती है। जीव भाव से मैं तुम्हारा दास हूँ, तुम्हारे स्वामित्व के सामर्थ्य पर मैं
कलिकाल की भी चिन्ता नहीं करूँगा। यह तुम्हारी कृपा का ही प्रभाव है। तुम कृपा से युक्त कृपालु हो; कृपा से
ही तुम भक्तों के भक्त बनते हो। तुम्हारे उन्हीं चरणों का मैं दास हूँ। इसलिये तुम्हारे सान्निध्य के कारण स्वयं
गूढार्थ पूछता हूँ। तुम पूछोगे कि इतने आदर से पूजा प्रकार क्यों पूछ रहे हो? तो वह प्रश्न अन्य बड़े लोगों ने भी
पूछा है। तो मैं उसे बताता हूँ, सुनो।
एतद् वदन्तिम्युनयो मुहुर्निःश्रेयसं नृणाम्।
नारदो भगवान् व्यास आचार्योऽङ्गिरसःसुतः ॥ २॥
प्राचीन वेदविचारनिष्ठ बड़े-बड़े देवतागण, महान ऋषि, अत्यन्त श्रेष्ठ विचारकों ने भी यही बात स्पष्ट रूप
७१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
से कही है। सत्यवती का पुत्र, व्यास, साक्षात् नारायण जिसने वेद का अर्थ स्पष्ट किया है और जो महाकवि के
रूप में प्रसिद्ध है, वह समस्त पुराणों का कर्त्ता है और जिसके कारण 'सारा संसार व्यासोच्छिष्ट है' ऐसा कहा
जाता है, उसने भी भगवत्पूजा के मार्ग तथा इस क्रियायोग का प्रतिपादन किया है। इनकी तो बात ही छोड़ो
लेकिन सारे संसार के दादा, विष्णु के पुत्र ब्रह्मदेव ने भी यही विचार दृढ़ किया है।
निःसृतं ते मुखाम्भोजाद् यदाह भगवानजः ।
पुत्रेभ्यो भृगुमुख्येभ्यो देव्यै च भगवान् भवः ॥ ३ ॥
तुमने कल्प के प्रारम्भ में यही पूजाविधि पुत्र बुद्धि से स्वयं ब्रह्मदेव को बतायी है। उसने भी स्वयं कल्प
के पूर्व नाभिकमल में बैठकर भृगुकश्यपादि पुत्रों को भी यह पूजाविधान बताया है। श्री महादेव ने भी स्वयं यह
क्रियायोग विधि विधान भक्तिभाव से पार्वती को एकान्त में निरूपित किया है।
एतद् वै सर्ववर्णानामाश्रमाणां च सम्मतम् ।
श्रेयसामुत्तमं मन्ये स्त्रीशूद्राणां च मानद ॥ ४ ॥
हे दीनोद्धारा ! इस प्रकार दीनोद्धार के लिये तुमने यह श्रेष्ठ परम्परा शुरू की है। तुम सचमुच दीनों के प्रति
दयालु हो। अतः उसका भी विचार सुनो। आश्रमधर्म और विधि विधान इनके अधिकारी ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य हैं।
विधिविधान में त्रुटि होने से उन्हें दोष लगता है। इसलिये ब्राह्मण कर्मों में व्यस्त रहते हैं। लेकिन तुम्हारा भजन
वैसा नहीं है। भजन का अधिकार सबका है। भजन दीनों का पूर्णरूप से उद्धार करने वाला है। उसने स्त्रियों का
और शूद्रों का उद्धार किया है। उत्तमोत्तम लोग कर्म में व्यस्त रहते हैं और अधमाधमों का भी भजन उद्धार होता
है। भजन सभी के लिये सुगम है। भजन से स्वधर्म का सार्थक होता है। भजन की महिमा अपूर्व है। उसके योग
से अधम को भी उत्तमोत्तम पद प्राप्त होता है और जो उत्तम होते हुए भजनहीन रहते हैं, वे स्वयं अधमाधम हो
जाते हैं। सभी वर्णों के और आश्रमों के लोगों को भगवद्भजन से ही सद्गति प्राप्त होती है। यही भक्ति का रहस्य
है और इसे निष्काम भक्त ही जानते हैं। भक्त भगवद्भक्ति करके ही स्वयं भगवद्रूप होते हैं, इसीलिये हे श्रीकृष्ण !
