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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 739, कुल 869 में से

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पृष्ठ 739

सत्ताईसवाँ अध्याय ७२३
केवल प्रोक्षण करें। उसी से देवपूजाघर का भी प्रोक्षण करें, स्वयं प्रोक्षण कर लें तथा देवपूजा स्थान का प्रोक्षण
कर पूजा प्रारम्भ करें। पाद्य, अर्घ्य और आचमन के लिये तीन पात्र रखें और उनमें पानी भर कर तीनों पात्रों में
भिन्न-भिन्न पदार्थ डालें। श्यामाक, कमल, दूब और विष्णुकांता ये पाद्य पात्रों के शुद्ध द्रव्य हैं। गन्ध, फूल, फल,
अक्षत और दर्भाग्र ये अर्घ्य पात्रों में डाले जाने वाले शुद्ध द्रव्य हैं। इलायची, खस, जायफल, लौंग, कपूर, कंकोल
ये 'आचमनीय' पात्रों में डाले जाने वाले शुद्ध पदार्थ हैं।
पाद्यार्घ्याचमनीयार्थं त्रीणि पात्राणि दैशिकः।
हृदा शीर्ष्णाथ शिखया गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत् ॥ २२॥
जैसी गुरुमंत्र की दीक्षा हो उसके अनुसार मार्ग पकड़कर गुरु सम्प्रदाय के अनुसार, पाद्यादि तीनों पात्र रखें।
हृदय मंत्र से पाद्य दें, शिरोमंत्र पढ़कर अर्घ्य अर्पण करें तथा शिखामंत्र से आचमन करें। आगमोक्त गुरुसंस्कार
जैसा हो उसके अनुसार यह सब करें। ये तीनों पात्र स्वयं गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर देवता को अर्पण करें।
गुरुसम्प्रदाय से पवित्र हो जाने के कारण आत्मद्रष्टा तथा दीक्षा का विवेक जानने वाला जो श्रीकृष्ण है, उसने
स्वयं ही पूजक को 'देशिक' कहा है। आगमशास्त्र का निजमार्ग, भूतशुद्धि और प्राणप्रतिष्ठा का योग, इस
सम्बन्ध में श्रीकृष्ण अगले श्लोक में सब कुछ बता रहे हैं।
पिण्डे वाय्वग्निसंशुद्धे हृत्पद्मस्थां परां मम।
अण्वीं जीवकलां ध्यायेन्नादान्ते सिद्धभाविताम्॥ २३॥
वायु बीज से आवाहन कर, पिंगला नाड़ी से प्राण को पूरी तरह भर कर (दाहिनी नासिका से भीतर की
ओर श्वाँस लेकर, कुंभक से उसे रोक कर मात्रा धारण से धारण करें।) (उदाहरणार्थ—पूरक चार मात्राओं से
करने पर कुंभक १६ मात्राओं से तथा रेचक मात्राओं से करना चाहिये।) वायु को उतनी ही देर तक रोक कर
रखना चाहिये ताकि वह किसी अन्य रास्ते से न निकल जाय और फिर उसे धीरे-धीरे बाहर छोड़ना चाहिये।
ऐसा प्राणायाम करने से शरीर क्षीण हो गया है ऐसी कल्पना करें। इस प्रकार शरीर शुष्क हो गया है, ऐसी
कल्पना कर उसका दहन प्रारम्भ करना चाहिये। मूलाधार चक्र का अग्नि अग्निमंत्रों से जागृत कर और उसे देह
से लगाकर अपना देह भस्म हो गया है ऐसी कल्पना करनी चाहिये। देह अग्नि से अत्यन्त तप्त हुआ है, यह
मानकर उसे चन्द्रमा के बीज से चन्द्रामृत लाकर उससे शरीर को शीतल करना चाहिये। इसमें जिस नये देह की
कल्पना करें वह सभी इन्द्रियों से युक्त, निरोगी और कार्यक्षम हो और उसके हृदय कमल में मेरी आण्विक अर्थात्
सूक्ष्म जीवकला है यह देखें। मेरी वह जीवकला सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म है इसीलिये उसे अणुरूप (अग्नि)
कहते हैं। वही सारे संसार का विश्राम स्थल है। अकार, उकार और मकार को भी अण्वी जीवज्योति ही प्रकाशित
करती है। वह तो शब्दों से परे होने के कारण योगी लोग नाद के अंत में उसे देखते हैं। देह में वह अन्तर्बाह्य
परिपूर्ण से भरी हुई है लेकिन सूक्ष्म होने के कारण उसका आभास नहीं होता। योगी लोग उसे आसन-प्राणायाम
आदि के योग से हृदयकमल में देखते हैं। वह अणुरूपी जीवकला अव्यक्त रहती है, उसे योगी लोग आत्मनिष्ठा
से व्यक्त कर उसकी महामूर्ति का हृदय में चिन्तन करते हैं। 'नार' अर्थात् जीवसमुदाय, उसका 'आयतन' अर्थात्
आधारस्थान, वही श्रीनारायण की महामूर्ति है जिसका सज्जन लोग हृदय में चिन्तन करते हैं।
तयाऽऽत्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पूज्य तन्मयः।
आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्ताङ्गं मां प्रपूजयेत् ॥ २४॥