श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीभगवानुवाच
एवं प्रगायन् नृपदेवदेवः स उर्वशीलोकमथो विहाय।
आत्मानमात्मन्यवगम्य मां वै उपारमज्ज्ञानविधूतमोहः ॥ २५॥
जिसने उर्वशी सह स्वर्ग के सारे भोगों का भोग किया, जिसे देवता भी श्रेष्ठ मानते हैं; जो सभी समस्त
राजाओं का मुकुटमणि था, जिसके आगे राजा साष्टांग दण्डवत् करते थे, ऐसा चक्रवर्ती राजा पुरु उर्वशी का तथा
स्वर्ग का उपभोग कर विरक्त हुआ, इसलिये वह एक भाग्यशाली राजा था। जिन्हें विषयों का लाभ ही नहीं हुआ
ऐसे विरक्त योगी बहुत दिखायी देते हैं किन्तु स्वर्ग की देवांगना का उपभोग कर राजा पुरुरवा विरक्त हुआ, इस
दृष्टि से वह बहुत ही धन्य है। पुरुरवा जैसी विरक्ति अन्य किसी में नहीं देखी, इसलिये पुरुरवा सारे त्रिभुवन में
धन्य हे ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण अपने मुख से वर्णन करते हैं। अनुताप के आवेग में उसने अपनी स्थिति की निन्दा
कर स्त्रीविषय की आसक्ति छोड़ दी और मोह को सचमुच ही धो डाला। पश्चात्ताप की अँगीठी सुलगा कर,
वैराग्य का पुट देकर, विचारों से भलीभाँति इन्द्रियदमन कर उसने काममोह का दाग धो दिया। जिस प्रकार सुवर्ण
का पुट देने से उसका वजन घट जाता है किन्तु गुणवत्ता बढ़ जाती है, उसी प्रकार आत्मानुभव के लाभ से वृत्ति
को भलीभाँति धो-पोंछ दिया। इस प्रकार ऐसी अत्यन्त शुद्ध वृत्ति हो जाने के कारण विवेक वैराग्य रूप सम्पत्ति
से और पूर्ण पश्चात्ताप से वह मेरे कृपा प्रसाद का सुपात्र बना। मेरी कृपा के बिना देह में कभी अनुताप उत्पन्न
नहीं होता। जिसमें पूर्ण अनुताप हुआ दिखायी दे उसके प्रति मेरी पूर्ण कृपा है, ऐसा समझना चाहिये। मेरी कृपा
होने से जीव पूर्ण ब्रह्मरूप होता है और देहाभिमान समूल नष्ट होकर 'मैं' 'तू' का आभास ही नहीं होता। फिर
कार्य, कर्म, और कर्ता; भोग्य, भोग और भोक्ता; दृश्य, दर्शन और द्रष्टा यह त्रिपुटी बिलकुल शेष नहीं रहती।
तीन गुणों की त्रिपुटी का कारण जो मूलभूत अज्ञान है वह सद्गुरु कृपा से समाप्त हो जाता है। रस्सी से सर्प का
भास होना जिस प्रकार रस्सी को पहचानने से समाप्त हो जाता है उसी प्रकार गुणों के साथ अविद्या भी गुरुपदेश
से अदृश्य हो जाती है। सद्गुरु के उपदेश के अनुसार जब द्वैत का भान नहीं होता तो फिर उर्वशी का भोग कौन
करेगा? राजा आत्मानंद से अत्यन्त तृप्त हो गया। राजा जब ब्रह्मरस से तृप्त हुआ, तब वह उर्वशी को छोड़,
स्वर्गलोक छोड़कर आत्मानंद से तृप्त होकर वहाँ से चल पड़ा। अन्य ज्ञाता स्त्रियों को अवश्य त्याग करते हैं
किन्तु उनसे कामासक्ति का त्याग नहीं होता। लेकिन राजा की वैसी स्थिति नहीं थी। वह वास्तविक विरक्ति में
पहुँच गया था ऐसी विरक्ति में जहाँ स्त्री विषय की बात ही नहीं उठती, ब्रह्मानन्द से सारी सृष्टि भर जाती है, ऐसे
आत्मानंद की पुष्टि से वह तृप्त हुआ। ऐसे आनन्दरूप में वह सहज ही मत्स्वरूप होकर मुझसे मिल गया।
कल्पना से उत्पन्न काम-विषय को जीत कर वह आत्मानंद में नाचने लगा। ऐसे दृढ़निश्चय से उसे मेरा
निजस्वरूप प्राप्त हुआ और उसी ने अपना इतिहास अपने सुख समाधान के लिये सुनाया। अनुताप के आवेग में
सहज ही अविद्या का नाश हो वह आत्मसुख से तृप्त हुआ। ऐसा निजलाभ प्राप्त करना हो तो स्त्रियों की
विषयासक्ति छोड़ देनी पड़ेगी और अच्छी संगति करनी होगी। यही बात श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
ततोदुःसङ्गमुत्सृज्य सत्सुसज्जेतबुद्धिमान्।
सन्त एतस्यच्छिन्दन्ति मनोव्यासङ्गमुक्तिभिः ॥ २६ ॥
यदि दुःसंग हो तो उसे अवश्य छोड़ देना चाहिये। अब दुःसंग कैसा ? तो स्त्री और स्त्रैण इनसे अधिक
दुःसंग और कोई नहीं है जो वेदशास्त्र को नहीं मानता, जो परमार्थ पर विश्वास नहीं करता और जिसका अन्तर