श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्ताईसवाँ अध्याय ७२१
की पूजा में ही लगते हैं, मानस पूजा में तो इन उपचारों की कोई आवश्यकता नहीं है। वहाँ मन ही मेरी मूर्ति
रहती है और उपचार का साहित्य भी मनोमय ही रहता है। लेकिन यह उपचार सम्पत्ति भी वे मुझे निर्लोभ होकर
अर्पित करते हैं। इससे मैं श्रीपति सन्तुष्ट होता हूँ। अस्तु ! प्रतिमा आदि को लेकर आठ पूजास्थान हैं, उनका भी
यथोचित पूजा विधान तुम्हें बताता हूँ। तो सुनो, उद्धव !
स्नानालंकारणं प्रेष्ठमर्चायामेव तूद्धव।
स्थण्डिले तत्त्वविन्यासो वह्नावाज्यप्लुतं हविः ॥ १६ ॥
सूर्ये चाभ्यर्हणं प्रेष्ठं सलिले सलिलादिभिः।
प्रतिमामूर्ति यह एक पूजास्थान है। उस मूर्ति को जो महाभिषेक करते हैं, उसी को 'स्नान' कहते हैं। मुकुट
आदि सभी अलंकार मूर्ति को पहनायें। जो पदार्थ अत्यन्त अच्छे लगते हों अथवा जो अत्यन्त मूल्यवान अलंकार
हों उन्हें लेकर उनसे श्रद्धापूर्वक श्रीहरि की पूजा करनी चाहिये। स्नान, भोजन, अलंकार आदि सर्वोपचारों के
साथ यथाविधि पूजा करना यही प्रतिमा पूजा का ढंग है। अब स्थंडिल के बारे में सुनो। स्थंडिल पर जो
पूजास्थान होता है, वहाँ तत्त्वों का ध्यान लगाकर उस पर तत्त्वविन्यास का लेखन करना चाहिये। यही उसका
पूजा विधान है। आत्मतत्त्व आदि के विचारों का स्थंडिल पर विचार कर हृदय, मस्तक, शिखा, कवच, नेत्र,
अस्त्र आदि उस पर बनाकर उनका दिशाबन्धन कर पूजा करनी चाहिये। अग्नि की जहाँ पूजा करनी हो, वहाँ
मेरा ध्यान कर घृतपूर्ण आहुति देकर होम करना यही अग्नि का पूजाविधान है। अग्नि देवताओं का मुख है इस
श्रद्धा से हविर्द्रव्य का हवन करना यही 'अग्निपूजन' है। सूर्य में प्रकाशमान होने वाला मंडलात्मा जो सूर्यनारायण
है, उसका सौर मंत्रों से पूजन एवं स्तवन करें। यही सूर्य का पूजाविधान है। श्रुति के अर्थ का विचार करने पर
'आप' अर्थात् जल साक्षात नारायण स्वरूप ही है। उसका यथोचित पूजा विधान है जल में ही जल का तर्पण
करना। 'हृदय' में मेरा जो पूजास्थान है, वहाँ मन से ही मन की पूजा की जाती है। मूर्ति भी मनोमय और
पूजाविधि भी मानसिक। मेरा मुख्य अधिष्ठान है, ब्रह्ममूर्ति ब्राह्मण। उनका दासत्व से आज्ञापालन करना यही
उनका पूजाविधान है। ब्रह्मा को भी जिससे ब्रह्मत्व प्राप्त होता है, वह 'सद्गुरु' तो मेरे सबसे श्रेष्ठ और पवित्र
पूजास्थान है। उसका पूजन इस प्रकार है—स्वयं जीवप्राण से उसकी अनन्य शरण में जाना और उसके वचन पर
प्राण न्योछावर करना। गुरु की छोटी से छोटी सेवा भी चाहपूर्वक करना यही उसकी पूजा का विधान है। इसी से
साधकों को सच्चा सुख प्राप्त होता है। सद्गुरु की सेवा करने से ब्रह्मसायुज्य प्राप्त होता है। गुरुसेवा से श्रेष्ठ
अन्य कोई साधन है ही नहीं। सद्गुरु का स्वरूप यह अखण्डपूर्ण ब्रह्म है। उसका आवाहन और विसर्जन कभी
नहीं करना चाहिये। सम्पूर्ण निष्कपट भाव से जो सद्गुरु की शरण में जाता है, उसका चरण मैं भी वन्दन करता
हूँ। वह इतना धन्य है। निर्लोभ भाव से सहज पूजा करने से भगवान को संतोष होता है। उसी भाव का रहस्य
श्रीकृष्ण बताते हैं।
श्रद्धयोपाहतं प्रेष्ठं भक्तेन मम वार्यपि ॥ १७ ॥
भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते।
गन्धो धूपः सुमनसो दीपोऽन्नाद्यं च किं पुनः ॥ १८ ॥
जो मेरे प्रति अत्यन्त प्रेम और श्रद्धायुक्त अनन्य भक्ति से मुझे केवल उदक अर्पण करते हैं, उससे भी मैं
श्रीपति सन्तुष्ट होता हूँ। वह जलबिन्दु मैं आदिपुरुष अत्यन्त प्रेम से मुख में ग्रहण करता हूँ और मूलतः सुख