श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अचेतन को चेतनता देने वाला, जड़ को जीवत्व देने वाला- 'जीवत्व का अर्थ है चिन्मात्रत्त्व' उसे ही
परमेश्वर समझना चाहिये। शुद्ध भक्तिभाव से निर्मित जीव का निज मन्दिर-अर्थात् आगमशास्त्र की सम्मति से
स्थापित स्थावर-जंगम प्रतिमा समझनी चाहिये। साधक यदि 'स्थावर' मूर्ति का पूजन करता है तो उसका
आवाहन या विसर्जन नहीं करना पड़ता। उसमें अधिष्ठान स्वयंभू रहता है।
अस्थिरायं विकल्पः स्यात् स्थण्डिले तु भवेद् द्वयम्।
स्नपन्नंत्वविलेप्यायामन्यत्र परिमार्जनम्॥ १४॥
'जंगम' प्रतिमाओं में भी किसी में आवाहन विसर्जन रहता है और किसी में नहीं रहता। शालिग्राम की
मूर्ति में मेरा स्वयंभू अधिष्ठान ही रहता है। इसलिये इसमें आवाहन या विसर्जन की आवश्यकता नहीं रहती।
शालिग्राम का टूटा-फूटा टुकड़ा भी जिसके पास पूजा में हो वहाँ निज सखा परमात्मा सदा सर्वकाल विद्यमान
रहता है, ऐसा समझना चाहिये। इसके अतिरिक्त अन्य जंगम अर्थात् चलमूर्ति हैं जिन पर आवाहन और विसर्जन
लागू है। उसे निष्ठापूर्वक करना चाहिये। यही आगमोक्त विधि विधान है। स्थंडिल पर बनायी हुई मूर्ति का
आवाहन करें और पूजा होते ही उसका विसर्जन करें। ये दो प्रकार के भावना विधान स्थंडिल पर करना
आवश्यक है। हृदय में स्थित चिद्धन परमात्मा का ही मूर्ति में आवाहन करें और पूजा होने के बाद उसका
विसर्जन कर उसे पुनः हृदय में धारण करें। इसमें, हम स्वयं ही परिपूर्ण ब्रह्म हैं इसका निजस्मरण होने के लिये
ही आवाहन विसर्जन करना होता है। इसके द्वारा साधक को आत्मस्वरूप का स्मरण होता रहता है। आगम शास्त्र
का गूढ़ार्थ यही है कि हम स्वयं ही देवता हैं और स्वयं ही अपने पूजक हैं। इस प्रकार अपनी पूजा में अपने ही
आत्मस्वरूप की पहचान होती हे। स्वयं देव बनकर ही देवता की पूजा करें, यही आत्मस्वरूप का प्रिय खाद्य है
जिसे उपासना काण्ड के रूप में श्रीकृष्ण ने उद्धव को दिया है। आत्मस्वरूप का यह माधुर्य यदि पग-पग पर न
मिले तो उपासना का शुष्क प्रयास कौन करेगा ? यही आगमशास्त्र का गूढ़ रहस्य है। हे उद्धव ! इससे साधक
पग-पग पर सुख-सम्पन्न होकर स्वयं ही चिद्धन बन जाते हैं; ऐसी यह उपासना है। कृष्ण का यह भाषण सुनकर
उद्धव आनन्द से ओतप्रोत हो गया, उसने श्रीकृष्ण के पैर पकड़ लिये और वह निरूपण साद्यंत सुनने की इच्छा
प्रकट की। इस पर श्रीकृष्ण बोले, रुको, यह आगमोक्त गूढ़ साधकों को मेरी कृपा के बिना प्राप्त नहीं होगा। यह
अत्यन्त गहन है। यह मेरा गुप्त धन है। अस्तु ! हे उद्धव ! तुमने पूजा का विधान पूछा था, उसे ध्यानपूर्वक सुनो।
'लेप्या' और 'लेख्या' मूर्तियों को स्नान नहीं कराना चाहिये। अन्य मूर्तियों को यथाविधि स्नान कराना चाहिये।
द्रव्यैः प्रसिद्धैर्मद्यागः प्रतिमादिष्वमायिनः।
भक्तस्य च यथालब्धैर्हृदि भावेन चेवहि ॥ १५ ॥
पूजक यदि सकाम अर्थात् फल की इच्छा करने वाला हो तो पूजा साहित्य यथाविधि रहना चाहिये। पूजा
साहित्य में यदि कमी होगी तो फल भी निर्व्यंग नहीं मिलेगा। भक्त निष्काम हो और उसे पूजा में लगाव हो तो
उसे पूजा साहित्य का कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा क्योंकि भगवान को उपचार की अपेक्षा भाव ही अधिक प्रिय रहता
है। ऐसे समय अनायास जो कुछ भी मिल जाय उसमें भगवान सन्तुष्ट रहता है। वही पूजायोग यथोचित है।
निष्काम वृत्ति हो तो फल, मूल, दूब अथवा निर्मल जल इतने से ही अर्थात् सद्भाव से ही पूरा पूजायोग सफल
होता है। जहाँ मेरा भाव दृढ़ रहता है, वहाँ अन्य उपचारों की क्या प्रतिष्ठा है ? भक्तों का भाव ही मुझे प्रिय
लगता है, इससे मेरे भक्त को भी महासुख का लाभ होता है। जो भी बाह्योपचार किये जाते हैं वे सब प्रतिमा मूर्ति