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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 734, कुल 869 में से

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पृष्ठ 734

७१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यदा स्वनिगमेनोक्तं द्विजत्वं प्राप्य पूरुषः।
यथा यजेत मां भक्त्या श्रद्धया तन्निबोध मे ॥ ८ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये द्विजन्मा तीन वर्ण, इनके अधिकारों का लक्षण इस प्रकार है—गर्भ से आठवें
वर्ष में उपनयन करना यह पूर्ण अधिकार ब्राह्मण का है। क्षत्रियों का शुद्ध अधिकार यह है कि उन्हें बारहवें वर्ष
में व्रतबंध करना चाहिये तथा वैश्यों को सोलहवें वर्ष में व्रतबन्ध करना चाहिये। गायत्री मंत्र के उपदेश के साथ
उपनयनविधि करना यह दूसरा जन्म है इसे 'सावित्री जन्म' कहते हैं। तीनों वर्णों के लोग द्विजन्मा होने के कारण
वेदोक्त विधि के लिये उपयुक्त हैं। उद्धव इसी का नाम वेदोक्त अधिकार लक्षण है। अब मेरे प्रिय भक्त उद्धव!
मेरी पूजाविधि का स्थान बताता हूँ, सुनो।
अर्चायां स्थण्डिलेऽग्नौ वा सूर्ये वाप्सु हृदि द्विजे।
द्रव्येण भक्तियुक्तोऽर्चेत् स्वगुरू माममायया ॥ ९ ॥
मेरी पूजा करने के स्थान आठ प्रकार के हैं। उनके लक्षण ध्यान से सुनो। जो 'प्रतिभा' हमें प्रिय हो वह
मेरी पूजा का पहला स्थान है। जमीन पर स्थंडिल (मिट्टी का चौकोर चबूतरा) बनाकर पूजा करना दूसरा
स्थान है। 'अग्नि का तेज' मेरा ही स्वरूप है, अतः वह मेरी पूजा का तीसरा स्थान है और 'सूर्यमण्डल' में
जो पूजा करते हैं वह मेरा चौथा पूजास्थान है। 'उदक' में मेरा पूजन करना पाँचवाँ पूजास्थान है और 'हृदय'
में मेरा आवाहन करना छठवाँ पूजास्थान है। शालिग्राम मेरा अचेतन स्वरूप है तथा 'ब्राह्मण' मेरा सचेतन
स्वरूप है। वह अखण्ड पूर्ण परब्रह्म ही है। इसलिये उनकी सम्मानपूर्वक षोडशोपचार पूजा करनी चाहिये।
ब्राह्मणों के प्रति जिसकी ब्रह्मभावना होती है उसे अत्यन्त भाग्यवान समझना चाहिये। वह ब्रह्मादिकों को भी
पूज्य है। इतना ही नहीं बल्कि मैं देवाधिदेव भी उसे वंदन करता हूँ सभी पूजनीयों में मुख्यरूप से ब्राह्मण
पूज्य हैं। उद्धव! वही मेरा अत्यन्त श्रेष्ठ सातवाँ पूजास्थान है। इन समस्त पूजनीयों में पूज्यत्व की दृष्टि से
पूजा करने योग्य, वरिष्ठों में भी अति वरिष्ठ, जो मेरा आत्मा ही है वह 'गुरुराजा' सबको वन्दनीय है।
सद्भाव से जिसके चरण छूने से मैं पूर्णब्रह्म सुखी होता हूँ, उसका मद्रूप से स्तवन करने से मुझ परमात्मा को
अत्यन्त उल्हास होता है। सद्गुरु का नामस्मरण भयंकर संसारभय का निवारण करता है। जन्म-मरण का
निराकरण कर निजात्मबोध से पूरी तरह तृप्त कर देता है। मैं परमात्मा नारायण गुरुरूप से प्रकट होकर शिष्य
के द्वारा परब्रह्म का पूर्णत्त्व प्रकाशित करता हूँ। ब्रह्म का परब्रह्मत्त्व सद्गुरु के कारण ही सत्य होता है। गुरु
की महिमा इतनी अगाध और गहन है। सारांश, सद्गुरु ज्ञानधन हैं तथा हरिहर के लिये भी पूर्णरूप से
वन्दनीय हैं। सद्गुरु मेरा सत्स्वरूप अधिष्ठान है तथा आठवाँ पूजास्थान है। उद्धव! मेरे इस आठवें पूजास्थान
का अखण्ड स्मरण रखने से उस स्मरण से ही मेरी पूजा हो जाती है। इस प्रकार इन आठ पूजास्थानों के बारे
में उत्तम लक्षणों से युक्त जानकारी तुम्हें दी। अब उस पूजा के भिन्न-भिन्न प्रकार भी तुम्हें बताता हूँ। इन सारे
अधिष्ठानों में हमें जो सबसे प्रिय लगता हो, उसे ही पूजा का मुख्य लक्षण मानना चाहिये। उसमें भी रहस्य
की पहचान बताता हूँ, सुनो। लोकरंजन करने की प्रवृत्ति छोड़ कर, दंभ के उपाय त्याग कर, कपट का
व्यवहार न कर, सच्चे भक्तिभाव से भजनतत्पर रहना चाहिये। उद्धव! ये जो आठ पूजास्थान बताये, उनमें
निष्कपट रूप से पूजा करना यही सबसे उत्तम पूजन है। उसमें जो निष्कपट सेवा होती है, वह देवाधिदेव को
अत्यन्त प्रिय है। अब पूजा की विस्तृत विधि भी बताता हूँ। सुनो।