श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 735, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्ताईसवाँ अध्याय ७१९
पूर्वं स्नानं प्रकुर्वीत धौतदन्तोऽङ्गशुद्धये।
उभयैरपि च स्नानं मन्त्रैमृद्ग्रहणादिना ॥ १०॥
मल विसर्जन तथा दंतधावन कर प्रातःकाल मृत्तिका ग्रहणपूर्वक देहशुद्धि के लिये स्नान करना चाहिये। इस
प्रकार यह मलत्याग स्नान होने के उपरान्त वैदिक-तांत्रिक पद्धति से यथाविधि जैसी दीक्षा ग्रहण की हो उसके
अनुसार मंत्रस्नान करें। सद्गुरु का जो सम्प्रदाय हो, उसके अनुसार परम्परागत आचार का पालन करें। यथाविधि
स्नान कर निर्मल भाव धारण करें।
संध्योपास्यादिकर्माणि वेदेनाचोदितानिमे।
पूजां तैः कल्पयेत् सम्यक् संकल्पः कर्मपावनीम् ॥ ११॥
अपनी-अपनी वर्णाश्रम विधि के अनुसार वेद में जिस प्रकार उल्लिखित है उस प्रकार उन-उन वर्णाश्रमों
में नित्य नैमित्तिक कर्मों के साथ संध्या करनी चाहिये। वेदों के अनुसार स्वकर्म का आचरण करें। निषिद्ध कर्म
और काम्य कर्म का पूर्णरूप से बहिष्कार करें। इसी का नाम है शुद्ध स्वकर्म और उत्तमोत्तम अधिकार। वेदों में
वर्णित स्वकर्म का त्याग करना यही मुख्य रूप से अत्यन्त अधर्म है। परब्रह्म प्राप्त होने पर, कर्म का त्याग किये
बिना ही कर्म अपने आप बन्द हो जाता है। स्वयं ही स्वधर्म का त्याग करना यही अधर्म का मुख्य लक्षण है।
स्वधर्म से चित्त की शुद्धि करनी होती है और इसीलिये अहंता का त्याग करना होता है। इस प्रकार स्वधर्म कर्म
करते समय मन में ऐसा भाव उत्पन्न होता है कि इसमें मैं कर्मकर्त्ता भी नहीं हूँ और फलभोक्ता भी नहीं हूँ। देह
जड़, गूढ़ और अचेतन है। उसे जनार्दन चेतना देता रहता है। उसमें मेरा 'मैं' अथवा मेरा कर्तापन प्रवेश नहीं
करता। ऐसी बुद्धि से किया हुआ कर्माचरण भक्ति के कारण ब्रह्मार्पण ही होता है। इस प्रकार साधकों को मेरी
अभिमानरहित उपासना का लाभ मिलता है। अस्तु ! मेरी प्रतिभा का पूजाविधान यही मेरा प्रथम पूजास्थान है। वे
प्रतिमाएँ कैसे बनायी जाएँ उसके लक्षण बताता हूँ, सुनो।
शैली दारुमयी लौही लेप्या च सैकती।
दनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टधि स्मृता ॥ १२॥
प्रतिमाएँ आठ प्रकार की होती हैं, उनकी पूजा करने से वे तत्काल कल्याण करती हैं। गंडकी नदी में प्राप्त
शालिग्रामादि 'शिला की मूर्ति'—देवदार, मंदार अथवा ब्रह्मकाष्ठ (पीपल) आदि, 'लकड़ी की मूर्ति' अथवा
सुवर्णादि 'धातुओं की मूर्तियाँ' साधकों को तत्काल लाभ प्रदान करती हैं। उसी प्रकार मिट्टी, कपड़ा आदि की
लेप्य मूर्ति तैयार करते हैं, उन्हे लेप्या कहते हैं और कुछ लोग अत्यन्त भक्ति से स्थंडिल पर भी प्रतिमा का चित्र
बनाते हैं। उन्हें लेख्या मूर्ति कहते हैं। बालू की मूर्ति बनाते हैं, उसे 'सिकतामूर्ति' कहते हैं। वह भी सुवर्ण की
मूर्ति की ही तरह पूजनीय है। रत्नों की सुन्दर मूर्ति, हीरे की मूर्ति, मरकत की मूर्ति, नीलमणि की, पद्मराग की
अथवा मोती की मूर्ति भी अत्यन्त पूज्य है। सभी मूर्तियों में जो अत्यन्त श्रेष्ठ है, वह है मनोमय मूर्ति। वह
अत्यन्त पवित्र है। उसकी उपासना करने से साधकों को अत्यन्त समाधान प्राप्त होता है। अब उन प्रतिमानों का
पूजाविधान तथा चल-अचल लक्षण आदि का निरूपण भी श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
चाललेति द्विविधा प्रतिष्ठा जीवमन्दिरम्।
उद्वासवाहने न स्तः स्थिरायामुद्धवार्चने ॥ १३॥