सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 729, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 729

छब्बीसवाँ अध्याय ७१३
संसार को शान्त करते हैं लेकिन साधु अपने अंग से संसार को शान्त करते हैं। सूर्य दृष्टि को सहायक होने पर
दृष्याकार से सृष्टि दिखाई देने लगती है और सत्संग दृष्टि को सहायक होने पर चिन्मात्र स्वरूप से सृष्टि की
स्थिति अंकित होती है। इस प्रकार विचार करने से मालूम होता हैं कि साधु सूर्य से श्रेष्ठ हैं। साधु पृथ्वी पर के
ज्ञानसूर्य हैं और अपनी संगति से संसारीजनों को संसार से तारते हैं। मृत्युलोक में साधु ही सच्चे देवता हैं; साधु
हीनों के मित्र तथा सखा बन्धु हैं। मैं स्वयं परमानन्दस्वरूप परमात्मा साधु रूप में ही संसार में विचरण कर रहा
हूँ। देवताओं को बलि प्रदान करने से वे प्रसन्न होते हैं किन्तु सज्जन पूर्णरूप से दयालु होने के कारण वे केवल
अपनी कृपा से तारते हैं। इष्ट, मित्र, भाई बन्धु आदि केवल धन के लोभ से भजन सम्बन्ध रखते हैं किन्तु साधु
लोभरहित तथा कृपालु होने के कारण दीनों के सच्चे मित्र और बन्धु हैं। संत कृपा के दीप हैं, संत मेरा
निजस्वरूप हैं। इसीलिये सत्संग से पाप नष्ट होता है और साधक निष्पाप हो जाते हैं। साधकों को निष्पाप कर
उन्हें वे ब्रह्मस्वरूप तक पहुँचाते हैं। उद्धव! साधुओं में सचमुच ही इतनी कृपालुता होती है। मैं निर्गुणरूप में पूर्ण
ब्रह्म हूँ और साधु चलते-फिरते ब्रह्म हैं। उनकी शरण में जाने से जन्म-मरण समाप्त हो जाता है। भक्तिभाव से
साधुओं की शरण में जाने से जन्म-मरण का अस्तित्व ही नहीं रह जाता। उद्धव! सचमुच साधु शरणागत के लिये
आश्रयरूप हैं। भक्तिभाव से सत्संगति करने से इन संसारी लोगों को मुक्ति मिलती है, ऐसा उद्धव ने श्रीकृष्ण को
प्रतिज्ञापूर्वक बतलाया। सद्भाव से सत्संगति करने से ब्रह्मस्थिति स्वयं चलती हुई आती है। यह निजमर्म भगवान
ने उद्धव को अध्याय के अन्त में बतलाया। परम विरक्ति के साधन के रूप में पुरूरवा का आख्यान सुना कर
श्रीकृष्ण अध्याय के अन्त में उसका उपसंहार करते हैं।
वैतसेनस्ततोऽप्येवमुर्वश्या लोकनिःस्पृहः।
मुक्तसङ्गो महीमेतामात्मारामश्चार . ह ॥ ३५॥
पहले सूर्यवंश प्रसिद्ध था और उसमें सोमवंश का सम्बन्ध श्रीकृष्ण 'वैतसेन' इस पद के श्लोक में समाहित
कर बताते हैं। एक बार पार्वती के क्रीड़ावन में सम्पूर्ण एकान्त में शंकर और पार्वती वस्त्ररहित होकर आनन्दयुक्त
लीला कर रहे थे। तभी शिव के दर्शन के लिये अकस्मात सप्तर्षि प्रकट हुए। पार्वती को अत्यन्त लज्जा हुई और
उसने उस वन को शाप दिया। शाप यह था कि जो पुरुष उस वन में प्रवेश करेगा वह वहाँ आते ही स्त्रीरूप हो
जायगा। एक दिन सूर्यवंश का राजा सद्युम्न शाप का सामर्थ्य न जानने के कारण अपनी सेना के साथ उस वन में
शिकार के लिये आया। लेकिन वन में घुसते ही शाप के प्रभाव से वे सब स्त्रीरूप हो गये। उनके मन में उनके
पुरुषत्त्व की स्मृति ही नहीं रही। तत्काल घोड़ा घोड़ी हो गये, हाथी हथिनी हो गये; जो पुरुष थे वे स्त्रियाँ बन
गये। तब पुरुष की इच्छा से कामातुर स्त्रियाँ तत्काल वन के बाहर चली गयीं। राजा सद्युम्न भी अत्यन्त सुन्दर,
सुकुमार युवती बन गया और उसने सोम के पुत्र बुध को, प्रेम वश होकर प्रीति की माला पहनायी। बुध भी
सद्युम्न को युवती के रूप में देखकर उस पर आसक्त हो गया। इस प्रकार वे दोनों एक-दूसरे पर लुब्ध हो गये।
राजा चूड़ामणि बुधराजा ने सद्युम्नरूपी स्त्री से विवाह कर उसे अपनी पटरानी बनाया। कर्म की गति कैसी विचित्र
है। उस सद्युम्नरूपी स्त्री के गर्भ से बुध के वीर्य से पुरुरवा उत्पन्न हुआ। इस प्रकार सूर्यवंश में सोमवंश घुस गया।
यह सोमवंश के मूल की कथा है। यहीं से सोमवंश की वृद्धि हुई। सद्युम्न बुध की स्त्री बना तो उसके बाद राज्य
का कोई अधिकारी नहीं रहा और बहुत बड़ा संकट उत्पन्न हो गया। तब सूर्यवंश के कुलगुरु महायोगीश्वर
वसिष्ठ ने अत्यन्त भक्तिभाव से गौरीहर की प्रार्थना की। पार्वती को प्रसन्न कर सद्युम्न के लिये उःशाप माँगा। तब