श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वरूप होते हुए भी भक्तकाम के हर्ष से अधिक सुखी होता हूँ। त्रैलोक्य मुझसे सुख प्राप्त करता है, ऐसा सुख
का सागर होते हुए भी, भक्त का उदक पीने से मुझे परम सन्तोष होता है। उस जलबिन्दु से प्रिय मुझे मेरी सुन्दर
लक्ष्मी भी नहीं लगती; ब्रह्मदेव मेरा अपना पुत्र है लेकिन वह भी मुझे उतना अच्छा नहीं लगता। भक्तों के जल
बिन्दु के सामने मुझे मेरा वैकुण्ठ भी फीका लगता है। शेष पर शयन करने का सुख भी उसके आगे हलका
मालूम होता है। भक्तों के उदक के सामने मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता; तिस पर गंधादि के साथ पूजा की,
षड्रस का नैवेद्य मिला। उस पूजा के सुख की त्रिभुवन में कोई उपमा ही नहीं है। भक्तों की भक्ति से मैं श्रीपति
इतना अधिक सुखी होता हूँ। भाव के साथ भक्ति कर स्वयं कृतकृत्य होने का जिसका निश्चय रहता हे उसी के
उदक से मैं तृप्त होता हूँ। अन्य जो ढोंगी भक्त मन में धन की आशा तथा बाहर विरक्ति का ढोंग करता है, लोगों
में प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये मेरी भक्ति प्राप्त करता है, ऐसा अभक्त मुझे छत्र, चामर अथवा गजान्त लक्ष्मी भी
अर्पण करता है तो भी मेरे चित्त में सुख का संचार नहीं होता। दूध और पानी को अलग करने वाले राजहंस के
सामने यदि धुनकने के लिये रुई रखी जाय तो उसे जिस प्रकार संतोष नहीं होता, उसी प्रकार अभक्तों के भजन
पूजन से मुझ हृषीकेश को संतोष प्राप्त नहीं होता। कौओं की गायनकला देखकर जिस प्रकार किन्नरों को संतोष
नहीं होता, उसी प्रकार अभक्तों की भजन लीला देखकर मेरी ज्ञानकला को संतोष नहीं होता। रजस्वला स्त्री द्वारा
बनाया गया पकवान कितना ही उत्तम क्यों न हो लेकिन वह अत्यन्त अमंगल होता है, उसी प्रकार अभक्तों के
भजन को जनार्दन कभी स्पर्श नहीं करता। जिस भजन को नारायण स्पर्श नहीं करता, ऐसे अभक्त के भजन से
जनार्दन को जरा भी संतोष नहीं होता। इस प्रकार भक्त और अभक्त के मार्ग और उनके अधिकार के क्षेत्र बतला
दिये। अब श्रीकृष्ण साद्यंत पूजामार्ग ही बता रहे हैं।
शुचिःसम्भृतसम्भारःप्राग्दर्भैः कल्पितासनः।
आसीनः प्रागुदग् वार्चेदर्चायामथ सम्मुखः॥१९॥
शरीर शुद्धि का स्नान हो जाने के बाद वैदिक तांत्रिक मंत्रस्नान करें तथा नित्यकर्म पूरा करें। इसका नाम है
'शुचिर्भूत' होना। इसके उपरान्त देवपूजा की सामग्री खोज कर उसे पवित्र करें और फिर गंधादिक पूजा सामग्री
यथास्थान रखें। श्वेत कम्बल, मृगचर्म और पूर्वाभिमुख दर्भाग्र आसन बिछाकर उस पर पूर्वाभिमुख अथवा
उत्तराभिमुख होकर बैठें। स्थावर मूर्ति की पूजा करते समय अपना आसन मूर्ति के सामने बिछाएँ। यह निर्दोष
आसनविधि है। अब पूजान्यास आदि के बारे में श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
कृतन्यासः कृतन्यासां मदर्चां पाणिनामृजेत्।
कलशं प्रोक्षणीयं च यथावदुपसाधयेत्॥२०॥
इस प्रकार विधिपूर्वक आसन बिछाकर गुरु को प्रणाम करें; परमगुरु (गुरु के गुरु) तथा परमेष्ठी गुरु
(परमगुरु के गुरु) का भी प्रेमपूर्वक अभिनन्दन करें। गुरु से जो मंत्र मिला हो उस मंत्र का देह पर न्यास करें।
कलश और प्रोक्षण पात्र (पंचपात्र आदि) को उचित स्थान पर रखकर, उसे जल से भरकर, उसमें दूब, चन्दन
आदि पूजाद्रव्य डालें।
तदद्भिर्देवयजनं द्रव्याण्यात्मानमेव च।
प्रोक्ष्य पात्राणि त्रीण्यद्भिस्तैस्तैर्द्रव्यैश्च साधयेत्॥२१॥
उस प्रोक्षण पात्र के जल में उँगलियाँ बिना डुबाये, सारी पूजा सामग्री का उस जल से दर्भ के शीर्ष से