श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
का एक और चमत्कार है। वह यह कि इस नाव पर जो चढ़ते हैं वे डूबते हैं और जो 'तल' में रहते हैं, वे तर
जाते हैं। यहाँ दीनों के प्रति दया ही मुख्य रूप से उपाय है। इस दया का उद्देश्य स्वयं श्रीकृष्ण बताते हैं।
अन्नं हि प्राणिनां आर्तानां शरणं त्वहम्।
धर्मो वित्तं नृणां प्रेत्य सन्तोऽर्वाग् विभ्यतोऽरणम् ॥ ३३ ॥
अन्न के बिना प्राण कभी नहीं बचता, क्योंकि प्राणियों के पोषण का पूर्ण सामर्थ्य अन्न में ही होता है। धर्म
से प्राप्त की हुई सम्पत्ति इस लोक में हमारा संरक्षण करती है। वही धर्मरूप धन देह में भी उत्तम गति प्रदान
करता है। संसार में नितांत त्रस्त और त्रिविध तापों संतप्त शरणागतों का आश्रयस्थान होने के नाते मैं नारायण ही
उनका संरक्षक होता हूँ। मेरा नामस्मरण करने से जन्म-मरण सहज ही दूर होता है; मेरी शरण आने पर भला
कौन-सा दुःख उसे पीड़ा देगा ? दुःख का भय होने के पहले ही जो सद्बुद्धि से साधु की सेवा करते हैं उन्हें
संसारभय की व्याधि जरा भी नहीं सताती। यदि प्राणी का पतन हो जाय और वहाँ सौभाग्य से सज्जनों की भेंट
हो जाय तो अधोगति का निवारण कर वे जन्म-मरण को भी समाप्त कर देते हैं। संसारसागर तरने के लिये
सत्संगति यही सबसे अच्छा आधार है ! भक्ति भाव से संतों के चरण छूने से उनके द्वारा दीनों का उद्धार होता है।
सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्कः समुत्थितः।
देवता बान्धवाः सन्तः सन्त आत्माहमेव च ॥ ३४ ॥
जिस प्रकार सूर्य अपने तेज से अन्धकार के साथ-साथ रात्रि को भी समाप्त कर देता है, उसी प्रकार
सत्संगरूपी सूर्य का उदय होते ही, वह अविद्या की रात्रि निश्चित रूप से समाप्त कर देता है। बाहर सूर्योदय होते
ही चोरों का भय दूर होता है, उसी प्रकार सत्संगति प्राप्त होने से संसार का भय कल्पांत में भी शेष नहीं रहता।
बाहर का सूर्योदय होते ही पक्षी अपना घोंसला छोड़ देते हैं, उसी प्रकार सत्संग का सूर्योदय होने पर जीव अपने
देहरूपी घोंसले छोड़ देते हैं (देहाभिमान छोड़ देते हैं)। बाहर के सूर्यकिरणों से कमलिनी हर्ष से विकसित होती
हैं, उसी प्रकार सत्संग रूपी सूर्य के प्रकाश से निर्विकल्प कमलिनी प्रफुल्लित होती है। आकाश में सूर्योदय होते
ही नरमादा चक्रवाक का मिलन होता है। उसी प्रकार सत्संग प्राप्त होने पर जीव और शिव ये दोनों एक हो जाते
हैं। बाहर सूर्य की भोर होते ही लोग अपने गाँव का रास्ता चलने लगते हैं, उसी प्रकार सत्संग सूर्य का प्रकाश
होते ही मुमुक्षु निजधाम चले जाते हैं। बाह्य सूर्य का उदय होते ही कर्म की गति शुरू होती है, उसी प्रकार सत्संग
सूर्य की संगति से निष्कर्म प्रवृत्ति प्रारम्भ होती है। सूर्य के उदय के समय वेदज्ञ लोग अर्घ्यदान देते हैं, उसी
प्रकार सत्संग सूर्य का उदय होते ही मुमुक्षु देहबुद्धि को तिलांजलि देते हैं। सूर्योदय होने पर याज्ञिक होम में
आहुति देते हैं, उसी प्रकार सत्संगरूप सूर्योदय होने पर मुमुक्षु ज्ञानाग्नि में अहंता की आहुति देते हैं। सूर्य आकाश
में उदित होकर संसार में जड़ निद्रा को दूर भगाता है; संत चिदाकाश में उदित होकर जीवों को चिद्प्रकाश से
जागृत करते हैं। इसलिये साधु को सूर्य जैसा कहा जाय तो उचित ही है, लेकिन यह बात पूरी तरह गौण है
क्योंकि सूर्य का अस्त होता है किन्तु साधु सदासर्वदा प्रकाशमान ही रहते हैं। सूर्य को बादल ढँक सकते हैं किन्तु
साधु संसार में सदा निर्मल ही रहते हैं। सूर्य को सदा सर्वदा परिक्रमा करनी पड़ती है किन्तु साधु सदा अटल ही
रहते हैं। ग्रहण काल में सूर्य को राहु ग्रस लेता है किन्तु साधु ग्रहों का अस्तित्व ही नष्ट कर आत्मानंद में रहते
हैं। गहरा धुँधलका छा जाने पर रविमण्डल आच्छादित हो जाता हे किन्तु साधु को अन्धकार, धुँधलका अथवा
मोहपटल की जरा भी बाधा नहीं होती। सूर्य अपनी किरणों से सबको तप्त करता है लेकिन साधु अपने अंग से