सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 724, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 724

७०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कारण देह सम्बन्धी 'ममता' बढ़ती है। यह बढ़ी हुई अहंममता महादुःख के भँवर में फँसती है। उसी निज दुःख
का निवारण करने के लिये भक्तिभाव से श्रीगुरु की शरण में जाना चाहिये। गुरु की कृपा पूर्ण होने तथा उनके
द्वारा देह की अहंत प्रकट कर देने से सारा संसार 'मैं' ही हूँ ऐसा अनुभव होता है। छोटा-बड़ा जो भी कुछ सृष्टि
में दिखायी पड़ता है, वह सब मेरा ही स्वरूप है, मेरे 'मैं' पन की इतनी प्रसिद्धि है कि वह सारे त्रैलोक्य को
व्याप लेती है। ऐसे शुद्ध 'मैं' पन से परिपूर्ण होने पर देह को मैं कहने वाला कौन होगा? 'मैं'-'तू' सब कुछ वहाँ
समाप्त हो जाता है। इसी का नाम है 'निरभिमान'। इस प्रकार मेरे 'मैं' पन का विचार करने पर 'मेरा पन' अर्थात्
'ममता' पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है। यदि मेरे 'मैं' कहने लायक कोई दूसरा स्थान शेष हो तभी वहाँ ममता का
स्फुरण हो सकता है। उसे मैंने चिन्मात्रस्वरूप से निगल ही लिया है। इसलिये मैं पन से 'मैं और मेरा', तथा 'तू'
पन से तेरा कहने का प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसा परब्रह्म से ऐक्य होने के कारण ही सहज ही 'निर्मम' होता है।
उद्धव ! 'निर्मम' और 'निरभिमान' वह यही है। संतों का निजगूढ़ तथा पाँचवाँ और छठवाँ लक्षण यही है। इस
प्रकार जो सचमुच ही निर्मम और अहंकार रहित होकर रहते हैं, उन्हें द्वंद्व दुःख के पहाड़ों की भी बाधा नहीं
होती। देह को प्रारब्ध के भरोसे छोड़ देने पर चाहे सुख दुख की झड़ी भी लग जाय तो भी वह ब्रह्मसुख के
चौराहे पर देह का केवल द्रष्टा-साक्षी होकर रहता है। देह को बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त होने पर भी वह मन में हर्षित
नहीं होता अथवा कोई देह को नरक में ढकेल दे तो दुःखी नहीं होता। देह बाघ के मुँह में फँस जाय तो भी वह
दुःख से विह्वल नहीं होता अथवा पालकी में बैठने पर आनन्दित नहीं होता। परछाई विष्ठा पर पड़े अथवा
पालकी पर चढ़े इससे उस पुरुष को सुख या दुःख कुछ भी नहीं होता। उसी प्रकार देहभोग मुक्त के लिये होते
हैं। उसकी दृष्टि में दुःख दुःख से वंचित होता है और सुख सुख को भूलता है, इसीलिये वह निर्द्वन्द्व बनता है।
उसी प्रकार जो निर्मम और अभिमानरहित होता है उसे भेद का भान नहीं रहता और अभेद में द्वंद्व बन्धन मिथ्या
होता है। यह 'निर्द्वन्द्व' अर्थात् अभेद भाव मुक्त का सातवाँ गुण है। अरे ! जरा देखो। जो निर्द्वन्द्व और निरभिमान
होता है, उसे जब अपना देह बिलकुल मिथ्या लगता है तो उसे देह सम्बन्धी परिवार बढ़ाने का अवकाश कहाँ
है? अपने सगे-सम्बन्धी, धन सम्पदा, पत्नी-बच्चे इनके साथ रहकर भी वह इन्हें स्पर्श नहीं करता। जिस प्रकार
जगे हुए व्यक्ति के लिये स्वप्न का व्यवहार नहीं रहता, उसी प्रकार साधुओं का भी संसार नहीं होता। सारांश,
साधु परिग्रही होते हुए भी पूर्णरूप से 'अपरिग्रही' होते हैं। यह उनका आठवाँ मुख्य लक्षण है। संसार के लिये
यह दुर्गम है क्योंकि साधु परिग्रही दिखाई देते हैं किन्तु परिग्रही नहीं होते हैं। संतों की यह स्थिति प्राप्त करने के
लिये उनकी ही भक्ति करनी चाहिये। साधुओं के ये आठ लक्षण वास्तव में ब्रह्मा के अष्ट अंग ही हैं अथवा
निर्गुण की ये अष्ट महासिद्धियाँ ही साधु के आठ पंखुड़ियों का कमल खिला हो, ऐसा यह संतों का स्वानंदशील
साधु का लक्षण है। ये श्रेष्ठ आठ गुण सभी भूषणों के भूषण हैं। ये गुण जिनमें पूर्णरूप से अंकित हो जायें वे
साधु सज्जन नितांत पवित्र हैं। अन्य किसी का भी संग अत्यन्त बाधक होता है। लेकिन यह सत्संगति वैसी नहीं
है। इस संग के योग से देहसंग की आसक्ति टूटती है। इसके लिये उन्हें उपदेश नहीं करना पड़ता। केवल संग ही
देही को विदेही बनाता है। वही अपूर्वता सात श्लोकों में श्रीहरि वर्णन करते हैं।
तेषु नित्यं महाभाग महाभागेषु मत्कथाः।
सम्भवन्ति हिता नृणांजुषतां प्रपुनन्त्यघम्॥ २८॥
इन्द्र पद से ब्रह्मलोक तक प्राप्त होने को बड़ा 'भाग्य' कहते हैं। लेकिन यह भी सत्संग का एक अंश भी
नहीं है। ऐसी सत्संगति महाभाग्यवानों को ही प्राप्त होती है। साधु मेरी यशगाथा का गायन करते हुए