तुम भक्तों को अत्यन्त प्रेम से सम्मान देते हो। तुम्हारा भजन-पूजन करने से तुम अपने भक्तों को तारते हो, तुम्हीं
भक्तों के सम्मानदाता बनते हो, अतः तुम्हारी पूजा की कथा (विधानतः) मुझे बतायें।
एतत्कमलपत्राक्ष कर्मबन्धविमोचनम् ।
भक्ताय चानुरक्ताय ब्रूहि विश्वेश्वरेश्वर ॥ ५ ॥
हे कमलनाथ नारायण ! हे भक्तविश्राम कमलवदन श्रीकृष्ण ! मेरी विनती सुनें। तुम्हारा कृपादृष्टि से देखना
ही पर्याप्त है, तत्काल कर्मबन्धन की गाँठें खुल जाती हैं। भक्तों को स्वानंद की पुष्टि मिलती है। जिस प्रकार घृत
की कड़ाही को सूर्य के किरण एक ही क्षण में पिघला देते हैं, उसी प्रकार हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारा कृपावलोकन
कर्मबंधन का निवारण ही कर देता है। जिस प्रकार नमक का बड़ा पर्वत भी समुद्र में घुल जाता है, उसी प्रकार,
श्रीकृष्ण ! तुम्हारी कृपा कर्मबन्धन को भस्म कर देती है। जिस प्रकार सूर्योदय हो जाने के बाद जुगनूँ दिखायी
नहीं पड़ता उसी प्रकार तुम्हारी कृपादृष्टि पड़ते ही, कर्माकर्म से छुटकारा मिल जाता है। अन्धकार में करोड़ों
जुगनूँ चमकते हैं उसी प्रकार अज्ञान में कर्मों का आडम्बर फैलता है। तुम्हारे कृपारूपी सूर्य का साथ मिलते ही
कर्म बेचारे कर्महीन हो जाते हैं। ऐसी निष्कर्म कृपा से युक्त होकर तुम्हारे भक्त विचरण करते हैं और वे विषय के
प्रति सदा विरक्त रहकर हरिचरणों के प्रति ही अनुरक्त रहते हैं। इसके अलावा तुम्हारी पूर्ण कृपा का स्थान ही जो
सत्ताईसवाँ अध्याय ७१७
तुम्हारी पूजा का विधान है उसके सम्बन्ध में कृपया मुझे बताएँ। मैं तुम्हारा अत्यन्त दीन बालक हूँ। शायद तुम
कहोगे कि यह जानने का मेरा अधिकार नहीं है। लेकिन हे श्रीकृष्ण, मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ और दूसरी बात
यह है कि तुम्हारे यहाँ शरणागत की उपेक्षा नहीं होती है। तुमने जटायु-संपाती-गजेन्द्र आदि पशु-पक्षियों का
उद्धार किया है। तुमने गणिका और वेश्या का भी उद्धार किया है। हे कृपालु ऋषिकेशी वही कृपा तुम मुझ पर
भी करो। शायद तुम कहोगे कि सृष्टि में ब्रह्मदेव, शंकर आदि सबके होते हुए मुझे ही कहने की श्रद्धा तुम्हारे मन
में कैसे उत्पन्न हुई ? तो उसका कारण भी बताता हूँ। ब्रह्मदेव संसार का निर्माणकर्त्ता होते हुए भी वह आत्मस्वरूप
भूल गया इसीलिये वह तुम्हारा ही पुत्र बनकर तुमसे आत्मज्ञान सीखा। शंकर ने भी तुम्हारे चरणों की तीर्थ-गंगा
को अपने मस्तक पर धारण कर, तथा सदासर्वदा तुम्हारे ही नाम का जप कर, सचमुच तुम्हारी की कृपा के
कारण उन्होंने आत्मस्वरूप प्राप्त किया। इस प्रकार तुम ज्ञान के निधि हो तथा पूर्णबोध के सागर हो। इसलिये
जिससे आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है वह पूजाविधि मुझे बताओ। ऐसे भक्त के भाषण से संतोष प्राप्त करने
वाले, पूर्ण निजबोध से द्रवित होने वाले तथा आत्मकृपा से विह्वल श्रीकृष्ण ने क्या कहा?
श्रीभगवानुवाच
न ह्यन्तोऽनन्तपारस्य कर्मकाण्डस्य चोद्धव।
संक्षिप्तं वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥६॥
जिसका वचन सुनते ही वेदवाणी मौन हो जाती है, जिसका स्मरण करते ही मन अपना मनं पन भूलता है,
जो वेदार्थ का प्रकाशक, जो सूर्य का भी आदिसूर्य, वह यदुनायक श्रीकृष्ण उद्धव को अपने मुख से बताने लगा।
वेद और शास्त्रों ने मेरी पूजा की जो विधि बतायी है, उसे यदि विस्तार से बताने लगूँ तो वह अनन्त और अपार
है। ब्रह्मादिक देवता भी उसका पार नहीं पा सकेंगे। उद्धव ! सुनो। मैं देवाधिदेव यदि बताने भी लगूँ तो पूरा विधि
विधान मैं भी नहीं बता पाऊँगा। कोई कितना ही ज्ञानसम्पन्न क्यों न हो लेकिन पूजाविधि का विधान बताने का
सामर्थ्य कभी भी किसी में नहीं हो सकता। इसलिये वेदशास्त्र का सार तत्त्व लेकर तुम्हें संक्षेप में बताऊँगा।
पूजाविधि का सार वैदिक, तांत्रिक और मिश्र इन तीन प्रकार का है। विधि प्रक्रिया के अनुसार उनके विभागों के
बारे में सुनो।
वैदिकस्तान्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधो मखः।
त्रयाणामीप्सितेनैव विधिना मां समर्चयेत् ॥७॥
