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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 733, कुल 869 में से

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पृष्ठ 733

सत्ताईसवाँ अध्याय ७१७
तुम्हारी पूजा का विधान है उसके सम्बन्ध में कृपया मुझे बताएँ। मैं तुम्हारा अत्यन्त दीन बालक हूँ। शायद तुम
कहोगे कि यह जानने का मेरा अधिकार नहीं है। लेकिन हे श्रीकृष्ण, मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ और दूसरी बात
यह है कि तुम्हारे यहाँ शरणागत की उपेक्षा नहीं होती है। तुमने जटायु-संपाती-गजेन्द्र आदि पशु-पक्षियों का
उद्धार किया है। तुमने गणिका और वेश्या का भी उद्धार किया है। हे कृपालु ऋषिकेशी वही कृपा तुम मुझ पर
भी करो। शायद तुम कहोगे कि सृष्टि में ब्रह्मदेव, शंकर आदि सबके होते हुए मुझे ही कहने की श्रद्धा तुम्हारे मन
में कैसे उत्पन्न हुई ? तो उसका कारण भी बताता हूँ। ब्रह्मदेव संसार का निर्माणकर्त्ता होते हुए भी वह आत्मस्वरूप
भूल गया इसीलिये वह तुम्हारा ही पुत्र बनकर तुमसे आत्मज्ञान सीखा। शंकर ने भी तुम्हारे चरणों की तीर्थ-गंगा
को अपने मस्तक पर धारण कर, तथा सदासर्वदा तुम्हारे ही नाम का जप कर, सचमुच तुम्हारी की कृपा के
कारण उन्होंने आत्मस्वरूप प्राप्त किया। इस प्रकार तुम ज्ञान के निधि हो तथा पूर्णबोध के सागर हो। इसलिये
जिससे आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है वह पूजाविधि मुझे बताओ। ऐसे भक्त के भाषण से संतोष प्राप्त करने
वाले, पूर्ण निजबोध से द्रवित होने वाले तथा आत्मकृपा से विह्वल श्रीकृष्ण ने क्या कहा?
श्रीभगवानुवाच
न ह्यन्तोऽनन्तपारस्य कर्मकाण्डस्य चोद्धव।
संक्षिप्तं वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥६॥
जिसका वचन सुनते ही वेदवाणी मौन हो जाती है, जिसका स्मरण करते ही मन अपना मनं पन भूलता है,
जो वेदार्थ का प्रकाशक, जो सूर्य का भी आदिसूर्य, वह यदुनायक श्रीकृष्ण उद्धव को अपने मुख से बताने लगा।
वेद और शास्त्रों ने मेरी पूजा की जो विधि बतायी है, उसे यदि विस्तार से बताने लगूँ तो वह अनन्त और अपार
है। ब्रह्मादिक देवता भी उसका पार नहीं पा सकेंगे। उद्धव ! सुनो। मैं देवाधिदेव यदि बताने भी लगूँ तो पूरा विधि
विधान मैं भी नहीं बता पाऊँगा। कोई कितना ही ज्ञानसम्पन्न क्यों न हो लेकिन पूजाविधि का विधान बताने का
सामर्थ्य कभी भी किसी में नहीं हो सकता। इसलिये वेदशास्त्र का सार तत्त्व लेकर तुम्हें संक्षेप में बताऊँगा।
पूजाविधि का सार वैदिक, तांत्रिक और मिश्र इन तीन प्रकार का है। विधि प्रक्रिया के अनुसार उनके विभागों के
बारे में सुनो।
वैदिकस्तान्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधो मखः।
त्रयाणामीप्सितेनैव विधिना मां समर्चयेत् ॥७॥
वेद के ही मंत्र और वेद की ही विधि लेकर मेरी यथासाङ्ग पूजा करना 'वैदिक मार्ग' है। अब आगम,
प्रयोग के बारे में भी सुनो। आगम के ही मंत्र और आगम की ही विधि लेकर मेरी पूजा आगमोक्त रीति से करने
का ही नाम है 'तंत्रमार्ग'। अब मिश्रविधि के सम्बन्ध में भी सुनो। वेद के मंत्र और तंत्र की विधि को लेकर पूजा
करना, इसी का नाम है 'मिश्रमार्ग'। इन तीन प्रकार की विधियों से मेरी यथासाङ्ग पूजा करना, यही मेरा तीन
प्रकार का याग है। इसके योग से मैं श्रीकृष्ण संतोष प्राप्त करता हूँ और सपरिवार साथ में खड़ा रहता हूँ। इस
प्रकार मेरा भजन तीन प्रकार का है। इनमें से जिस पर जिसकी पूर्ण श्रद्धा हो, उस विधि से उसे पूजा करनी
चाहिये। भक्ति से किये जाने पर मुझे प्रत्येक विधि में समान रूप से तृप्ति होती है। भक्तिभाव से जो मेरा पूजन
होता है, उससे मैं जनार्दन अत्यन्त तृप्त होता हूँ। यह आगमोक्त यज्ञ है और तीनों लक्षण समान हैं। वैदिकादि तीन
प्रकारों से मेरा पूजन करने पर मैं श्रीकृष्ण तृप्त होता हूँ। अब पूजा के अधिकार के सम्बन्ध में भी बताता हूँ। सुनो।