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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 726, कुल 869 में से

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पृष्ठ 726

७१० श्रीमद् एकनाथी भागवत

को मत्परायण स्थिति प्राप्त होती है। भगवद्भजन न कर वेदाध्ययन अथवा यज्ञदान करने से ही हम तर जायेंगे
ऐसा कहने वाले लोग महामूर्ख हैं। इसमें भगवद्भक्ति ही मुख्य है, ऐसा मन में विश्वास करने पर वृत्ति
भगवत्परक ही होती है और इस प्रकार सभी प्राणियों में मद्भाव उत्पन्न होता है। ऐसा भाव अंतःकरण में धारण
कर मेरी भक्ति करने के अलावा वे और कुछ नहीं करते। इस प्रकार वे मत्पर हो जाते हैं। ऐसी मत्पर वृत्ति से वे
निजस्थिति में सावधान रहते हैं। इससे उन भक्तों में चौथी भक्ति उत्पन्न होती है। वहाँ स्मरण किये बिना ही हरि
का अखण्ड स्मरण होता रहता है। जो-जो क्रिया होती है उससे निरन्तर भगवद्भजन सहज ही होता रहता है।
दृष्टि से वह जो भी दृश्य देखता है, वह भले ही बड़ा हो या छोटा हो उसमें हरि का ही दर्शन होता है। यही
अहेतुक और सहज भजन है। उसकी वाणी से जो निकलता है, वह सब स्तव्य, स्तविता आदि लक्षणों को
भूलकर केवल हरि का स्तवन होता है। शब्दों से शब्द सजाते समय शब्दरूप से वह हरि की सत्ता ही रहती है।
इसी प्रकार शब्द जिस शब्दार्थ का द्योतक रहता है वह अर्थग्राहकता भी हरि की अर्थात् हरिरूप ही है। उसी
प्रकार कानों से शब्दों का श्रवण होते समय वह सारा शब्दार्थ ब्रह्मार्पण ही होता रहता है। नाक और सुवास का
मिलन होता है, उस समय भोक्ता के रूप में हरि ही खड़ा रहता है। अर्थात् जिसकी गंध लेनी है, वह वस्तु, गन्ध
लेने वाला तथा नाक यह त्रिगुट गन्ध निगल लेता है। 'रस', 'रसना' और 'रसाभिरुचि' इसमें भी श्रीहरि ही
भोक्ता रहता है। इसलिये भोग्य, भोक्ता और भोजन सम्बन्ध निजबोध के योग से वह परमानन्दरूप कर देता है।
शीत-उष्ण-मृदु-कठोर ('स्पर्श' विषय के चार गुण) आदि का शरीर से स्पर्श होते ही वह सारा वह स्वयं हो
जाता है क्योंकि मृदु, कठिन आदि भेद वह मिथ्या समझता है। उसे इस सबमें चित्सत्ता का ही स्फुरण होता है।
हाथ की क्रिया वह अकर्ता के ही रूप में करता रहता है इसलिये लेने-देने में भी अकर्त्तात्मभाव से हरि का ही
भजन होता है। निजरूप पर निश्चल हो जाने के कारण वह चपल कदमों को इस सूक्ष्मता से चलाता है जिस
प्रकार सूर्य किरणों के कारण मृगजल पर लहरें चलती हैं। जागृति, स्वप्न तथा सुषुप्ति में वृत्ति चित्स्वरूप में ही
लगी रहती है, इसलिये उद्धव ! 'चित्त' को अंतःकरण की स्फूर्ति का ही विस्मरण हो जाता है। इसी का नाम
'मद्भक्ति' है। यह मेरे पसन्द की भक्ति है। इसी का नाम 'चौथी भक्ति' है। इस भक्ति का भाग्य जिसे प्राप्त होता
है, उसकी चारों मुक्तियाँ दासी बन जाती हैं।
भक्तिं लब्धवतः साधोः किमन्यदवशिष्यते।
मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि॥ ३०॥
यह मेरी अत्यन्त प्रिय चौथी भक्ति है। यदि यह भाग्य से प्राप्त हो जाय तो चारों मुक्तियाँ तृणवत् हो जाती
हैं। जहाँ मेरी निरपेक्ष भक्ति रहती है वहाँ चारों मुक्तियाँ चरणों पर गिरती हैं लेकिन भक्त उनका स्पर्श तक नहीं
करते। मेरे भजन से उन्हें इतना अधिक प्रेम रहता है। मेरे भजनों से प्रेम के कारण उन्हें स्वप्न में भी किसी प्रकार
की बद्धता का आभास नहीं होता और बिना बद्धता के मुक्ति व्यर्थ है इसलिये मेरे भक्त मुक्ति स्वीकार नहीं करते।
जहाँ समूल बद्धता ही मिथ्या वहाँ बेचारी मुक्ति क्या है? मेरे भजन की चाह में ही मेरे भक्तों को स्वानंद की राशि
मिलती है। निरपेक्ष और प्रेमयुक्त भक्ति से मेरा अनन्य भजन करने से, उस भजनास्थिति में ही भक्तों को स्वानंद
की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार गर्भवती स्त्री गर्भ के साथ बढ़ती है अथवा कोई युवती अपने यौवन के साथ
व्यवहार करती है, उसी प्रकार आत्मानंद की परिपूर्णता के साथ मेरे भक्त मेरे भजन में लीन रहते हैं। उस समय
सगुण अथवा निर्गुण इन दोनों रूपों से परिपूर्ण ब्रह्म मैं ही रहता हूँ। इसलिये भक्ति से मेरा भजन करने से मेरे