वेद के ही मंत्र और वेद की ही विधि लेकर मेरी यथासाङ्ग पूजा करना 'वैदिक मार्ग' है। अब आगम,
प्रयोग के बारे में भी सुनो। आगम के ही मंत्र और आगम की ही विधि लेकर मेरी पूजा आगमोक्त रीति से करने
का ही नाम है 'तंत्रमार्ग'। अब मिश्रविधि के सम्बन्ध में भी सुनो। वेद के मंत्र और तंत्र की विधि को लेकर पूजा
करना, इसी का नाम है 'मिश्रमार्ग'। इन तीन प्रकार की विधियों से मेरी यथासाङ्ग पूजा करना, यही मेरा तीन
प्रकार का याग है। इसके योग से मैं श्रीकृष्ण संतोष प्राप्त करता हूँ और सपरिवार साथ में खड़ा रहता हूँ। इस
प्रकार मेरा भजन तीन प्रकार का है। इनमें से जिस पर जिसकी पूर्ण श्रद्धा हो, उस विधि से उसे पूजा करनी
चाहिये। भक्ति से किये जाने पर मुझे प्रत्येक विधि में समान रूप से तृप्ति होती है। भक्तिभाव से जो मेरा पूजन
होता है, उससे मैं जनार्दन अत्यन्त तृप्त होता हूँ। यह आगमोक्त यज्ञ है और तीनों लक्षण समान हैं। वैदिकादि तीन
प्रकारों से मेरा पूजन करने पर मैं श्रीकृष्ण तृप्त होता हूँ। अब पूजा के अधिकार के सम्बन्ध में भी बताता हूँ। सुनो।
७१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यदा स्वनिगमेनोक्तं द्विजत्वं प्राप्य पूरुषः।
यथा यजेत मां भक्त्या श्रद्धया तन्निबोध मे ॥ ८ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये द्विजन्मा तीन वर्ण, इनके अधिकारों का लक्षण इस प्रकार है—गर्भ से आठवें
वर्ष में उपनयन करना यह पूर्ण अधिकार ब्राह्मण का है। क्षत्रियों का शुद्ध अधिकार यह है कि उन्हें बारहवें वर्ष
में व्रतबंध करना चाहिये तथा वैश्यों को सोलहवें वर्ष में व्रतबन्ध करना चाहिये। गायत्री मंत्र के उपदेश के साथ
उपनयनविधि करना यह दूसरा जन्म है इसे 'सावित्री जन्म' कहते हैं। तीनों वर्णों के लोग द्विजन्मा होने के कारण
वेदोक्त विधि के लिये उपयुक्त हैं। उद्धव इसी का नाम वेदोक्त अधिकार लक्षण है। अब मेरे प्रिय भक्त उद्धव!
मेरी पूजाविधि का स्थान बताता हूँ, सुनो।
अर्चायां स्थण्डिलेऽग्नौ वा सूर्ये वाप्सु हृदि द्विजे।
द्रव्येण भक्तियुक्तोऽर्चेत् स्वगुरू माममायया ॥ ९ ॥
मेरी पूजा करने के स्थान आठ प्रकार के हैं। उनके लक्षण ध्यान से सुनो। जो 'प्रतिभा' हमें प्रिय हो वह
मेरी पूजा का पहला स्थान है। जमीन पर स्थंडिल (मिट्टी का चौकोर चबूतरा) बनाकर पूजा करना दूसरा
स्थान है। 'अग्नि का तेज' मेरा ही स्वरूप है, अतः वह मेरी पूजा का तीसरा स्थान है और 'सूर्यमण्डल' में
जो पूजा करते हैं वह मेरा चौथा पूजास्थान है। 'उदक' में मेरा पूजन करना पाँचवाँ पूजास्थान है और 'हृदय'
में मेरा आवाहन करना छठवाँ पूजास्थान है। शालिग्राम मेरा अचेतन स्वरूप है तथा 'ब्राह्मण' मेरा सचेतन
स्वरूप है। वह अखण्ड पूर्ण परब्रह्म ही है। इसलिये उनकी सम्मानपूर्वक षोडशोपचार पूजा करनी चाहिये।
ब्राह्मणों के प्रति जिसकी ब्रह्मभावना होती है उसे अत्यन्त भाग्यवान समझना चाहिये। वह ब्रह्मादिकों को भी
पूज्य है। इतना ही नहीं बल्कि मैं देवाधिदेव भी उसे वंदन करता हूँ सभी पूजनीयों में मुख्यरूप से ब्राह्मण
पूज्य हैं। उद्धव! वही मेरा अत्यन्त श्रेष्ठ सातवाँ पूजास्थान है। इन समस्त पूजनीयों में पूज्यत्व की दृष्टि से
पूजा करने योग्य, वरिष्ठों में भी अति वरिष्ठ, जो मेरा आत्मा ही है वह 'गुरुराजा' सबको वन्दनीय है।
सद्भाव से जिसके चरण छूने से मैं पूर्णब्रह्म सुखी होता हूँ, उसका मद्रूप से स्तवन करने से मुझ परमात्मा को
अत्यन्त उल्हास होता है। सद्गुरु का नामस्मरण भयंकर संसारभय का निवारण करता है। जन्म-मरण का
निराकरण कर निजात्मबोध से पूरी तरह तृप्त कर देता है। मैं परमात्मा नारायण गुरुरूप से प्रकट होकर शिष्य
के द्वारा परब्रह्म का पूर्णत्त्व प्रकाशित करता हूँ। ब्रह्म का परब्रह्मत्त्व सद्गुरु के कारण ही सत्य होता है। गुरु
की महिमा इतनी अगाध और गहन है। सारांश, सद्गुरु ज्ञानधन हैं तथा हरिहर के लिये भी पूर्णरूप से
वन्दनीय हैं। सद्गुरु मेरा सत्स्वरूप अधिष्ठान है तथा आठवाँ पूजास्थान है। उद्धव! मेरे इस आठवें पूजास्थान
का अखण्ड स्मरण रखने से उस स्मरण से ही मेरी पूजा हो जाती है। इस प्रकार इन आठ पूजास्थानों के बारे
