श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 721, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवाँ अध्याय ७०५
अदृष्टादश्रुताद् भावान्न भाव उपजायते।
असम्प्रयुञ्जत: प्राणान् शाम्यति स्तिमितं मन: ॥ २३ ॥
जिसे न कभी देखा है न सुना है, ऐसे विषय से पुरुष का मन कभी क्षुब्ध नहीं होता। लेकिन पहले के भोगे
हुए जो विषय हैं, उनका स्मरण मन में होते ही स्त्री की संगत न होने पर भी वृत्ति का क्षोभ होता है। इस प्रकार
पहले से चली आ रही विषयासक्ति ही पुरुष को निश्चित रूप से बाधक होती है। वह एकान्त में अकेला ही बैठा
हो, लेकिन वासना के संस्कार से उसकी वृत्ति सकाम होकर क्षुब्ध होती है। पिछली रात के पकवान ढँककर रखे
रहते हैं, वे दूसरे दिन सुबह बिना पकाये खाये जा सकते हैं। उसी प्रकार वासना में स्थित काम ही पुरुष को
सकाम कर देता है। उस काम का क्षोभ होने पर कर्म और अकर्म का स्मरण नहीं हो पाता। सारांश, वासना-
कामसंगति यही परमार्थ में साधक होते हैं। इसलिये सभी साधकों को स्त्री विषय की आसक्ति छोड़ देनी चाहिये।
मन में यदि कामासक्ति क्षुब्ध हो जाय तो साधकों को एक उपाय करना चाहिये। उन्हें बाह्य इन्द्रियवृत्ति पर
नियंत्रण रखना चाहिये, ताकि धीरे-धीरे मन को शान्ति प्राप्त हो। कर्मेन्द्रियों को दृढ़ वैराग्य से वश में रखने से,
मन में काम कितना ही क्षुब्ध क्यों न हो जाय लेकिन वह अपने आप ही शान्त हो जाता है। जिससे अनर्थ हो
जाता है। वह संगत ही छोड़ देनी चाहिये। वह संगत्याग कैसे किया जाय उसका स्पष्टीकरण राजा श्लोकार्थ में
कर रहे हैं।
तस्मात्सङ्गो न कर्तव्यः स्त्रीषु स्त्रैणेषु चेन्द्रियैः।
विदुषां चात्यविश्रब्धः षड्वर्गः किमु मादृशाम् ॥ २४ ॥
जो ज्ञानियों को भी चक्कर में डालता है, कामी पुरुष को तत्काल अपने वश में कर लेता है, ऐसा यह
स्त्रीसंग अनर्थकारी है और स्त्रैण पुरुषों के लिये तो और भी अधिक अनर्थकारी है। इसलिये जो अपना सच्चा
हित साधने के इच्छुक हों ऐसे परमार्थी लोग कर्मेन्द्रियों को स्त्री और स्त्रैण की संगत न होने दें। मन विषयों में
भले ही क्षुब्ध हो जाय फिर भी हमें अपने इन्द्रियों को काबू में रखना चाहिये। जिससे मन का विषय अपने आप
ही समाप्त हो जाता है। विषय और स्त्रीसंगत साथ होने पर विषयासक्ति से मन क्षुब्ध होता है। क्षणार्ध के लिये
हुए स्त्रीसंग के कारण भी सज्ञान लोग अनर्थ में पड़े हैं। स्त्री को देखकर देवेन्द्र कामातुर हो गया और उसके
शरीर में छिद्र पड़ गये और गुरुपत्नी तारा ने चन्द्रमा को भी कलंकित करके छोड़ा। सौभरी नाम का ऋषि महान
तपस्वी था, वह मत्स्य का मैथुन देखकर कामातुर हो गया (यह कथा नौंवे स्कंध के छठवें अध्याय में आयी है)
इस प्रकार यह स्त्रियों का स्कंध अनर्थकारी है। जब ब्रह्मदेव अपनी ही कन्या को देखकर कामासक्त हो गया तो
औरों की क्या बात की जाय ? कामिनी का संग महाभयंकर है। शिव का लिंगपतन इसी कारण हुआ। इन स्त्रियों
की संगत में बड़े-बड़े सज्ञान और योगी भी फँस गये हैं। नारद ने केवल विनोद ही विनोद में कृष्ण की स्त्री माँग
ली, उसके लिये गंगातट पर उसकी नारदी बना दी और उसके गर्भ से साठ पुत्र उत्पन्न हुए। सहज मौज के लिये
भी यदि स्त्रियों के पास जाएँ तो जब सज्ञानों के लिये भी वह संगत बाधक होती है तो औरों की क्या बात करें ?
आधे क्षण के लिये स्त्रियों की संगत करके ज्ञानी भी ठग गये हैं। इसलिये जो स्त्रीसंग पर विश्वास करेंगे वे मेरी
ही तरह दुःखी होंगे। इसलिये स्त्री संग पर विश्वास रखने से छह इन्द्रियों का समूह सबको चक्कर में डाल देता
है। इसीलिये इन्द्रियों को वश में रखकर स्त्रियों का सर्वथा त्याग करना चाहिये। इस प्रकार स्त्रियों की संगति
छोड़कर इन्द्रिय वृत्तियों को नियंत्रण में रखकर राजा ने परम शान्ति प्राप्त की। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।