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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 752, कुल 869 में से

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पृष्ठ 752

७३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सुरस और मधुर है। सारे अवयवों में जिस प्रकार मस्तक श्रेष्ठ है, उसी प्रकार यह अट्ठाईसवाँ अध्याय श्रेष्ठ है।
उसमें जो भी निरूपण है वह सब शुद्ध आत्मानंद ही है। यह अट्ठाईसवाँ अध्याय मानों ब्रह्मसुख का खजाना ही है।
मजे की बात है कि श्रीकृष्ण उद्धव के पूछे बिना ही सब कुछ बता रहे हैं। उद्धव के प्रश्न किये बिना ही श्रीकृष्ण
क्यों बता रहे हैं, इसका कारण ध्यानपूर्वक सुनें। कृष्ण का भाषण सुनकर उद्धव को आत्मज्ञान हुआ और यह
ज्ञानसम्पन्न हो गया। इससे अत्यधिक ज्ञातृत्व हो जाने के कारण ज्ञानाभिमान होने की सम्भावना हुई। सारा संसार
मूर्ख है और एक मैं ज्ञाता हूँ, ऐसा जो अहंकार बढ़ता रहता है वही गुणदोषों की सर्वत्र चर्चा कराता है और जहाँ
गुणदोषों का दर्शन होता है, वहाँ ज्ञान का लोप होते-होते वह निःशेष हो जाता है। साधकों के लिये इतना अधिक
ज्ञानाभिमान बाधक है। अभिमान के कारण जहाँ सदाशिव को भी जीवदशा प्राप्त हुई वहाँ मनुष्य की क्या गति
है? अहंता से जीव को मुक्ति कैसे मिलेगी? ईश्वर भी यदि गुणदोष देखने लगे तो उसका भी नाश होगा। इस
प्रकार गुणदोषों का दर्शन साधक के लिये पूरी तरह घातक है इसलिये प्रश्न किये बिना ही श्रीकृष्ण उसका उपाय
बताते हैं। बालक को उसका हित समझ में नहीं आता अतः उसकी माँ ही निष्ठापूर्वक उसका ख्याल रखती है।
उसी प्रकार उद्धव के सच्चे हित की चिन्ता श्रीकृष्ण को थी। ज्ञानाभिमान कितना बाधक होता है, यह साधक की
समझ में नहीं आता। इसलिये प्रश्न किये बिना ही श्रीकृष्ण उसका निराकरण बताते हैं। उद्धव का जन्म यादववंश
में हुआ था और यादव तो ब्रह्मशाप से मरने वाले थे। तिस पर उद्धव को बचाने के लिये श्रीकृष्ण उसे सम्पूर्ण
ब्रह्मज्ञान बता रहा था। जहाँ देहातीत ब्रह्मज्ञान रहता है, वहाँ शाप का बन्धन बाधक नहीं होता। यह जानकर ही
श्रीकृष्ण ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने लगे। शक्कर पर बैठी मक्खी की तरह कृष्ण की प्रतिमा पर उद्धव की प्रीति
जड़ गयी थी अर्थात् उसका वह भाव एकदेशी हो गया था। कृष्ण से दूर जाने पर उद्धव सचमुच प्राण ही त्याग
देगा इसलिये उसकी एकदेशीयता समाप्त करने के लिये श्रीकृष्ण ब्रह्मसमता का पाठ दे रहा हे। एकदेशी भाव
श्रीकृष्ण को अच्छा नहीं लगा, इसलिये देवाधिदेव उसे ब्रह्मसमन्वय अर्थात् ब्रह्म की व्यापकता के बारे में बताते
हैं। उद्धव यदि कृष्ण के पास रह गया तो ब्रह्मशाप से उसकी होली हो जायगी इसलिये श्रीकृष्ण उसे ब्रह्मसुख की
समृद्धि में ले जाना चाहते हैं। उद्धव श्रीकृष्ण को छोड़कर जाने पर भी उसे वियोग की बाधा न हो ऐसा सर्वदेशी
व्यापकता का उपदेश उद्धव श्रीकृष्ण को दे रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत्।
विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च॥ १॥
निःशब्द का वह स्वच्छ शब्द; जिसके श्वासोच्छ्वास से वेदों का निर्माण हुआ, वह श्रीकृष्ण उद्धव के हित
में विशुद्ध ज्ञान बताने लगा। संसार में मुख्य रूप से तीन गुण हैं। उन गुणों के कारण लोग भी तीन प्रकार के हो
गये हैं। उनका शान्त,दारुण और मिश्र इस प्रकार का कर्म है। उस कर्म की निन्दा या स्तुति हमें कभी नहीं करनी
चाहिये क्योंकि एक के भलेपन का वर्णन करने से, उन्हीं शब्दों से दूसरे की निन्दा हो जाती है। पाँच लोगों में से
यदि हम एक की ही स्तुति करने लगें तो शेष चार की निन्दा करने जैसी बात हो जाती है। दाहिना और बायाँ ये
दो भाग होने पर भी उनसे एक ही अंग का बोध होता है; उसी प्रकार प्रकृतिपुरुषात्मक यह संसार चिद्रूप से एक
ही रूप है। संसार परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप है। इसलिये निन्दा अथवा स्तुति किसी भी प्राणी की नहीं करनी चाहिये।
सभी प्राणियों में आत्माराम है, इसलिये प्राण जाने पर भी निन्दा या स्तुति नहीं करें। उद्धव ! निन्दा स्तुति की बात