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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 732, कुल 869 में से

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पृष्ठ 732

७१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
से कही है। सत्यवती का पुत्र, व्यास, साक्षात् नारायण जिसने वेद का अर्थ स्पष्ट किया है और जो महाकवि के
रूप में प्रसिद्ध है, वह समस्त पुराणों का कर्त्ता है और जिसके कारण 'सारा संसार व्यासोच्छिष्ट है' ऐसा कहा
जाता है, उसने भी भगवत्पूजा के मार्ग तथा इस क्रियायोग का प्रतिपादन किया है। इनकी तो बात ही छोड़ो
लेकिन सारे संसार के दादा, विष्णु के पुत्र ब्रह्मदेव ने भी यही विचार दृढ़ किया है।
निःसृतं ते मुखाम्भोजाद् यदाह भगवानजः ।
पुत्रेभ्यो भृगुमुख्येभ्यो देव्यै च भगवान् भवः ॥ ३ ॥
तुमने कल्प के प्रारम्भ में यही पूजाविधि पुत्र बुद्धि से स्वयं ब्रह्मदेव को बतायी है। उसने भी स्वयं कल्प
के पूर्व नाभिकमल में बैठकर भृगुकश्यपादि पुत्रों को भी यह पूजाविधान बताया है। श्री महादेव ने भी स्वयं यह
क्रियायोग विधि विधान भक्तिभाव से पार्वती को एकान्त में निरूपित किया है।
एतद् वै सर्ववर्णानामाश्रमाणां च सम्मतम् ।
श्रेयसामुत्तमं मन्ये स्त्रीशूद्राणां च मानद ॥ ४ ॥
हे दीनोद्धारा ! इस प्रकार दीनोद्धार के लिये तुमने यह श्रेष्ठ परम्परा शुरू की है। तुम सचमुच दीनों के प्रति
दयालु हो। अतः उसका भी विचार सुनो। आश्रमधर्म और विधि विधान इनके अधिकारी ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य हैं।
विधिविधान में त्रुटि होने से उन्हें दोष लगता है। इसलिये ब्राह्मण कर्मों में व्यस्त रहते हैं। लेकिन तुम्हारा भजन
वैसा नहीं है। भजन का अधिकार सबका है। भजन दीनों का पूर्णरूप से उद्धार करने वाला है। उसने स्त्रियों का
और शूद्रों का उद्धार किया है। उत्तमोत्तम लोग कर्म में व्यस्त रहते हैं और अधमाधमों का भी भजन उद्धार होता
है। भजन सभी के लिये सुगम है। भजन से स्वधर्म का सार्थक होता है। भजन की महिमा अपूर्व है। उसके योग
से अधम को भी उत्तमोत्तम पद प्राप्त होता है और जो उत्तम होते हुए भजनहीन रहते हैं, वे स्वयं अधमाधम हो
जाते हैं। सभी वर्णों के और आश्रमों के लोगों को भगवद्भजन से ही सद्गति प्राप्त होती है। यही भक्ति का रहस्य
है और इसे निष्काम भक्त ही जानते हैं। भक्त भगवद्भक्ति करके ही स्वयं भगवद्रूप होते हैं, इसीलिये हे श्रीकृष्ण !
तुम भक्तों को अत्यन्त प्रेम से सम्मान देते हो। तुम्हारा भजन-पूजन करने से तुम अपने भक्तों को तारते हो, तुम्हीं
भक्तों के सम्मानदाता बनते हो, अतः तुम्हारी पूजा की कथा (विधानतः) मुझे बतायें।
एतत्कमलपत्राक्ष कर्मबन्धविमोचनम् ।
भक्ताय चानुरक्ताय ब्रूहि विश्वेश्वरेश्वर ॥ ५ ॥
हे कमलनाथ नारायण ! हे भक्तविश्राम कमलवदन श्रीकृष्ण ! मेरी विनती सुनें। तुम्हारा कृपादृष्टि से देखना
ही पर्याप्त है, तत्काल कर्मबन्धन की गाँठें खुल जाती हैं। भक्तों को स्वानंद की पुष्टि मिलती है। जिस प्रकार घृत
की कड़ाही को सूर्य के किरण एक ही क्षण में पिघला देते हैं, उसी प्रकार हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारा कृपावलोकन
कर्मबंधन का निवारण ही कर देता है। जिस प्रकार नमक का बड़ा पर्वत भी समुद्र में घुल जाता है, उसी प्रकार,
श्रीकृष्ण ! तुम्हारी कृपा कर्मबन्धन को भस्म कर देती है। जिस प्रकार सूर्योदय हो जाने के बाद जुगनूँ दिखायी
नहीं पड़ता उसी प्रकार तुम्हारी कृपादृष्टि पड़ते ही, कर्माकर्म से छुटकारा मिल जाता है। अन्धकार में करोड़ों
जुगनूँ चमकते हैं उसी प्रकार अज्ञान में कर्मों का आडम्बर फैलता है। तुम्हारे कृपारूपी सूर्य का साथ मिलते ही
कर्म बेचारे कर्महीन हो जाते हैं। ऐसी निष्कर्म कृपा से युक्त होकर तुम्हारे भक्त विचरण करते हैं और वे विषय के
प्रति सदा विरक्त रहकर हरिचरणों के प्रति ही अनुरक्त रहते हैं। इसके अलावा तुम्हारी पूर्ण कृपा का स्थान ही जो