में उत्तम लक्षणों से युक्त जानकारी तुम्हें दी। अब उस पूजा के भिन्न-भिन्न प्रकार भी तुम्हें बताता हूँ। इन सारे
अधिष्ठानों में हमें जो सबसे प्रिय लगता हो, उसे ही पूजा का मुख्य लक्षण मानना चाहिये। उसमें भी रहस्य
की पहचान बताता हूँ, सुनो। लोकरंजन करने की प्रवृत्ति छोड़ कर, दंभ के उपाय त्याग कर, कपट का
व्यवहार न कर, सच्चे भक्तिभाव से भजनतत्पर रहना चाहिये। उद्धव! ये जो आठ पूजास्थान बताये, उनमें
निष्कपट रूप से पूजा करना यही सबसे उत्तम पूजन है। उसमें जो निष्कपट सेवा होती है, वह देवाधिदेव को
अत्यन्त प्रिय है। अब पूजा की विस्तृत विधि भी बताता हूँ। सुनो।
सत्ताईसवाँ अध्याय ७१९
पूर्वं स्नानं प्रकुर्वीत धौतदन्तोऽङ्गशुद्धये।
उभयैरपि च स्नानं मन्त्रैमृद्ग्रहणादिना ॥ १०॥
मल विसर्जन तथा दंतधावन कर प्रातःकाल मृत्तिका ग्रहणपूर्वक देहशुद्धि के लिये स्नान करना चाहिये। इस
प्रकार यह मलत्याग स्नान होने के उपरान्त वैदिक-तांत्रिक पद्धति से यथाविधि जैसी दीक्षा ग्रहण की हो उसके
अनुसार मंत्रस्नान करें। सद्गुरु का जो सम्प्रदाय हो, उसके अनुसार परम्परागत आचार का पालन करें। यथाविधि
स्नान कर निर्मल भाव धारण करें।
संध्योपास्यादिकर्माणि वेदेनाचोदितानिमे।
पूजां तैः कल्पयेत् सम्यक् संकल्पः कर्मपावनीम् ॥ ११॥
अपनी-अपनी वर्णाश्रम विधि के अनुसार वेद में जिस प्रकार उल्लिखित है उस प्रकार उन-उन वर्णाश्रमों
में नित्य नैमित्तिक कर्मों के साथ संध्या करनी चाहिये। वेदों के अनुसार स्वकर्म का आचरण करें। निषिद्ध कर्म
और काम्य कर्म का पूर्णरूप से बहिष्कार करें। इसी का नाम है शुद्ध स्वकर्म और उत्तमोत्तम अधिकार। वेदों में
वर्णित स्वकर्म का त्याग करना यही मुख्य रूप से अत्यन्त अधर्म है। परब्रह्म प्राप्त होने पर, कर्म का त्याग किये
बिना ही कर्म अपने आप बन्द हो जाता है। स्वयं ही स्वधर्म का त्याग करना यही अधर्म का मुख्य लक्षण है।
स्वधर्म से चित्त की शुद्धि करनी होती है और इसीलिये अहंता का त्याग करना होता है। इस प्रकार स्वधर्म कर्म
करते समय मन में ऐसा भाव उत्पन्न होता है कि इसमें मैं कर्मकर्त्ता भी नहीं हूँ और फलभोक्ता भी नहीं हूँ। देह
जड़, गूढ़ और अचेतन है। उसे जनार्दन चेतना देता रहता है। उसमें मेरा 'मैं' अथवा मेरा कर्तापन प्रवेश नहीं
करता। ऐसी बुद्धि से किया हुआ कर्माचरण भक्ति के कारण ब्रह्मार्पण ही होता है। इस प्रकार साधकों को मेरी
अभिमानरहित उपासना का लाभ मिलता है। अस्तु ! मेरी प्रतिभा का पूजाविधान यही मेरा प्रथम पूजास्थान है। वे
प्रतिमाएँ कैसे बनायी जाएँ उसके लक्षण बताता हूँ, सुनो।
शैली दारुमयी लौही लेप्या च सैकती।
दनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टधि स्मृता ॥ १२॥
प्रतिमाएँ आठ प्रकार की होती हैं, उनकी पूजा करने से वे तत्काल कल्याण करती हैं। गंडकी नदी में प्राप्त
शालिग्रामादि 'शिला की मूर्ति'—देवदार, मंदार अथवा ब्रह्मकाष्ठ (पीपल) आदि, 'लकड़ी की मूर्ति' अथवा
सुवर्णादि 'धातुओं की मूर्तियाँ' साधकों को तत्काल लाभ प्रदान करती हैं। उसी प्रकार मिट्टी, कपड़ा आदि की
लेप्य मूर्ति तैयार करते हैं, उन्हे लेप्या कहते हैं और कुछ लोग अत्यन्त भक्ति से स्थंडिल पर भी प्रतिमा का चित्र
बनाते हैं। उन्हें लेख्या मूर्ति कहते हैं। बालू की मूर्ति बनाते हैं, उसे 'सिकतामूर्ति' कहते हैं। वह भी सुवर्ण की
मूर्ति की ही तरह पूजनीय है। रत्नों की सुन्दर मूर्ति, हीरे की मूर्ति, मरकत की मूर्ति, नीलमणि की, पद्मराग की
अथवा मोती की मूर्ति भी अत्यन्त पूज्य है। सभी मूर्तियों में जो अत्यन्त श्रेष्ठ है, वह है मनोमय मूर्ति। वह
अत्यन्त पवित्र है। उसकी उपासना करने से साधकों को अत्यन्त समाधान प्राप्त होता है। अब उन प्रतिमानों का
पूजाविधान तथा चल-अचल लक्षण आदि का निरूपण भी श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
चाललेति द्विविधा प्रतिष्ठा जीवमन्दिरम्।
उद्वासवाहने न स्तः स्थिरायामुद्धवार्चने ॥ १३॥
