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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 727, कुल 869 में से

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पृष्ठ 727

छब्बीसवाँ अध्याय ७११
भक्त ब्रह्मसम्पन्न होते हैं। निष्ठा से मेरी भक्ति करने से ऐसी कौन-सी वस्तु है जो भक्तों को नहीं मिल सकती ?
विवेक, वैराग्य, ज्ञानसम्पत्ति ये मेरे भक्तों के चरणों पर गिर पड़ते हैं। मेरे भजन से भेदभाव नष्ट होता है और
अभेदज्ञान अपने आप प्रकट होता है। इससे परमानंद भर जाता है और वह स्वतःसिद्ध स्वानंद का स्वरूप बन
जाता है। मेरे स्वरूप का अंत नहीं है इसीलिये मुझे 'अनंत' कहते हैं। किन्तु भक्त का भाव इतना समर्थ और
श्रेष्ठ रहता है कि वह अनंत को भी बाँध कर रख सकता है। जिनका प्रेम इतना मधुर है, उनकी सेवा की मुझे
चाह रहती है। उनका संकट मैं सहन करता हूँ और मुझ निरिच्छ को भी उनकी इच्छा रहती है। देव प्रेम के वश
में हो गया और बोला कि मैं उन्हीं का अंकित हूँ। मैं जीवकाल से उस पर न्योछावर हूँ और सारे त्रिभुवन में
उन्हीं का होकर रह गया हूँ। अकस्मात सत्संगति होने से मेरे भक्तों को जब इतनी प्राप्ति होती है तो फिर अनन्य
भक्ति से साधु की सेवा करते हैं उनकी गति मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता। ऐसे संतों की महिमा का वर्णन
करने से श्रीकृष्ण को संतोष नहीं हुआ इसलिये वही संतमहिमा अगले चार श्लोकों में वर्णन कर रहे हैं।
यथोपश्रयमाणस्य भगवन्तं विभावसुम्।
शीतं भयं तमोऽप्येति साधून् संसेवतस्तथा ॥ ३१॥
उद्धव ! तेजोमूर्ति अग्नि की सेवा करना जो जानते हैं, उनकी ठंडक, अन्धकार और भय का वह (अग्नि)
निवारण करता है। उसके पास रहने से ठंडक नष्ट हो जाती है, उसकी तेजोवृद्धि से अन्धकार नष्ट होता है और
उस पर ईश्वर भावना रखने से भय का निवारण होता है। सत्संगति को भी तुम उसी प्रकार समझो। उस संगति से
त्रिविध तापों का निवारण होता है। यही बात उद्धव तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ। ठंडक अर्थात् द्वंद्व के कारण होने
वाली पीड़ा साधु समूल नष्ट कर देते हैं। तम का अर्थ है अज्ञानांधकार। इसका भी वे आत्मज्ञानोपदेश से विनाश
करते हैं। भय में, मरने जैसा भय नहीं है। ज्ञानी साधु उसका निवारण करते हैं। इतना ही नहीं, बल्कि वे
जन्ममरण को दूर कर देते हैं क्योंकि वे दीनों के प्रति पूर्णरूप से दयालु हैं। अब साधु अग्नि जैसे हैं यह कहना
भी विसंगत है, क्योंकि साधु अग्नि से भी श्रेष्ठ हैं। अग्नि के पास भीषण धुआँ रहता है और साधु क्रोधरहित
तथा धूम्ररहित होते हैं। अग्नि अधम और उत्तम दोनों को ही झुलसाता है, किन्तु साधु सबके लिये, समान रूप से
सुखदायी होते हैं। साधु की संगति धन्य है। वे अपनी संगति से जड़ का जड़त्व नष्ट करते हैं, कर्म का कर्मत्व
तोड़ते हैं और निजसंगति से डूबते हुए को बचाते हैं।
निमज्ज्योन्मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम्।
सन्तो ब्रह्मविदःशान्ता नौर्दृढेवाप्सु मज्जताम् ॥ ३२॥
संसारसागर में क्षण-प्रतिक्षण ज्वार आता रहता है और उसका आकार असीम बढ़ता रहता है। उसमें गोता
खाते हुए लोगों में अधर्म बुद्धि ही उत्पन्न होती है। अधर्म से नरक में डूबते हैं और स्वधर्म से स्वर्ग में जाते हैं।
इस प्रकार संसारी लोग स्वर्ग और नरक में डूबते-उतराते रहते हैं। उन्हें तारने के लिये साधु सज्जन ही मजबूत
नौका है। पानी के समुद्र में गिरने पर संसार सागर में डूबने वालों के लिये भी सज्जनरूप नौका ही पार लगाती
है। कामक्रोध रहित शान्ति यही नाव की अछिद्रता है। वह ब्रह्मज्ञान से सुदृढ़ होने के कारण सुरक्षित है। काम-
क्रोधादि भयंकर जलचर आमिष खाने के लिये इस नाव तक कभी नहीं आ पाते। सारांश, सत्संग सभी को तारता
है। इस नाव की एक बात बिलकुल अद्भुत है और वह यह कि वह कल्पांत में भी पुरानी नहीं होती। बड़े प्रवाह
के भँवरों में भी उसे डुबाया नहीं जा सकता। वह अपनी संगति से सभी को तारती है। लेकिन उद्धव ! इस नाव