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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 720, कुल 869 में से

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पृष्ठ 720

७०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जिसकी आसक्ति होती है वे कीड़ों की ही तरह हैं। इस प्रकार विचार करें तो स्त्रियों का देह अत्यन्त गन्दा है।
उसे वस्त्रालंकार से सुशोभित कर पुरुष उस पर आसक्त होते हैं। बहेलिया जाल लगाकर हिरनों को पकड़ता है
लेकिन पुरुष स्त्रियों का श्रृंगार कर स्वयं ही उस जाल में फँसता है। इसलिये विरक्तों को स्त्री की संगत कभी
नहीं करनी चाहिये, गृहस्थाश्रमियों को भी उसकी आसक्ति छोड़नी चाहिये। इसके सम्बन्ध में राजा बता रहे हैं।
अथापि नोपसज्जेत स्त्रीषु स्त्रैणेषु चार्थवित्।
विषयेन्द्रियसंयोगान्मनः क्षुभ्यति नान्यथा ॥ २२॥
स्त्रियों का यह देह यदि वास्तव में सुन्दर होता, तो वस्त्रालंकार के बिना भी सुन्दर लगता। लेकिन वह
अत्यन्त निंद्य और गन्दा होने के कारण वस्त्रों के बिना बिलकुल अच्छा नहीं लगता इसीलिये स्त्रियाँ अपना देह
वस्त्रालंकारों में लपेटती हैं। जिस प्रकार धोखेबाज ब्राह्मण का स्वांग बनाकर विश्वास जता कर घात करते हैं,
उसी प्रकार यह स्त्रियों की संगत है। स्त्रियों की संगत नाना प्रकार के तरीकों से दास्यत्व कराती है और अन्त में
अपने साथ नरक ले जाती है। इसलिये विरक्तों को उधर नहीं जाना चाहिये। यदि स्त्री विरक्त हो तो भी साधक
को उसकी संगत नहीं करनी चाहिये। अग्नि के संग से जिस प्रकार घी पिघलता है, उसी प्रकार स्त्री की संगत से
भी वृत्तियों में विकार उत्पन्न होता है। अमृत के स्थान पर विष खा लेने से मृत्यु अवश्यंभावी है, उसी प्रकार स्त्री
सात्त्विक है यह जानकर सेवन करने पर भी वह दुःख ही देती है। यदि अग्नि में घृत बहुत समय तक रह पाता
तो स्त्री की संगत से भी पारमार्थिक लोग आत्मस्वरूप प्राप्त करते। घृत समाप्त होकर यदि साठ वर्ष भी हो गये
हों तो भी अग्नि के संगत से घृत की गागर द्रवित हो उठती है। उसी प्रकार स्त्रियों के सहवास से वृद्धावस्था में
भी काम विकार प्रबल होता है। कपूर अगर अग्नि में बिना जले रह गया होता तो स्त्री की संगत से सबको
परब्रह्म का लाभ हुआ होता। अग्नि हाथ में लेते ही, वह जलाता है वैसी ही स्त्रियों की संगत है। उसकी संगति
से आसक्ति बढ़ती है और वह पुरुष को अनर्थ में डालती है। स्त्री से भी ज्यादा यदि स्त्रैण की संगति मिले तो वह
करोड़ों अनर्थ का मूल है। उसकी संगति से अधःपतन ही होगा। स्त्रीलंपट पुरुष से यदि भेंट हो जाय तो वह
सारा ब्रह्मानन्द स्त्री सुख में ही है, ऐसा आदेश विरक्त को देता है। इससे तत्काल स्त्री कामना उत्पन्न होती है।
फिर वह स्वदारा और परदारा का विचार ही नहीं करने देती और स्वेच्छाचार की ओर प्रवृत्ति मुड़ती है। इसलिये
स्त्रैण ही वास्तव में घातकी है। स्त्रैण जहाँ प्रवेश करता है, वहाँ अनाचार की बेल बढ़ी ही समझिये। अधर्म सर्वांग
से फलता-फूलता है और वह बाधक बनकर अनर्थ के फल देता है। इसलिये जिसे परमार्थ साधना हो उसे स्त्री
की अथवा स्त्रैण की संगत कभी नहीं करनी चाहिये क्योंकि उनकी संगत अनर्थ में डालती है। लेकिन यदि स्त्रैण
को ही वर्जित कर दिया जाय तो फिर स्त्रीसंग रह ही कहाँ जाता है ? सारांश यह संगत ही परमार्थ के लिये
उपयोगी नहीं है। इसलिये साधक को स्त्रियों की ओर नहीं देखना चाहिये और बातें तो नहीं ही करनी चाहिये
और एकान्त में भी कभी नहीं बैठना चाहिये। अब आप यह कहेंगे कि जो विचारी है उसे स्त्रीसंगति क्या करेगी ?
तो भाई ! इस स्त्री की संगत के पीछे बड़े-बड़े ज्ञाताओं ने भी आघात सहे हैं। पराशर ऋषि को नाव में क्षणभर के
लिये नाविक की कन्या मिली, लेकिन उतने ही क्षणों के लिये उन पर अपयश का आघात हुआ। ऋष्यशृंग बहुत
बड़ा तपस्वी था किन्तु वह भी वेश्या के वश में हो गया, औरों की क्या बात करें ? साक्षात महादेव पर भी
मोहिनी ने मोहिनी डाली। विषय और इन्द्रियों की संगत से चित्तवृत्ति निश्चित रूप से क्षुब्ध होती है। सज्ञान भी
जब उनमें बँध जाते हैं तो अज्ञानों की क्या कथा ? लेकिन, स्त्रियों की प्रत्यक्ष संगत न होते हुए भी स्त्री के स्मरण
मात्र से भी काम विकार उत्पन्न होता है। इसी का स्पष्टीकरण राजा कर रहे हैं।