७२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अचेतन को चेतनता देने वाला, जड़ को जीवत्व देने वाला- 'जीवत्व का अर्थ है चिन्मात्रत्त्व' उसे ही
परमेश्वर समझना चाहिये। शुद्ध भक्तिभाव से निर्मित जीव का निज मन्दिर-अर्थात् आगमशास्त्र की सम्मति से
स्थापित स्थावर-जंगम प्रतिमा समझनी चाहिये। साधक यदि 'स्थावर' मूर्ति का पूजन करता है तो उसका
आवाहन या विसर्जन नहीं करना पड़ता। उसमें अधिष्ठान स्वयंभू रहता है।
अस्थिरायं विकल्पः स्यात् स्थण्डिले तु भवेद् द्वयम्।
स्नपन्नंत्वविलेप्यायामन्यत्र परिमार्जनम्॥ १४॥
'जंगम' प्रतिमाओं में भी किसी में आवाहन विसर्जन रहता है और किसी में नहीं रहता। शालिग्राम की
मूर्ति में मेरा स्वयंभू अधिष्ठान ही रहता है। इसलिये इसमें आवाहन या विसर्जन की आवश्यकता नहीं रहती।
शालिग्राम का टूटा-फूटा टुकड़ा भी जिसके पास पूजा में हो वहाँ निज सखा परमात्मा सदा सर्वकाल विद्यमान
रहता है, ऐसा समझना चाहिये। इसके अतिरिक्त अन्य जंगम अर्थात् चलमूर्ति हैं जिन पर आवाहन और विसर्जन
लागू है। उसे निष्ठापूर्वक करना चाहिये। यही आगमोक्त विधि विधान है। स्थंडिल पर बनायी हुई मूर्ति का
आवाहन करें और पूजा होते ही उसका विसर्जन करें। ये दो प्रकार के भावना विधान स्थंडिल पर करना
आवश्यक है। हृदय में स्थित चिद्धन परमात्मा का ही मूर्ति में आवाहन करें और पूजा होने के बाद उसका
विसर्जन कर उसे पुनः हृदय में धारण करें। इसमें, हम स्वयं ही परिपूर्ण ब्रह्म हैं इसका निजस्मरण होने के लिये
ही आवाहन विसर्जन करना होता है। इसके द्वारा साधक को आत्मस्वरूप का स्मरण होता रहता है। आगम शास्त्र
का गूढ़ार्थ यही है कि हम स्वयं ही देवता हैं और स्वयं ही अपने पूजक हैं। इस प्रकार अपनी पूजा में अपने ही
आत्मस्वरूप की पहचान होती हे। स्वयं देव बनकर ही देवता की पूजा करें, यही आत्मस्वरूप का प्रिय खाद्य है
जिसे उपासना काण्ड के रूप में श्रीकृष्ण ने उद्धव को दिया है। आत्मस्वरूप का यह माधुर्य यदि पग-पग पर न
मिले तो उपासना का शुष्क प्रयास कौन करेगा ? यही आगमशास्त्र का गूढ़ रहस्य है। हे उद्धव ! इससे साधक
पग-पग पर सुख-सम्पन्न होकर स्वयं ही चिद्धन बन जाते हैं; ऐसी यह उपासना है। कृष्ण का यह भाषण सुनकर
उद्धव आनन्द से ओतप्रोत हो गया, उसने श्रीकृष्ण के पैर पकड़ लिये और वह निरूपण साद्यंत सुनने की इच्छा
प्रकट की। इस पर श्रीकृष्ण बोले, रुको, यह आगमोक्त गूढ़ साधकों को मेरी कृपा के बिना प्राप्त नहीं होगा। यह
अत्यन्त गहन है। यह मेरा गुप्त धन है। अस्तु ! हे उद्धव ! तुमने पूजा का विधान पूछा था, उसे ध्यानपूर्वक सुनो।
'लेप्या' और 'लेख्या' मूर्तियों को स्नान नहीं कराना चाहिये। अन्य मूर्तियों को यथाविधि स्नान कराना चाहिये।
द्रव्यैः प्रसिद्धैर्मद्यागः प्रतिमादिष्वमायिनः।
भक्तस्य च यथालब्धैर्हृदि भावेन चेवहि ॥ १५ ॥
पूजक यदि सकाम अर्थात् फल की इच्छा करने वाला हो तो पूजा साहित्य यथाविधि रहना चाहिये। पूजा
साहित्य में यदि कमी होगी तो फल भी निर्व्यंग नहीं मिलेगा। भक्त निष्काम हो और उसे पूजा में लगाव हो तो
उसे पूजा साहित्य का कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा क्योंकि भगवान को उपचार की अपेक्षा भाव ही अधिक प्रिय रहता
है। ऐसे समय अनायास जो कुछ भी मिल जाय उसमें भगवान सन्तुष्ट रहता है। वही पूजायोग यथोचित है।
निष्काम वृत्ति हो तो फल, मूल, दूब अथवा निर्मल जल इतने से ही अर्थात् सद्भाव से ही पूरा पूजायोग सफल
होता है। जहाँ मेरा भाव दृढ़ रहता है, वहाँ अन्य उपचारों की क्या प्रतिष्ठा है ? भक्तों का भाव ही मुझे प्रिय
लगता है, इससे मेरे भक्त को भी महासुख का लाभ होता है। जो भी बाह्योपचार किये जाते हैं वे सब प्रतिमा मूर्ति
सत्ताईसवाँ अध्याय ७२१
की पूजा में ही लगते हैं, मानस पूजा में तो इन उपचारों की कोई आवश्यकता नहीं है। वहाँ मन ही मेरी मूर्ति
रहती है और उपचार का साहित्य भी मनोमय ही रहता है। लेकिन यह उपचार सम्पत्ति भी वे मुझे निर्लोभ होकर
अर्पित करते हैं। इससे मैं श्रीपति सन्तुष्ट होता हूँ। अस्तु ! प्रतिमा आदि को लेकर आठ पूजास्थान हैं, उनका भी
यथोचित पूजा विधान तुम्हें बताता हूँ। तो सुनो, उद्धव !
