श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 731, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्ताईसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप सहज आत्मस्वरूप देव ! तुम्हें नमस्कार है। तुम विश्वात्मा होते हुए चतुर्भुज हो। अष्टभुज
भी तुम्हीं हो और विश्वभुज अर्थात् अनंतभुज भी तुम्हीं हो। तुम्हारा मैं गुरुत्व से ही गौरव करता हूँ। अपने शिष्यों
के भावार्थ गुरु के नाम से अभय देने वाले तुम्हीं हो। अभय देकर संसार दुःख का निवारण करने वाले तुम्हीं हो।
जन्म-मरण का निवारण कर तुम स्वयं स्वयं से ही मिलन करते हो। अतः गुरु और शिष्य इन नामों से तुम्हारा
ऐक्य मालूम होने लगता है। यह ऐक्य दृष्टि को दिखायी पड़ते ही एकनाथ और जनार्दन ये एकरूप ही हो जाते
हैं। सारी सृष्टि गुरुत्व से भर कर सारा संसार स्वानंद से विचरने लगता है। ऐसा वह स्वानंदैक्य चिद्धनस्वरूप
जगद्गुरु जनार्दन है। उस जनार्दन को शरण जाकर एकनाथ ने अपनी एकता दृढ़ की। यह दृढ़ हुआ ऐक्य भी
सद्गुरु ही बन गया। तब एकनाथ और जनार्दन एक हो जाने के कारण 'मैं' पन 'तू'पन समाप्त हो गया। इस
प्रकार अकेले एक होते हुए भी एकनाथ को जनार्दन ने कवि बना दिया। तब उसे एकादश के गहरे एकत्व का
सहज ही बोध हो गया। उसी ऐक्य की सच्ची स्थिति राजा पुरुरवा को भी प्राप्त हो गयी थी ओर सत्संग से
उसका यह अनुताप, विरक्ति और भगवद्भक्ति दृढ़ हो गयी। यह बात छब्बीसवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने अपने ही
मुख से बतायी। सत्संग से भगवद्भक्ति होती है और उससे साधकों को विरक्ति के बिना ही पूर्ण वैराग्य प्राप्त होता
है। भगवद्भक्ति किये बिना विरक्ति कभी उत्पन्न नहीं होगी और साधकों को विरक्ति के बिना भगवत्प्राप्ति कल्पांत
में भी नहीं होगी। ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा; उसे पूरी तरह मन में रखकर उद्धव भगवद्भक्ति, पूजा विधान और उसके
क्रियायोग पूछ रहा है।
उद्धव उवाच
क्रियायोगं समाचक्ष्व भवदाराधनं प्रभो।
यस्मात्त्वां ये यथार्चन्ति सात्वताः सात्वतर्षभ॥ १॥
अपने भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये तुम सत्वमूर्ति अनंत हो, तुम्हारा पूजन तुम्हारे सात्विक भक्त किस
विधि से करते हैं? वह साधु का आराधन और क्रियायोग से तुम्हारा पूजन किस प्रकार होता है? मुझ पर कृपा
करते हुए मुझे वह सब बतायें। आप कहेंगे कि यह तुम किसी से पूछो, तो वह मुझसे नहीं होगा। तुम्हें छोड़कर
दूसरे के पास जाने में मुझे लज्जा लगती है। जीव भाव से मैं तुम्हारा दास हूँ, तुम्हारे स्वामित्व के सामर्थ्य पर मैं
कलिकाल की भी चिन्ता नहीं करूँगा। यह तुम्हारी कृपा का ही प्रभाव है। तुम कृपा से युक्त कृपालु हो; कृपा से
ही तुम भक्तों के भक्त बनते हो। तुम्हारे उन्हीं चरणों का मैं दास हूँ। इसलिये तुम्हारे सान्निध्य के कारण स्वयं
गूढार्थ पूछता हूँ। तुम पूछोगे कि इतने आदर से पूजा प्रकार क्यों पूछ रहे हो? तो वह प्रश्न अन्य बड़े लोगों ने भी
पूछा है। तो मैं उसे बताता हूँ, सुनो।
एतद् वदन्तिम्युनयो मुहुर्निःश्रेयसं नृणाम्।
नारदो भगवान् व्यास आचार्योऽङ्गिरसःसुतः ॥ २॥
प्राचीन वेदविचारनिष्ठ बड़े-बड़े देवतागण, महान ऋषि, अत्यन्त श्रेष्ठ विचारकों ने भी यही बात स्पष्ट रूप