श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 723, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवाँ अध्याय
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विकल्प से भरा रहता है वह भी सचमुच दुःसंग ही है। जो अत्यन्त विरक्ति की बात करता है किन्तु हृदय में
अधर्म काम की प्रीति रहती है; कामना के आड़ आते ही द्वेष बढ़ता है; वह भी सचमुच दुःसंग है। उसी प्रकार
स्वधर्म, कर्म, विनय, और सात्त्विक वृत्ति का बाहर प्रदर्शन करना और अंतःकरण में संतों के दोष देखना; और
संवाद में उसका उदाहरण देना, वह अत्यन्त कठिन दुःसंग है। मुख्यतः हमारी सकामता ही सचमुच दुःसंग है।
उस काम का समूल त्याग कर देने से दुःसंग का त्याग होता है। काम कल्पना की मार यही सबसे असाध्य
दुःसंग है। जो पुरुष कामकल्पना का त्याग करेगा उसी का संसार सुखमय होगा। कामकल्पना छूटने के लिये
सत्संग ही प्रमुख कारण है। संतों के चरणों में लीन होने से कल्पना और काम का अपने आप लय हो जाता है।
संग सभी अर्थों में बाधक है इसलिये यदि सभी प्रकार का संग छोड़ने को कहें तो सत्संग न करें तो साधक कैसे
छूट पायेंगे ? सत्संग के बिना जो साधन है वही साधक के लिये दृढ़ बन्धन हो जाता है। सत्संग के बिना किया
हुआ त्याग ढकोसला है। चित्त और विषय का बन्धन दृढ़ है; उसे विवेक से छुड़ाने से केवल साधु ही समर्थ है।
संतों की सहज बातें करोड़ों उपदेशों से अधिक प्रभावी होती हैं; देहात्म भाव से उत्पन्न हुए जीवों के बन्धन वे
शब्दों से काट देते हैं। सद्भाव से संगत करने से साधकों की संसारपाश से मुक्ति होती है। इसलिये बुद्धिमानों को
संतों की संगति अवश्य करनी चाहिये। उन संतों के लक्षण यथार्थ ढंग से और अपनी प्रसाद वाणी से श्रीकृष्ण
अत्यन्त संक्षेप में और अत्यन्त प्रेम से उद्धव को बता रहे हैं।
सन्तोऽनपेक्षा मच्चित्ताः प्रशान्ताः समदर्शिनः।
निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः॥ २७॥
साधुओं के अनेक लक्षण हैं किन्तु श्रीकृष्ण उनमें से केवल आठ लक्षण चुनते हैं। सुनो। लाभ अथवा हानि
साधुओं के चित्त को बाधा नहीं पहुँचा सकते, चित्त सदा भगवान की ही ओर लगा रहता है। इसी का नाम है
'निरपेक्षण'। कोई एक विशिष्ट विषय मुझे प्राप्त हो इसका स्मरण भी जीव को नहीं होता। उद्धव ! साधुओं की
यह निरपेक्षता की निधि, यह उनका पहला गुण है। चित्त से चैतन्य का ही चिन्तन करना, इसी का नाम है
'मच्चित्त' होना। इसी का नाम है, पूर्ण निरपेक्षता। अन्य किसी भी बात का चिन्तन करना संसार बाधा का कारण
बनता है। इस प्रकार निरपेक्ष होने के लिये जागृती में, स्वप्न में और सुषुप्ति में चित्स्वरूप में दृढ़ रहना, इसी का
नाम है 'मच्चित्त'। यह दूसरा गुण है। देह का चाहे श्रृंगार हुआ हो या वह आपत्ति से ग्रस्त हुआ हो, फिर भी
परमानन्द में निमग्न रहना, इसी का नाम है 'मच्चित्त'। चित्त जब कामलोभादि से दोषरहित होकर परमानन्द में
स्थिर हो जाता है, तभी वहाँ शान्ति का वास होता है, इसीलिये उसे प्रशान्त कहते हैं। कोई प्राणान्त होने तक
अपराध करता रहे फिर भी जो उसे 'दुष्ट' नहीं कहता, उलटे उस अपकार करने वाले पर भी उपकार करता है,
उसी को उत्कृष्ट 'शांति' कहते हैं। कोई सब कुछ ठग ले फिर भी जो उस पर क्रोध नहीं करता, उसे दोषी नहीं
कहता, बल्कि उसे ब्रह्मार्पण समझता है; इसी कारण उसके शरीर में प्रशांतता आती है। सचमुच, ब्रह्मभावना से
सभी प्राणियों पर विश्वास करना तथा चित्त में किसी प्रकार का विकल्प उत्पन्न न होने देना, इसी का नाम
'प्रशांतता' है। यह तीसरा गुण है। यह गुण आने का कारण यही है कि संसार में सर्वत्र वैषम्य ही भरा हुआ है,
फिर भी जो उस वैषम्य में भी 'समभाव' देखता है, वही सच्चा 'समदर्शी' है। यही निरुपम चौथा गुण है। यह
समदृष्टि हाथ लगने के लिये, भक्तिभाव से भगवान को भजन कर अहंता और ममता का पूर्णरूप से त्याग करना
चाहिये। उसके बारे में भी सुनो। देह में देहाभिमान रखने से 'अहंता' 'मैं' पन बढ़ाती है और उस 'मैं पन' के