श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 725, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवाँ अध्याय ७०९
भगवद्भावना से ही व्यवहार करते हैं। वह कथा यदि अकस्मात भी सुनायी पड़ी तो कलियुग के सारे पाप
तत्काल धो देती है। वह गंगा से भी अधिक पवित्र है। जहाँ मेरी निजकथा का गायन होता है, वह तीर्थ स्थान भी
पवित्र हो जाते हैं। ऐसे भगवान की कथा कीर्ति का साधु घोष करते रहते हैं। स्वयं भागीरथी भी मन ही मन
चिन्तन करती रहती है कि कभी कोई साधु मेरे पास आये तो मेरे सारे पाप धुल जायें। मेरे मन में पार्वती का द्वेष
होने के कारण मैं भी पाप से बद्ध हूँ। वह पातक भी संतचरणों से झड़ जायगा क्योंकि सत्संगति से सारे पाप घुल
जाते हैं अथवा जिसके मुख में हरिनाम की कीर्ति होगी उसके पैर यदि मेरे पात्र तक पहुँचेंगे तो मेरे सारे पाप चले
जायेंगे, ऐसा स्वयं भागीरथी कहती है। इस प्रकार भागीरथी भी संतों के संगति की निरन्तर इच्छा करती है। ऐसा
उन संतों के मुख से मेरी कथा अत्यन्त आदर से जो श्रोता सुनेगा उसका भाग्य सचमुच मैं भी वर्णन नहीं कर
पाऊँगा। मेरी कथा में रुचि रखने से उसमें नित नया माधुर्य मिलने लगता है और आदरपूर्वक सुनने से करोड़ों
पाप जल कर नष्ट हो जाते हैं। मेरी कथा अथवा मेरा नाम सारे पातकों को भस्म कर देता है। उद्धव ! चित्तशुद्धि
का अत्यन्त सुगम मर्म यही है। अनेक प्रकार के योग अथवा वेदाध्ययन करने से भी मन पवित्र नहीं होता। उसी
हरिकथा का श्रवण करने से अंतःकरण पवित्र होता है। अबद्ध रीति से वेद का पठन करने से अनेक प्रकार के
दोषों की बाधा होती है। किन्तु नाम यदि अशुद्ध भी कहा जाय तो भी उसे कहने वाले परमार्थ से शुद्ध ही हो जाते
हैं। अनेक प्रकार के योग, याग अथवा वेदाध्ययन के अधिकारी केवल ब्राह्मण ही होते हैं। किन्तु उद्धव ! कथा के
श्रवण से चारों वर्ण पावन होते हैं। जब कथाश्रवण से इतना लाभ है तो फिर सभी लोग उसका श्रवण क्यों नहीं
करते, ऐसा यदि कोई कहे तो उसका उत्तर है भगवत्कृपा के बिना किसी को वह भाग्य प्राप्त नहीं होता। जिन
पर भगवान की पूर्ण कृपा रहती है, उनका ही कथा कीर्तन से प्रेम रहता है। भाग्य से वही श्रेष्ठ हैं। ऐसा श्रीकृष्ण
स्वमुख से बताते हैं। मेरा नाम और यश संसार को पवित्र कर देता है ऐसा श्रीकृष्ण ने विह्वल होकर उद्धव से
कहा। किन्तु ऐसी भगवत्कथा हमें कैसे प्राप्त हो ? उसी के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण अगले श्लोकार्थ में स्पष्ट करके
बताते हैं।
ता ये शृण्वन्ति गायन्ति ह्यनुमोदन्ति चादृताः ।
मत्पराः श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दति ते मयि ॥ २९॥
कोई अपने घर के काम से कहीं जा रहा हो और जाते-जाते सहज ही उसके कान में हरिकथा पड़ जाय तो
कृष्ण कीर्ति की कथा के अक्षर कर्णद्वार में घुसते ही भीतर के सारे पातक खड़बड़ा कर बाहर आ जाते हैं। सिंह
की गर्जना कान पर आते ही जिस प्रकार मदमत्त हाथी की हालत खराब हो जाती है, उसी प्रकार हरिकथा कान
पर पड़ते ही महापापों की राख हो जाती है। इस प्रकार पातकों का कचरा साफ होते ही हरिकथा में रुचि जगती
है और कथा श्रवण की ओर ध्यान देने से मन भी हर्ष से प्रफुल्लित होता है। जैसे-जैसे कथा का रहस्य समझ में
आने लगता है वैसे-वैसे उसके प्रति प्रेम बढ़ने लगता है और उसी प्रेम के आवेग में वह स्वयं ही वह कथा गाने
लगता है। लोकलज्जा की गाँठ खोलकर खुले मन से हरि के गुणानुवाद गाने से रुचि अपने आप उत्पन्न होने
लगती है तो वह मन में लज्जा नहीं करता। भक्तिभाव से भगवत्कथा गाने से अपने आप रुचि उत्पन्न होती है।
इसलिये वह अधिक आदर से और अधिकाधिक श्रद्धा से कथा सुनाने लगता है और जैसे-जैसे रुचि से कथा
सुनाता है वैसे-वैसे श्रद्धा भी अधिक बढ़ने लगती है और अन्त में प्रेम का ज्वार आकर उसमें श्रद्धा भी डूब जाती
है। कथा कीर्तन का प्रतिपादन बढ़ती श्रद्धा में होने पर विषयासक्ति की बाधा नहीं होती और इस प्रकार साधकों