स्नानालंकारणं प्रेष्ठमर्चायामेव तूद्धव।
स्थण्डिले तत्त्वविन्यासो वह्नावाज्यप्लुतं हविः ॥ १६ ॥
सूर्ये चाभ्यर्हणं प्रेष्ठं सलिले सलिलादिभिः।
प्रतिमामूर्ति यह एक पूजास्थान है। उस मूर्ति को जो महाभिषेक करते हैं, उसी को 'स्नान' कहते हैं। मुकुट
आदि सभी अलंकार मूर्ति को पहनायें। जो पदार्थ अत्यन्त अच्छे लगते हों अथवा जो अत्यन्त मूल्यवान अलंकार
हों उन्हें लेकर उनसे श्रद्धापूर्वक श्रीहरि की पूजा करनी चाहिये। स्नान, भोजन, अलंकार आदि सर्वोपचारों के
साथ यथाविधि पूजा करना यही प्रतिमा पूजा का ढंग है। अब स्थंडिल के बारे में सुनो। स्थंडिल पर जो
पूजास्थान होता है, वहाँ तत्त्वों का ध्यान लगाकर उस पर तत्त्वविन्यास का लेखन करना चाहिये। यही उसका
पूजा विधान है। आत्मतत्त्व आदि के विचारों का स्थंडिल पर विचार कर हृदय, मस्तक, शिखा, कवच, नेत्र,
अस्त्र आदि उस पर बनाकर उनका दिशाबन्धन कर पूजा करनी चाहिये। अग्नि की जहाँ पूजा करनी हो, वहाँ
मेरा ध्यान कर घृतपूर्ण आहुति देकर होम करना यही अग्नि का पूजाविधान है। अग्नि देवताओं का मुख है इस
श्रद्धा से हविर्द्रव्य का हवन करना यही 'अग्निपूजन' है। सूर्य में प्रकाशमान होने वाला मंडलात्मा जो सूर्यनारायण
है, उसका सौर मंत्रों से पूजन एवं स्तवन करें। यही सूर्य का पूजाविधान है। श्रुति के अर्थ का विचार करने पर
'आप' अर्थात् जल साक्षात नारायण स्वरूप ही है। उसका यथोचित पूजा विधान है जल में ही जल का तर्पण
करना। 'हृदय' में मेरा जो पूजास्थान है, वहाँ मन से ही मन की पूजा की जाती है। मूर्ति भी मनोमय और
पूजाविधि भी मानसिक। मेरा मुख्य अधिष्ठान है, ब्रह्ममूर्ति ब्राह्मण। उनका दासत्व से आज्ञापालन करना यही
उनका पूजाविधान है। ब्रह्मा को भी जिससे ब्रह्मत्व प्राप्त होता है, वह 'सद्गुरु' तो मेरे सबसे श्रेष्ठ और पवित्र
पूजास्थान है। उसका पूजन इस प्रकार है—स्वयं जीवप्राण से उसकी अनन्य शरण में जाना और उसके वचन पर
प्राण न्योछावर करना। गुरु की छोटी से छोटी सेवा भी चाहपूर्वक करना यही उसकी पूजा का विधान है। इसी से
साधकों को सच्चा सुख प्राप्त होता है। सद्गुरु की सेवा करने से ब्रह्मसायुज्य प्राप्त होता है। गुरुसेवा से श्रेष्ठ
अन्य कोई साधन है ही नहीं। सद्गुरु का स्वरूप यह अखण्डपूर्ण ब्रह्म है। उसका आवाहन और विसर्जन कभी
नहीं करना चाहिये। सम्पूर्ण निष्कपट भाव से जो सद्गुरु की शरण में जाता है, उसका चरण मैं भी वन्दन करता
हूँ। वह इतना धन्य है। निर्लोभ भाव से सहज पूजा करने से भगवान को संतोष होता है। उसी भाव का रहस्य
श्रीकृष्ण बताते हैं।
श्रद्धयोपाहतं प्रेष्ठं भक्तेन मम वार्यपि ॥ १७ ॥
भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते।
गन्धो धूपः सुमनसो दीपोऽन्नाद्यं च किं पुनः ॥ १८ ॥
जो मेरे प्रति अत्यन्त प्रेम और श्रद्धायुक्त अनन्य भक्ति से मुझे केवल उदक अर्पण करते हैं, उससे भी मैं
श्रीपति सन्तुष्ट होता हूँ। वह जलबिन्दु मैं आदिपुरुष अत्यन्त प्रेम से मुख में ग्रहण करता हूँ और मूलतः सुख
७२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वरूप होते हुए भी भक्तकाम के हर्ष से अधिक सुखी होता हूँ। त्रैलोक्य मुझसे सुख प्राप्त करता है, ऐसा सुख
का सागर होते हुए भी, भक्त का उदक पीने से मुझे परम सन्तोष होता है। उस जलबिन्दु से प्रिय मुझे मेरी सुन्दर
लक्ष्मी भी नहीं लगती; ब्रह्मदेव मेरा अपना पुत्र है लेकिन वह भी मुझे उतना अच्छा नहीं लगता। भक्तों के जल
