श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 753, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसदा के लिये त्याग दो, तभी तुम्हें परमार्थ साध्य होगा और निजबोध से निजस्वार्थ प्राप्त होगा। उद्धव! समस्त
प्राणिमात्र में भगद्भाव रखना यही ब्रह्मस्वरूप होने का मार्ग है। इसमें कोई धोखा नहीं है। वह भाव अब सुनो।
जहाँ से खतरे की सम्भावना हो, यदि वहीं भगवद्भावना दृढ़ता से बढ़ायी जाय, तो जो खतरा है वहीं उपाय हो
जायगा और विद्या को स्थान नहीं बचेगा। इस स्थिति को छोड़ जो 'मैं ज्ञाता हूँ' ऐसा अहंकार करेगा और निन्दा
स्तुति का आश्रय लेगा, वह अनर्थ में पड़ेगा।
परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति ।
स आशु भ्रश्यते स्वार्थादसत्यभिनिवेशतः ॥ २ ॥
मैं ही एक सर्वज्ञ हूँ, ऐसा ज्ञानाभिमान कर जो संसार के गुणदोष देखता रहता है; और मुख्यरूप से ब्राह्मण
की निन्दा करता है, दूसरे के स्वाभाविक कर्म की निन्दा करना अधर्म है। मारुति इतना बड़ा ज्ञाता था लेकिन वह
भी वानरचेष्टा से नहीं बच पाया। नारद भी बहुत बड़ा ज्ञानसम्पन्न और बड़ों के लिये भी पूज्य, लेकिन वह कलह
कराने में उद्भट था। इसलिये स्वभावधर्म अनिवार्य है, ऐसा मानना चाहिये। गरुड़ देवता का वाहन, सदा हाथ
जोड़कर भगवान के सामने खड़ा रहने वाला; लेकिन वह भी सर्प खाता है। ऐसा यह स्वाभाविक कर्म है। विकार
करने पर यह संसार त्रिगुणात्मक होने के कारण गुणों के अनुसार कर्मों का आचरण होता है। इसलिये उसमें
गुणदोष देखने पर देखने वाला ही दोषी होता है। संसार में एकात्मता ही देखी जाय यही सच्ची ब्रह्मस्थिति है। इसे
देखना छोड़ जो गुणदोष देखता रहता है, वह आत्मघात की ही ओर प्रवृत्त होता है। सहज ही किसी के मिलने
पर वह जानबूझकर उसके गुणदोष देखने लगता है और इस प्रकार ज्ञानाभिमान निन्दा और स्तुति उत्पन्न करता है।
अभिमान का स्वभाव ही ऐसा है कि वह ज्ञाता के पास अधिक उत्तेजित होता है; और वही गुणदोषों को दिखाकर
निन्दा स्तुति उत्पन्न करता है। अपने स्वभाव के साथ जिसका मेल खाता है, उसकी वह थोड़ी तारीफ करता है
और जिसके गुण उसे अच्छे नहीं लगते उसकी पर्याप्त निन्दा करता है। निन्दा और स्तुति जहाँ उत्पन्न होती है,
वहाँ भेद क्षुब्ध हो उठता है और वह परमार्थ को चकनाचूर कर देता है। इस प्रकार उसका बहुत बड़ा अनर्थ होता
है। निंदा के पीछे अनर्थ खड़ा ही रहता है, उसमें उधार की बात नहीं होती। निजस्वार्थ का घात करने वाला वह
सीधे शरीर पर गिर पड़ता है। भेद का अर्थ दूजापन यह बात ही यहाँ मिथ्या है। दृढ़ परमार्थ साधने के लिये भेद
के मिथ्यत्व के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण स्वप्न का दृष्टांत सुनाते हैं।
तैजसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतनः ।
मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्न्नानार्थदृक् पुमान् ॥ ३ ॥
रजोगुण से इन्द्रियों की उत्पत्ति हुई है। तमोगुण से तन्मात्रा विषय उत्पन्न हुए हैं। वे इन्द्रिय जागृति में विषय
सेवन कर निद्रा में निश्चल होकर रहते हैं। जागृति अवस्था का अभिमानी 'विश्व' और जागृति इन दोनों का जब
अस्त होता है, उस समय स्वप्न में 'तैजस' अभिमानी 'मिथ्या' प्रपंच की सृष्टि करता है। उस समय स्थूल देह
निश्चल रहता है; स्वप्न में केवल मन का विचरण होता है और वह भवजाल उत्पन्न कर त्रैलोक्य की सृष्टि करता
है। उस स्वप्न की सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय हम स्वयं देखते रहते हैं, फिर भी वह जन्म-मरण (उत्पत्ति
और विनाश) मिथ्या ही है। उसी प्रकार अविद्या भी एक प्रदीर्घ स्वप्न ही है। वह केवल अभिमान को बढ़ाता है।
उसका जन्म-मरण मिथ्या ही है और तुम पूर्णत्व से परिपूर्ण ब्रह्म ही हो। तुम्हारे निजस्वरूप में दूजेपन की गन्ध
भी नहीं है। इसलिये उसका शुभाशुभ तुम्हें बिलकुल स्पर्श नहीं करता।