बिन्दु के सामने मुझे मेरा वैकुण्ठ भी फीका लगता है। शेष पर शयन करने का सुख भी उसके आगे हलका
मालूम होता है। भक्तों के उदक के सामने मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता; तिस पर गंधादि के साथ पूजा की,
षड्रस का नैवेद्य मिला। उस पूजा के सुख की त्रिभुवन में कोई उपमा ही नहीं है। भक्तों की भक्ति से मैं श्रीपति
इतना अधिक सुखी होता हूँ। भाव के साथ भक्ति कर स्वयं कृतकृत्य होने का जिसका निश्चय रहता हे उसी के
उदक से मैं तृप्त होता हूँ। अन्य जो ढोंगी भक्त मन में धन की आशा तथा बाहर विरक्ति का ढोंग करता है, लोगों
में प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये मेरी भक्ति प्राप्त करता है, ऐसा अभक्त मुझे छत्र, चामर अथवा गजान्त लक्ष्मी भी
अर्पण करता है तो भी मेरे चित्त में सुख का संचार नहीं होता। दूध और पानी को अलग करने वाले राजहंस के
सामने यदि धुनकने के लिये रुई रखी जाय तो उसे जिस प्रकार संतोष नहीं होता, उसी प्रकार अभक्तों के भजन
पूजन से मुझ हृषीकेश को संतोष प्राप्त नहीं होता। कौओं की गायनकला देखकर जिस प्रकार किन्नरों को संतोष
नहीं होता, उसी प्रकार अभक्तों की भजन लीला देखकर मेरी ज्ञानकला को संतोष नहीं होता। रजस्वला स्त्री द्वारा
बनाया गया पकवान कितना ही उत्तम क्यों न हो लेकिन वह अत्यन्त अमंगल होता है, उसी प्रकार अभक्तों के
भजन को जनार्दन कभी स्पर्श नहीं करता। जिस भजन को नारायण स्पर्श नहीं करता, ऐसे अभक्त के भजन से
जनार्दन को जरा भी संतोष नहीं होता। इस प्रकार भक्त और अभक्त के मार्ग और उनके अधिकार के क्षेत्र बतला
दिये। अब श्रीकृष्ण साद्यंत पूजामार्ग ही बता रहे हैं।
शुचिःसम्भृतसम्भारःप्राग्दर्भैः कल्पितासनः।
आसीनः प्रागुदग् वार्चेदर्चायामथ सम्मुखः॥१९॥
शरीर शुद्धि का स्नान हो जाने के बाद वैदिक तांत्रिक मंत्रस्नान करें तथा नित्यकर्म पूरा करें। इसका नाम है
'शुचिर्भूत' होना। इसके उपरान्त देवपूजा की सामग्री खोज कर उसे पवित्र करें और फिर गंधादिक पूजा सामग्री
यथास्थान रखें। श्वेत कम्बल, मृगचर्म और पूर्वाभिमुख दर्भाग्र आसन बिछाकर उस पर पूर्वाभिमुख अथवा
उत्तराभिमुख होकर बैठें। स्थावर मूर्ति की पूजा करते समय अपना आसन मूर्ति के सामने बिछाएँ। यह निर्दोष
आसनविधि है। अब पूजान्यास आदि के बारे में श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
कृतन्यासः कृतन्यासां मदर्चां पाणिनामृजेत्।
कलशं प्रोक्षणीयं च यथावदुपसाधयेत्॥२०॥
इस प्रकार विधिपूर्वक आसन बिछाकर गुरु को प्रणाम करें; परमगुरु (गुरु के गुरु) तथा परमेष्ठी गुरु
(परमगुरु के गुरु) का भी प्रेमपूर्वक अभिनन्दन करें। गुरु से जो मंत्र मिला हो उस मंत्र का देह पर न्यास करें।
कलश और प्रोक्षण पात्र (पंचपात्र आदि) को उचित स्थान पर रखकर, उसे जल से भरकर, उसमें दूब, चन्दन
आदि पूजाद्रव्य डालें।
तदद्भिर्देवयजनं द्रव्याण्यात्मानमेव च।
प्रोक्ष्य पात्राणि त्रीण्यद्भिस्तैस्तैर्द्रव्यैश्च साधयेत्॥२१॥
उस प्रोक्षण पात्र के जल में उँगलियाँ बिना डुबाये, सारी पूजा सामग्री का उस जल से दर्भ के शीर्ष से
सत्ताईसवाँ अध्याय ७२३
केवल प्रोक्षण करें। उसी से देवपूजाघर का भी प्रोक्षण करें, स्वयं प्रोक्षण कर लें तथा देवपूजा स्थान का प्रोक्षण
कर पूजा प्रारम्भ करें। पाद्य, अर्घ्य और आचमन के लिये तीन पात्र रखें और उनमें पानी भर कर तीनों पात्रों में
भिन्न-भिन्न पदार्थ डालें। श्यामाक, कमल, दूब और विष्णुकांता ये पाद्य पात्रों के शुद्ध द्रव्य हैं। गन्ध, फूल, फल,
अक्षत और दर्भाग्र ये अर्घ्य पात्रों में डाले जाने वाले शुद्ध द्रव्य हैं। इलायची, खस, जायफल, लौंग, कपूर, कंकोल
ये 'आचमनीय' पात्रों में डाले जाने वाले शुद्ध पदार्थ हैं।
पाद्यार्घ्याचमनीयार्थं त्रीणि पात्राणि दैशिकः।
हृदा शीर्ष्णाथ शिखया गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत् ॥ २२॥
जैसी गुरुमंत्र की दीक्षा हो उसके अनुसार मार्ग पकड़कर गुरु सम्प्रदाय के अनुसार, पाद्यादि तीनों पात्र रखें।
हृदय मंत्र से पाद्य दें, शिरोमंत्र पढ़कर अर्घ्य अर्पण करें तथा शिखामंत्र से आचमन करें। आगमोक्त गुरुसंस्कार
जैसा हो उसके अनुसार यह सब करें। ये तीनों पात्र स्वयं गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर देवता को अर्पण करें।
गुरुसम्प्रदाय से पवित्र हो जाने के कारण आत्मद्रष्टा तथा दीक्षा का विवेक जानने वाला जो श्रीकृष्ण है, उसने
स्वयं ही पूजक को 'देशिक' कहा है। आगमशास्त्र का निजमार्ग, भूतशुद्धि और प्राणप्रतिष्ठा का योग, इस
सम्बन्ध में श्रीकृष्ण अगले श्लोक में सब कुछ बता रहे हैं।
पिण्डे वाय्वग्निसंशुद्धे हृत्पद्मस्थां परां मम।
अण्वीं जीवकलां ध्यायेन्नादान्ते सिद्धभाविताम्॥ २३॥
वायु बीज से आवाहन कर, पिंगला नाड़ी से प्राण को पूरी तरह भर कर (दाहिनी नासिका से भीतर की
ओर श्वाँस लेकर, कुंभक से उसे रोक कर मात्रा धारण से धारण करें।) (उदाहरणार्थ—पूरक चार मात्राओं से
करने पर कुंभक १६ मात्राओं से तथा रेचक मात्राओं से करना चाहिये।) वायु को उतनी ही देर तक रोक कर
रखना चाहिये ताकि वह किसी अन्य रास्ते से न निकल जाय और फिर उसे धीरे-धीरे बाहर छोड़ना चाहिये।
ऐसा प्राणायाम करने से शरीर क्षीण हो गया है ऐसी कल्पना करें। इस प्रकार शरीर शुष्क हो गया है, ऐसी
कल्पना कर उसका दहन प्रारम्भ करना चाहिये। मूलाधार चक्र का अग्नि अग्निमंत्रों से जागृत कर और उसे देह
से लगाकर अपना देह भस्म हो गया है ऐसी कल्पना करनी चाहिये। देह अग्नि से अत्यन्त तप्त हुआ है, यह
मानकर उसे चन्द्रमा के बीज से चन्द्रामृत लाकर उससे शरीर को शीतल करना चाहिये। इसमें जिस नये देह की
कल्पना करें वह सभी इन्द्रियों से युक्त, निरोगी और कार्यक्षम हो और उसके हृदय कमल में मेरी आण्विक अर्थात्
सूक्ष्म जीवकला है यह देखें। मेरी वह जीवकला सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म है इसीलिये उसे अणुरूप (अग्नि)
कहते हैं। वही सारे संसार का विश्राम स्थल है। अकार, उकार और मकार को भी अण्वी जीवज्योति ही प्रकाशित
करती है। वह तो शब्दों से परे होने के कारण योगी लोग नाद के अंत में उसे देखते हैं। देह में वह अन्तर्बाह्य
परिपूर्ण से भरी हुई है लेकिन सूक्ष्म होने के कारण उसका आभास नहीं होता। योगी लोग उसे आसन-प्राणायाम
आदि के योग से हृदयकमल में देखते हैं। वह अणुरूपी जीवकला अव्यक्त रहती है, उसे योगी लोग आत्मनिष्ठा
से व्यक्त कर उसकी महामूर्ति का हृदय में चिन्तन करते हैं। 'नार' अर्थात् जीवसमुदाय, उसका 'आयतन' अर्थात्
आधारस्थान, वही श्रीनारायण की महामूर्ति है जिसका सज्जन लोग हृदय में चिन्तन करते हैं।
तयाऽऽत्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पूज्य तन्मयः।
आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्ताङ्गं मां प्रपूजयेत् ॥ २४॥